भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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४७४मृच्छकटिकम्

( सुवण्णं ददामि, प्रियं वदामि, पतामि शीर्षेण सवेष्टनेन ।
तथापि मां नेच्छसि शुद्धदन्ति ! किं सेवकं कष्टमया मनुष्याः ॥ ३१ ॥ )

वसन्तसेना—को एत्थ सन्देहो ? ( कोऽत्र सन्देहः ? ) ( अवनतमुखी 'खलचरित' इत्यादि श्लोक-द्वयं पठति । )

खलचरित निकृष्ट ! जातदोषः कथमिह मां परिलोभसे धनेन ।
सुचरितचरितं विशुद्धदेहं न हि कमलं मधुपाः परित्यजन्ति ॥ ३२ ॥

सिर से, पतामि=गिरता हूँ, तथापि=फिर भी, हे शुद्धदन्ति=उज्ज्वल दाँतो वाली !, माम्=मुझ शकार को, सेवकम्=सेवक को, न=नहीं, इच्छसि=चाहती हो, मनुष्याः=मनुष्य, बहुकष्टमयाः=बहुत कष्टों से युक्त, ( भवन्ति होते हैं । ) ॥ ३१ ॥

अर्थशकार
( मैं तुम्हें ) सोना देता हूँ, प्यारी बातें बोलता हूँ, पगड़ीसहित सिर से ( तुम्हारे पैरों पर ) गिरता हूँ । फिर भी हे उज्ज्वल दाँतों वाली वसन्तसेना ! मुझ सेवक को नहीं पसन्द करती हो । हाय ! मनुष्य बहुत कष्टों से युक्त होते हैं ॥ ३१ ॥

टीका—साम्प्रतं विटं वञ्चयितुं शकारश्चाटुवचनैः वसन्तसेनां प्रलोभयन्नाह—सुवर्णकमिति । अहम्, तुभ्यम्, सुवर्णकम्=प्रचुरं हिरण्मयम्, ददामि=प्रयच्छामि, प्रियम् = मनोहरम्, वदामि = भणामि, सवेष्टनेन = सोष्णीषेण, = शीर्षेण=शिरसा, पतामि=नमामि, तव पादयोरिति शेषः, तथापि=एवं कृते सत्यपि, हे शुभ्रदन्ति != उज्ज्वलदशने !, माम्=शकारम्, सेवकम्=दासम्, =नैव, इच्छसि=कामयसे, मनुष्याः=लोकाः, कष्टमयाः=विविधक्लेशयुताः, मनुष्याणां मनोरथाः महताऽप्रासेनेव पूर्यन्ते इति तद्भावः । अर्थान्तरन्यासोऽलंकारः उपजातिवृत्तम् ॥ ३१ ॥

विमर्श—कुछ लोग 'किं शे बज्रं कष्टमआ मणुश्शा, इस प्राकृत में पदच्छेद मानकर 'किमस्याः वयं काष्ठमयाः मनुष्याः' यह संस्कृतच्छाया मानते हैं। इसके अनुसार 'अस्याः समक्षं मादृशाः जनाः काष्ठमयाः, काष्ठनिर्मित-पुत्तलिकासदृशाः व्यर्था इति' ऐसा भाव निकलता है । 'कष्टमयाः' यह पाठ मानकर कुछ व्याख्याकार 'निर्दयाः' यह अर्थ करते हैं, वह सामान्यतया असंगत प्रतीत होता है । यदि यह मान लिया जाय कि शकार 'मानवसामान्य के लिये जिसमें वसन्तसेना भी है' को निर्दय='परव्यथानभिज्ञ' मानता है—यह भाव है तब कथञ्चित् संगति हो सकती है । परन्तु आगे वाले वसन्तसेना के कथन 'कोऽत्र सन्देहः' का औचित्य कम सटीक बैठता है । ३१ ॥

अन्वयःखलचरित !, निकृष्ट ! जातदोषः, ( त्वम् ), इह, माम्, धनेन, किम्, परिलोभसे ? सुचरितचरितम्, विशुद्धदेहम्, कमलम्, मधुपाः, , हि, परित्यजन्ति ॥ ३२ ॥

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