मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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यत्नेन सेवितव्यः पुरुषः कुलशीलवान् दरिद्रोऽपि ।
शोभा हि पणस्त्रीणां सदृशजनसमाश्रयः कामः ॥ ३३ ॥
अवि अ । सहआरपादवं सेविअ ण पलास-पादवं अङ्गीकरिस्सं ।
विमर्श—'परिलोभसे' यह प्रयोग व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध है । क्योंकि तुदादिगणीय 'लुभ विमोहने' और दिवादिगणीय 'लुभ गार्ध्ये' ये दोनों ही परस्मैपदी धातुयें हैं । अतः आत्मनेपद असंगत है । साथ ही तुदादि में गुण भी सम्भव नहीं है ।
कुछ विद्वान् 'परिलोभयसे' ऐसा मानते हैं । यह भी ठीक नहीं है क्योंकि एक अक्षर बढ़ जाने से छन्दोभंग है ।
इसकी उपपत्ति के दो मार्ग है ( १ ) अन्तर्भूत णिजर्थ मानकर परस्मैपद अथवा भ्वादिगण में किसी अवान्तरगण में समावेश ।
एक बात और ध्यान देने की है कि वसन्तसेना को प्राकृत बोलनी चाहिये थी । शकार जैसे पात्र के साथ संस्कृत का प्रयोग भी ठीक नहीं लगता है । इसीलिये कहीं कहीं "अवनतमुखी संस्कृतमाश्रित्य 'खलचरित' इत्यादि" पाठ मिलता है । लगता है कि किसी प्रकार प्राकृत अंश छूट गया । और उसकी संस्कृतच्छाया ही चलने लगी । इसीलिये 'परिलोभसे' यह अशुद्ध प्रयोग भी रह गया ॥ ३२ ॥
**अन्वयः—**दरिद्रः, अपि, कुलशीलवान्, यत्नेन, सेवितव्यः, हि, सदृशजन-समाश्रयः, कामः, पणस्त्रीणाम्, शोभा, [ भवति ] ॥ ३३ ॥
**शब्दार्थ—**दरिद्रः=निर्धन, अपि=भी, कुलशीलवान् = उच्चकुल और सत्स्वभाव से युक्त (व्यक्ति), यत्नेन=यत्न से, सेवितव्यः=सेवा करने योग्य होता है, हि=क्योंकि, सदृशजनसमाश्रयः=अपने योग्य व्यक्ति के साथ किया गया, कामः = सुरत-व्यवहार, पणस्त्रीणाम् = वेश्या स्त्रियों की, शोभा = प्रशंसनीय कार्य, [ भवति=होता है ] ॥ ३३ ॥
**अर्थ--**निर्धन भी कुल-सदाचारयुक्त पुरुष यत्नपूर्वक सेवा करने योग्य होता है, यत्नपूर्वक ऐसे व्यक्ति की सेवा करनी चाहिये क्योंकि अपने योग्य व्यक्ति के साथ किया गया सुरतव्यवहार ही वेश्याओं के लिये शोभा की बात होती है ॥ ३३ ॥
**टीका—**शकारस्य सेवायामनौचित्यं प्रकटयति— यत्नेनेति । दरिद्रः=निर्धनः, अपि, कुलशीलवान्=उच्चकुलोत्पन्नः सत्स्वभावयुक्तः पुरुषः, यत्नेन = प्रयासपूर्वकम्, सेवितव्यः = सेवनीयः, हि=यतः, सदृशजनः = स्वानुरूपजनः, समाश्रयः = अवलम्बनं यस्य तादृशः, कामः=मदनः, पणेन=धनादिना लभ्याः स्त्रियः=वेश्याः, तासां शोभा=आभूषणम्, प्रशंसनीयं कार्यं भवतीति भावः । अर्थान्तरन्यासोऽलंकारः, आर्या वृत्तम् ॥ ३३ ॥