भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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अष्टमोऽङ्कः ४७७

अपि च, सहकारपादपं सेवित्वा न पलाशपादपमङ्गीकरिष्यामि । )

शकारः—दाशीए धीए ! दलिद्द-चालुदत्ताके शहआलपादवे कड़े, हम्गे उण पलाशो भणिदे, किंशुक वि ण कड़े। एव्वं तुमं मे गालिं देन्ती अज्ज वि तं ज्जेव चालुदत्तकं शुमलेशि ? ( दास्याः पुत्रि ! दरिद्र-चारुदत्तः सहकारपादपः कृतः, अहं पुनः पलाशो भणितः, किंशूकोऽपि न कृतः । एवं त्वं मे गालिं ददती अद्यापि तमेव चारुदत्तकं स्मरसि ? )

वसन्तसेना—हिअअगदो ज्जेव किं त्ति ण सुमरीअदि ? ( हृदयगत एव किमिति न स्मर्य्यते ? )

शकारः—अज्ज वि दे हिअअगदं तुमं च शमं ज्जेव मोडेमि ! ता दलिद्द-शत्थवाहअ-मणुश्श-कामुकिणि ! चिट्ठ चिट्ठ ( अद्यापि ते हृदयगतं त्वाञ्च सममेव मोटयामि । तत् दरिद्र-सार्थवाहकमनुष्यकामुकि ! तिष्ठ तिष्ठ । )

वसन्तसेना—भण भण, पुणो वि भण । सलाहणिआईं एदाईं अक्खराईं । ( भण भण, पुनरपि भण । श्लाघनीयानि एतानि अक्षराणि । )

शकारः—पलिताअदु दाशीए पुत्ते दलिद्द-चालुदत्ताके तुमं । ( परित्रायतां दास्याः पुत्रो दरिद्र-चारुदत्तकस्त्वाम् । )

वसन्तसेना—परित्ताअदि जदि मं पेक्खदि । (परित्रायते यदि मां प्रेक्षते ।)


अर्थ—और भी, आम के वृक्ष का सेवन कर पलाश ( ढाँक ) के वृक्ष को नहीं स्वीकार करूँगी ।

शकार—दासी की बच्ची ! तूने दरिद्र चारुदत्त को आम का वृक्ष बना दिया, और मुझे 'पलाश' कह दिया, किंशुक भी नहीं कहा । इस प्रकार तुम मुझे गाली देती हुई आज भी उसी चारुदत्त को याद कर रही हो ।

वसन्तसेना—हृदय में ही है, उसे क्यों नहीं याद करूंगी ?

शकार—अभी ( आज ही ) तुम्हें और तुम्हारे हृदय में वर्तमान ( चारुदत्त ) दोनों को एक ही साथ पीस डालूंगा । इसलिये दरिद्र सार्थवाहक मनुष्य को चाहने वाली ! ठहर जा । ठहर जा ।

वसन्तसेना - कहो, कहो, फिर कहो, ये अक्षर प्रशंसनीय ( अच्छे लगने वाले ) हैं ।

शकार—दासी का पुत्र दरिद्र चारुदत्त तुम्हारी रक्षा करे ।

वसन्तसेना—यदि देखें तो अवश्य रक्षा करेंगे ।