भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 703

दशमोऽङ्कः ६१५

( द्वितीयचाण्डालं प्रति ) एदं चउट्ठं घोषणट्ठाणं। ता उग्घोसम्ह। ( एतत् चतुर्थं घोषणास्थानम्। तदुद्घोषयावः। )

( पुनस्तथैव उद्घोषयतः। )

चारुदत्तः – हा प्रिये वसन्तसेने ! ( 'शशिविमलमयूख' इत्यादि १०।१३ पुनः पठति। )

( ततः प्रविशति ससम्भ्रमा वसन्तसेना भिक्षुश्च। )

भिक्षुः – हीमाणहे ! अट्ठाणपरिश्रन्तं शमश्शाशिअ वशन्तशेणिअं णअन्ते अणुग्गहिदम्हि पव्वज्जाए। उवाशिके ! कहिं तुमं णइश्शं ? ( हन्त ! अस्थानपरिश्रान्तां समाश्वास्य वसन्तसेनां नयन् अनुगृहीतोऽस्मि प्रव्रज्यया। उपासिके ! कुत्र त्वां नेष्यामि ? )

वसन्तसेना – अज्जचारुदत्तस्त उज्जेव गेहं। तस्स दंसणेण मिअलंछणस्स विअ कुमुदिणिं आणंदेहि मं। ( आर्यचारुदत्तस्यैव गेहम्। तस्य दर्शनेन मृगलाञ्छनस्येव कुमुदिनीमानन्दय माम्। )

भिक्षुः – ( स्वगतम् ) कदलेण मग्गेण पविशामि ? ( विचिन्त्य )


अर्थ में घञ् करके 'पात' बनाकर पुनः स्वार्थ में 'क' प्रत्यय और टाप् प्रत्यय आदि जोड़कर बनता है।

वसनस्येव पातिका – पताकादि के वस्त्र के समान पतनक्रिया। जैसे पताका का कपड़ा ऊपर और नीचे उड़ता रहता है वैसे ही जीवन-मृत्यु का चक्र चलता रहता है ।। ३६ ।।

अर्थ – ( दूसरे चाण्डाल से ) यह चौथा घोषणा-स्थान है। अतः अब घोषणा करें।

( फिर उसी प्रकार घोषणा करते हैं। )

चारुदत्त – हाय प्रिये वसन्तसेने ! ( "चन्द्रमा की उज्ज्वल किरणों के समान दांतोंवाली !" इत्यादि १०।१३ पद्य को फिर पढ़ता है। )

( इसके बाद घबड़ाई हुई वसन्तसेना और भिक्षु प्रवेश करते हैं। )

भिक्षु – अनुचितरूप से [ या अनुचित स्थान में ] थकी हुयी वसन्तसेना को समाश्वस्त करके ले जाते हुये मैं इस संन्यास द्वारा अनुगृहीत हुआ हूँ। उपासिके ! तुम्हें कहाँ ले चलूँ ?

वसन्तसेना – आर्य चारुदत्त के ही घर [ ले चलो ], उन्हीं के दर्शन से, चन्द्रमा के दर्शन से कुमुदिनी के समान, मुझे आनन्दित करो।

भिक्षु – ( अपने आप में ) किस रास्ते से प्रवेश करू, चलूँ ? ( सोच कर )