मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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लाअमग्गेण उज्जेव पविशामि । उवाशिके ! एहि, इमं लाअमग्गं; (आकर्ण्य) किं णु हु एशे लाअमग्गे महंते कलअले शुणोअदि ? ( कतरेण मार्गेण प्रविशामि ? राजमार्गेणैव प्रविशामि । उपासिके ! एहि, अयं राजमार्गः । ) ( किं नु खल्वेष राजमार्गे महान् कलकलः श्रूयते ? )
वसन्तसेना - ( अग्रतो निरूप्य ) कधं पुरदो महाजणसमूहो ? अज्ज ! जाणादि दाव किं ण्णेदं त्ति । विसमभरक्कंता विअ वसुन्धरा एअवासोष्णदा उज्जइणी वट्टदि । ( कथं पुरतो महाजनसमूहः ? आर्य ! जानीहि तावत्किन्निदमिति । विषमभराक्रान्तेव वसुन्धरा एकवासोन्नतोज्जयिनी वर्तते । )
चाण्डालः - इमं अ पच्छिमं घोषणट्ठाणं, ता तालेध डिंडिमं उग्घोशेध घोशणं । (तथा कृत्वा) भो चारुदत्त ! पडिवालेहि । मा भाआहि, लहुं ज्जेव मालीअशि ! ( इदं च पश्चिमं घोषणास्थानम्, तत्ताडयतं डिण्डिमम् । उद्घोषयतं घोषणाम् । ) ( भोश्चारुदत्त ! प्रतिपालय । मा भैषीः, शीघ्रमेव मार्यसे ! )
चारुदत्तः -भगवत्यो देवताः ! ।
भिक्षुः -( श्रुत्वा, ससंभ्रमम् ) उवासिके ! तुमं किल चारुदत्तेण मालिदाशि त्ति चारुदत्तो मालिदुं णीअदि । ( उपासिके ! त्वं किल चारुदत्तेन मारितासीति चारुदत्तो मारयितुं नीयते । )
वसन्तसेना--(ससंभ्रमम्) हद्धी हद्धी, कधं मम मंदभाइणीए किदे अज्ज-चारुदत्तो वावादीअदि ? भो ! तुरिदं तुरिदं आदेसेहि मग्गं । ( हा धिक्
राजमार्ग से ही चलता हूँ । उपासिका जी ! आइये, यह राजमार्ग है । ( सुनकर ) राजमार्ग पर महान् कलकलध्वनि क्यों सुनाई पड़रही है ?
वसन्तसेना-- ( आगे देख कर ) आगे लोगों की भारी भीड़ किस लिये है ? आर्य ! जानते हो यह क्या है ? एक ओर बोझ से दबी हुई पृथिवी के समान उज्जयिनी नगरी एक स्थान पर एकत्रित [ उमड़ी हुई ] हो रही है ।
चाण्डाल--यह अन्तिम घोषणास्थान है, अतः नगाड़ा पीटो, घोषणा घोषित करो, ( नगाड़ा पीट कर घोषणा कर के ) हे चारुदत्त ! प्रतीक्षा करो । मत डरो, जल्दी ही मार डाले जाओगे ।
चारुदत्त--भगवती देवियों ! ।
भिक्षु--( सुन कर घबड़ाहट के साथ ) उपासिके ! 'तुम्हें चारुदत्त ने मारा है', अतः चारुदत्त को ( वध के स्थान पर ) मारने के लिये ले जाया जा रहा है ।
वसन्तसेना--( घबड़ाहट के साथ ) हाय मुझे धिक्कार है, धिक्कार है । मुझ