भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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दशमोऽङ्कः ६२७

वसन्तसेना—तेण अणज्जेण वावादिदा, एदिणा अज्जेण जीवाविदम्हि । ( तेनानार्येण व्यापादिता; एतेनार्येण जीवं प्रापितास्मि । )

चारुदत्तः- कस्त्वमकारणबन्धुः ?

भिक्षुः--ण पच्चभिजाणादि मं अज्जो ? अहं शे अज्जश्श चणणशंवाहचिन्तए शंवाहके णाम जूदिअलेहिं गहिदे एदाए उवाशिकाए अज्जश्श केलके त्ति अलंकालपण्णिक्कीदेम्हि । तेण अ जूदणिठवेदेण शक्कशमणके संवुत्ते म्हि । एशा वि अज्जा पवहणविपज्जाशेण पुप्फकलंउकजिण्णुज्ज'णं गदा । तेण अ अणज्जेण ण मं बहु मण्णेशि त्ति बाहु'शबलक्कालेण मालिदा मए दिट्ठा । ( न प्रत्यभिजानाति मामार्यः ? अहं स आर्यस्य चरणसंवाहचिन्तकः संवाहको नाम द्यूतकरैर्गृहीत एतयोपासिकयाऽऽर्यस्यात्मीय इत्यलङ्कारपणनिष्क्रोतोऽस्मि । तेन च द्यूतनिर्वेदेन शाक्यश्रमणकः संवृत्तोऽस्मि । एषाप्यार्या प्रवहणविपर्यासेन पुष्पकरण्डकजीर्णोद्यानं गता । तेन चानार्येण न मां बहु मन्यते इति बाहुपाशबलात्कारेण मारिता मया दृष्टा । )

( नेपथ्ये कलकलः )

जयति वृषभकेतुर्दक्षयज्ञस्य हन्ता तदनु जयति भेत्ता षण्मुखः क्रौञ्चशत्रुः । तदनु जयति कृत्स्नां शुभ्रकैलासकेतुं विनिहतवरवैरी चार्यको गां विशालाम् ॥ ४६ ॥


वसन्तसेना—उस नीच ने मार डाला था इस सज्जन ने जीवन दे दिया, जिन्दा कर दिया ।

चारुदत्त—अकारणबन्धु तुम कौन हो ?

भिक्षु—आर्य ! आप मुझे नहीं पहचानते हैं ? मैं आर्य के चरण दबाने की चिन्ता करने वाला संवाहक जुआरियों द्वारा पकड़ लिया गया था इस उपासिका ने 'आपका अपना आदमी हूँ' यह मानकर आभूषण द्वारा मुझे मुक्त करा दिया था । उस जुआ खेलने की ग्लानि से बौद्ध संन्यासी बन गया । यह आर्या भी गाड़ी बदल जाने के कारण पुष्पकरण्डक उद्यान में पहुँच गयी थी । और उस नीच ने 'मुझे अधिक नहीं मानती हो' यह कहकर भुजपाश द्वारा जबरदस्ती मार डाला, मैंने देखा ।

अन्वयः--दक्षयज्ञस्य, हन्ता, वृषभकेतुः, जयति, तदनु, भेत्ता, क्रौञ्चशत्रुः, षण्मुखः, जयति, तदनु, विनिहतवरवैरी, आर्यकः, च, शुभ्रकैलाशकेतुम्, कृत्स्नाम्, विशालाम्, गाम्, जयति ॥ ४६ ॥

शब्दार्थ—दक्षयज्ञस्य = दक्ष के यज्ञ का, हन्ता = विध्वंस करने वाला, वृषभकेतुः = बैल के चिह्नवाली पताका वाले शंकर जी, जयति = जय प्राप्त कर रहे हैं, तदनु =