भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 717, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 717

दशमोऽङ्कः ६२६

हत्वा रिपुं तं बलमन्त्रिहीनं पौरान्समाश्वास्य पुनः प्रकर्षात् । प्राप्तं समग्रं वसुधाधिराज्यं राज्यं बलारेरिव शत्रुराज्यम् ॥४८॥

कुनृपतिम्=दुष्ट राजा पालक को, हत्वा=मारकर, च=और, तद्राज्ये=उसके राज्य में [ सिंहासन पर ], तम्=उस, आर्यकम् =आर्यक को, द्रुतम्,=शीघ्र ही, अभिषिच्य=अभिषिक्त करके, च=और, तस्य=उस राजा ( आर्यक ) की, शेषभूताम्=अन्तिम, आज्ञाम्=आदेश को, शिरसि=सिर पर, निधाय=रखकर, अहम्=मैं, शर्विलक, व्यसनगतम्=आपत्ति में पड़े हुये, चारुदत्तम्=चारुदत्त को, मोक्ष्ये=मुक्त करूँगा, अर्थात् करवाऊँगा ॥ ४७ ॥

अर्थ--( प्रवेश करके, अचानक )

शर्विलक-- हे सज्जनों ! उस दुष्ट राजा पालक को मारकर और उसके राज्य पर आर्यक को शीघ्र ही अभिषिक्त करके उस राजा आर्यक की अन्तिम=प्रधान आज्ञा को शिर से धारण करके विपत्ति में पड़े हुये चारुदत्त को मुक्त करूँगा, अर्थात् छुड़वा दूँगा ॥ ४७ ॥

टीका-- पालकस्य वधं पौराणां समाश्वासनं चारुदत्तस्य मुक्ति च सूचयति शर्विलकः -हत्वेति । भोः=इदं सम्बोधनम्, अहम्=शर्विलकः, तम्=सर्वविदितम्, कुनृपतिम्=कुत्सितं राजानम्, पालकम्, हत्वा=मारयित्वा, तम् च=पूर्वं सिद्धादेशेन निर्दिष्टं भाविनं राजानम्, आर्यकम्=गोपालपुत्रकम्, तद्राज्ये=पालकराज्ये, द्रुतम्=शीघ्रम्, अभिषिच्य=अभिषिक्तं कृत्वा, तस्य=आर्यकस्य, शेषभूताम्=अवशिष्टाम्, प्रमुखां वा, आज्ञाम्=आदेशम्, शिरसि=मस्तके, निधाय=कृत्वा, व्यसनगतम्=विपद्ग्रस्तम्, चारुदत्तम्=तन्नामकं सज्जनम्, अहम्=शर्विलकः, मोक्ष्ये=मोचयिष्यामि । इदं भाविघटनायाः सूचकम् । प्रहर्षिणी वृत्तम् ॥ ४७ ॥

अन्वयः-- बलमन्त्रिहीनम्, तम्, रिपुम्, हत्वा, पुनः, प्रकर्षात्, पौरान्, समाश्वास्य बलारेः, राज्यम्, इव, वसुधाधिराज्यम्, समग्रम्, शत्रुराज्यम्, प्राप्तम् ॥ ४८ ॥

शब्दार्थ-- बलमन्त्रिहीनम्=सेना और मन्त्रियों से रहित, तम्=उस, रिपुम्=शत्रु ( राजा पालक ) को, हत्वा=मारकर, पुनः=फिर, प्रकर्षात्=अपने प्रभाव का आश्रय लेकर, पौरान्=पुरवासियों को, समाश्वास्य=समाश्र्वस्त करके, बलारेः=बलासुर के शत्रु इन्द्र के, राज्यम्=राज्य के, इव=समान, वसुधाधिराज्यम्=पृथिवी के साम्राज्य, समग्रम्=समस्त, शत्रुराज्यम्=शत्रु के राज्यको, प्राप्तम्=पा लिया है ॥ ४८ ॥

अर्थ-- सेना और मन्त्रियों से रहित उस शत्रु [ पालक ] को मार कर [ अपने ] प्रभाव का आश्रय लेकर पुरवासियों को पुनः समाश्वस्त करके, बल नामक दैत्य के