मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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(अग्रतो निरूप्य) भवतु, अत्र तेन भवितव्यम्, यत्रायं जनपादसमवायः। अपि नामायमारम्भः क्षितिपतेरार्यकस्यार्यचारुदत्तस्य जीवितेन सफलः स्यात्। (त्वरिततरमुपसृत्य) अपयात जाल्माः ! । (दृष्ट्वा, सहर्षम्) अपि ध्रियते चारुदत्त. सह वसन्तसेनया ? संपूर्णाः खल्वस्मत्स्वामिनो मनोरथाः।
दिष्ट्या भो व्यसनमहार्णवादपारा- दुत्तीर्णं गुणवृतया सुशीलवत्या। नावेव प्रियतमया चिरान्निरीक्षे ज्योत्स्नाढ्यं शशिनमिवोपरागमुक्तम् ॥ ४६ ॥
शत्रु इन्द्र के राज्य [ स्वर्गपुरी ] के समान सम्पूर्ण पृथिवी के शासन वाले शत्रु के सारे राज्य को अपने अधिकार में कर लिया है ।। ४८ ।।
टीका—सैन्यमन्त्रिशक्तिहीनस्य राज्ञः पालकस्य वधं, पुरवासिनां शासन-परिवर्तनेन जातभीतिनिराकरणं सम्पूर्णे राज्ये आर्यकस्य आधिपत्यं च सूचयितुमाह-हत्वेति। बलानि=सैन्यानि, मन्त्रिणश्च=अमात्याश्च तैः हीनः=रहितः, तम्, रिपुन्=शत्रुम्, पालकमित्यर्थः, हत्वा=मारयित्वा, प्रकर्षात्=प्रभावमाश्रित्य, ल्यब्लोपे पञ्चमी बोध्या, पौरान्=पुरवासिलोकान्, समाश्वास्य=सान्त्वयित्वा, बलारेः=बलनामकदैत्यशत्रोः, इन्द्रस्येत्यर्थः, राज्यम्=स्वर्गम्, यद्वा इन्द्रत्वमित्यर्थः, इव=तुल्यम्, वसुधायाः=पृथिव्याः, अधिराज्यम्=साम्राज्यम्, समग्रम्=सम्पूर्णम्, शत्रुराज्यम्=रिपोः पालकस्य राज्यम्, प्राप्तम्=अधिगतम् । अत्रोपमालंकारः, इन्द्रवज्रा वृत्तम् ॥४८॥
विमर्शः--शर्विलक का तात्पर्य यह है कि राजा पालक का साथ देने के लिये न तो सेना थी और न मन्त्री । सभी उसकी मूर्खता और दुष्टता से परेशान थे। उसका साम्राज्य इन्द्रपुरी के समान अति सम्पन्न था । उसे विप्लव करके प्राप्त किया है । किन्तु सामान्य प्रजा को समाश्वस्त कर दिया गया है कि उन्हें कोई कष्ट नहीं होगा ।। ४८ ।।
अर्थ—(आगे देखकर) अच्छा, उन (चारुदत्त) को यहाँ होना चाहिये जहाँ जनपद के लोगों की भीड़ है। राजा आर्यक का यह कार्य [राज्याभिषेक] आर्य चारुदत्त के जीवित रह जाने से सफल हो जाता। (बहुत जल्दी पास जाकर) अरे धूर्तों ! हटो। (देखकर हर्षसहित) क्या वसन्तसेना के साथ आर्य चारुदत्त जीवित हैं ? हमारे राजा (आर्यक) के सभी मनोरथ सफल हो गये।
अन्वयः--भोः, नावा, इव, गुणधृतया, सुशीलवत्या, प्रियतमया, अपारात्, व्यसनमहार्णवात्, उत्तीर्णम्, उपरागमुक्तम्, ज्योत्स्नाऽढ्यम्, शशिनम्, इव, दिष्ट्या, चिरात्, निरीक्षे ॥४६॥