मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽङ्कः ६३३
चारुदत्तः—किम् ? शर्विलकः—
त्वद्यानं यः समारुह्य गतस्त्वां शरणं पुरा । पशुवद्वितते यज्ञे हतस्तेनाद्य पालकः ॥ ५२ ॥
अर्थ—शर्विलक—और भी,
प्रशस्त चरित्रवाले कुल तथा मान की रक्षा करने वाले आर्यक ने यज्ञशाला में स्थित दुष्ट प्रकृति वाले [ राजा ] पालक को पशु के समान मार डाला ॥५१॥
टीका—साम्प्रतं चारुदत्तस्य तोषाय आर्यकेण पालकस्य वधं विज्ञापयति— आर्यकेणेति । आर्यम्=प्रशस्तं, वृत्तम्=चारित्रं यस्य तेन, कुलम्=स्ववंशम्, मानम्=आत्मगौरवं, च, रक्षता=अवता, आर्यकेण=एतन्नामकेन आभीरपुत्रेण, यज्ञवाटस्थः=यज्ञशालास्थितः, दुरात्मा=दुष्टप्रकृतिकः, पालकः=एतन्नामकः तत्रत्यो राजा, पशुवत्=यज्ञीयवध्यपशुतुल्यः, हतः=मारितः । एवञ्च यथा यज्ञीयपशुवधे किमपि कष्टं न भवति तथैव तस्य पालकस्यापि वधे आर्यकस्य किमपि कष्टं न जातमिति बोध्यम् । अत्र पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ ५१ ॥
विमर्श—‘हत्वा तं कुनृपमहं हि पालकं भोः’ इत्यादि पूर्वोक्त १०।४७ पद्य में शर्विलक ने अपने द्वारा पालक का वध करना कहा है । और इसमें तथा आगे श्लोक में पालक द्वारा वध कह रहा है । इसमें विरोध प्रतीत हो रहा है । इसका समाधान यह है कि राज्यपरिवर्तन केवल शर्विलक या आर्यक नहीं कर सकते थे । इन्हें भी सहायकों की अपेक्षा थी । अब कार्य सम्पन्न हो जाने पर हर्षातिरेक में सभी अपनी २ प्रशंसा कर रहे हैं । परन्तु वास्तव वधकर्ता तो आर्यक ही है क्योंकि उसी को राजा बनाने की भविष्यवाणी है । अतः पूर्वापर-विरोध का अवसर नहीं है ॥ ५१ ॥
अर्थ—चारुदत्त—क्या ?
**अन्वयः—**यः पुरा, त्वद्यानम्, समारुह्य, त्वाम्, शरणम्, गतः [ आसीत् ], तेन, अद्य, वितते, यज्ञे, पालकः, पशुवत्, हतः ॥ ५२ ॥
**शब्दार्थ—यः=**जो, पुरा=पहले, त्वद्यानम्=तुम्हारी गाड़ी पर, समारुह्य=चढ़कर, त्वाम्=तुम्हारी, शरणम्=शरण में, गतः=गया था [ रक्षा की प्रार्थना की थी ], तेन=उस आभीरपुत्र आर्यक ने, अद्य=आज, वितते=विशाल [ अनेक लोगों से भरे हुये ], यज्ञे=यज्ञ [ शाला ] में, पशुवत्=वध्य पशु के समान, पालकः=पालक राजा को, हतः=मार डाला ॥ ५२ ॥