भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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दशमोऽङ्कः ६३५

( नेपथ्ये )

यथाज्ञापयति शर्विलकः ।

शर्विलकः--आर्य ! नन्वयमार्यको राजा विज्ञापयति; इदं मया युष्मद्-गुणोपार्जितं राज्यम्, तदुपयुज्यताम् ।

चारुदत्तः--अस्मद्गुणोपार्जितं राज्यम् ?

( नेपथ्ये )

अरे रे राष्ट्रियश्यालक ! एह्येहि स्वस्याविनयस्य फलमनुभव ।

( ततः प्रविशति पुरुषैरधिष्ठितः पश्चाद्बाहुबद्धः शकारः । )

शकारः--हीमादिके ( हन्त ! )

एब्बं दूलमदिक्कन्ते उद्दामे विअ गद्दहे।
आणीदे क्खु हगे बद्धे हुडे अण्णे व्व दुक्कले ॥ ५३ ॥
( एवं दूरमतिक्रान्तः उद्दाम इव गर्दभः।
आनीतः खल्वहं बद्धः कुक्कुरोऽन्य इव दुष्करः ॥ ५३ ॥ )


( नेपथ्य में )---

शर्विलक की जैसी आज्ञा ।

शर्विलक--आर्य ! ये राजा आर्यक विज्ञापित ( निवेदित ) करते हैं कि आपके गुणों [ दया दाक्षिण्यादि ] के कारण यह राज्य प्राप्त हुआ है, अतः [ आप ] उपभोग करें ।

चारुदत्त--क्या हमारे गुणों से उपार्जित राज्य ?

( नेपथ्य में )—

( अरे, राजा के शाले ! आओ आओ, अपनी धूर्तता का फल भोगो । )

( इस के बाद लोगों द्वारा पकड़ा गया, पीछे बन्धे हुये हाथों वाला शकार प्रवेश करता है । )

**अन्वयः--**उद्दामः, गर्दभः, इव, एवम्, दूरम्, अतिक्रान्तः, अहम्, खलु, आनीतः, दुष्करः, अन्यः, कुक्कुरः, इव, बद्धः ॥ ५३ ॥

**शब्दार्थ--**उद्दामः=रस्सी से रहित (निकले हुये), गर्दभः=गधा, इव=के समान, एवम्=इतनी, दूरम्=दूर तक, अतिक्रान्तः=भगा हुआ, अहम्=मैं, खलु=निश्चय ही, आनीतः=ले आया गया हूँ, दुष्करः=दुष्ट, असाध्य, अन्यः=दूसरे, कुक्कुरः=कुत्ता, इव=के समान, बद्धः=बाँध दिया गया हूँ ॥५३॥

अर्थ--शकार--हाय !

रस्सी से छूटे हुये गधे के समान इतनी दूर तक भागा हुआ मैं ले आया गया हूँ। दुष्ट ( असाध्य ) दूसरे कुत्ते के समान बाँध दिया गया हूँ ॥५३॥