भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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दशमोऽङ्कः६४९

चारुदत्तः—अतः परमपि प्रियमस्ति ?

लब्धा चारित्रशुद्धिश्चरणनिपतितः शत्रुरप्येष मुक्तः प्रोत्खातारातिमूलः प्रियसुहृदचलामार्यकः शास्ति राजा। प्राप्ता भूयः प्रियेयं प्रियसुहृदि भवान् सङ्गतो मे वयस्यो लभ्यं किञ्चातिरिक्तं यदपरमधुना प्रार्थयेऽहं भवन्तम् ॥५६॥

**अन्वयः—**चारित्रशुद्धिः, लब्धा, चरणनिपतितः, एषः, शत्रुः, अपि, मुक्तः, प्रोत्खातारातिमूलः, प्रियसुहृत्, आर्यकः, राजा, (सन्), अचलाम्, शास्ति, इयम्, प्रिया, भूयः, प्राप्ता, मे, वयस्यः, भवान्, प्रियसुहृदि, संगतम्, अतिरिक्तम्, च, किम्, लभ्यम्, यत्, अपरम्, अधुना, अहम्, भवन्तम्, प्रार्थये ॥ ५६ ॥

**शब्दार्थ—**चारित्रशुद्धिः=चरित्र की शुद्धता, निर्दोषता, लब्धा=प्राप्त हो गयी, चरणनिपतितः=पैरों पर गिरा हुआ, एषः=यह, शत्रुः=दुश्मन, शकार, अपि=भी, मुक्तः=छूट गया, प्रोत्खातारातिमूलः=शत्रु के मूल=राजा पालक को नष्ट कर देने वाला, प्रियसुहृद्=प्रिय मित्र, आर्यकः=आर्यक, राजा=राजा, शासक, (सन्=होता हुआ ), अचलाम्=पृथिवी का, शास्ति=शासन कर रहा है, इयम्=यह, प्रिया=प्रेयसी ( वसन्तसेना ), भूयः=फिर, प्राप्ता=मिल गयी, मे=मेरे, वयस्यः=प्रिय, भवान्=आप, प्रियसुहृदि=प्रिय मित्र आर्यक अथवा मेरे ( साथ ) में, संगतः=मिल गये, च=और, अतिरिक्तम्=बाकी, अधिक, किम्=क्या, लभ्यम्=प्राप्त करने योग्य है, यत्=जो, अपरम्=दूसरा, अधुना=इस समय, अहम्=मैं, भवन्तम्=आपसे, प्रार्थये=मागूँ ॥ ५६ ॥

**अर्थ—चारुदत्त—**इससे अधिक प्रिय भी कुछ है ?

(झूठे आरोप से दूषित) चरित्र की शुद्धता (निर्दोषता) प्राप्त हो गयी। पैरों पर गिरा हुआ यह शत्रु (शकार) भी छोड़ दिया गया। शत्रुओं के मूल-भूत राजा पालक को नष्ट कर देने वाला प्रिय मित्र आर्यक राजा होकर पृथिवी का शासन कर रहा है। यह प्रेयसी (वसन्तसेना) फिर से मिल गयी। मेरे मित्र आप प्रिय मित्र (आर्यक अथवा मेरे) के साथ मिल गये। और अब क्या प्राप्त करना शेष है जो दूसरा इस समय मैं आपसे मागूँ ॥ ५६ ॥

**टीका—**अभीप्सितानि सर्वाण्यपि वस्तूनि लब्धानि भाग्यवशात् । अतो नाधुना किमप्यवशिष्टं प्रार्थनीयमिति प्रतिपादयति—लब्धेति । चारित्रस्य=चरित्रमेव चारित्रम्, स्वार्थेऽण्, तस्य शुद्धिः=मिथ्या-वसन्तसेनाबधाभियोगात् मुक्तिरिति भावः, लब्धा=प्राप्ता, वसन्तसेनाप्राप्त्या तद्द्वकलंकात् मुक्तो जात इति भावः, चरणयोः=पादयोः, निपतितः=विलुण्ठितः प्राणरक्षार्थमिति भावः, एषः=पुरोवर्तमानोऽयम्, शत्रुः=रिपुः, शकार इत्यर्थः, अपि, मुक्तः=परित्रातः, मृत्युदण्डविधानमकृत्वैव