मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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भिक्षुः-इमं ईद्दिशं अणिच्चत्तणं पेक्खिअ दिउणे मे पव्वज्जाए बहुमाणे संवुत्ते । (इदमीदृशमनित्यत्वं प्रेक्ष्य द्विगुणो मे प्रव्रज्यायां बहुमानः संवृत्तः ।)
चारुदत्तः-सखे ! दृढोऽस्य निश्चयः । तत्पृथिव्याः सर्वविहारेषु कुलपतिरयं क्रियताम् ।
शर्विलकः यथाह आर्य ।
भिक्षुः--पिअं णो पिअं । ( प्रियं नः प्रियम् । )
वसन्तसेना--सम्पदं जीवाविदम्हि । ( साम्प्रतं जीवापितास्मि । )
शर्विलकः--स्थावरकस्य किं क्रियताम् ?
चारुदत्तः--सुवृत्त अदासो भवतु । ते चाण्डालाः सर्वचाण्डालानामधिपतयो भवन्तु । चन्दनकः पृथिवीदण्डपालको भवतु । तस्य राष्ट्रियश्यालस्य यथैव क्रिया पूर्व्वमासीत्, वर्त्तमाने तथैवास्तु ।
शर्विलकः--एवं यथाह आर्य्यः । परमेनं मुञ्च मुञ्च, व्यापपादयामि ।
चारुदत्तः-( अभयं शरणागतस्य । 'शत्रुः कृतापराधः' १०।५५ इत्यादि पद्यं पठति । )
शर्विलकः-तदुच्यतां किं ते भूयः प्रियं करोमि ?
भिक्षु-इस ऐसी अनित्यता को देखकर संन्यास में मेरा दुगुना अनुराग बढ़ गया है ।
चारुदत्त--मित्र ! इसका दृढ़ निश्चय है । इसलिये इसे पृथिवी पर सभी बौद्ध-विहारों का कुलपति बना दिया जाय ।
शर्विलक-आर्य की जैसी आज्ञा ।
भिक्षु-हमारे लिये प्रिय है, प्रिय है ।
वसन्तसेना - अब मैं जीवित करा दी गयी हूँ ।
शर्विलक--स्थावरक का क्या किया जाय ?
चारुदत्त--सदाचारी यह नौकर न रहे । ( धनवान् बना दिया जाय । ) वे चाण्डाल सभी चाण्डालों के अधिपति ( राजा ) बना दिये जाँय । चन्दनक सारी पृथिवी के अपराधियों को दण्ड देने का अधिकारी बना दिया जाय । उस राजा के शाले शकार की गतिविधियाँ जैसी पहले थीं वैसी ही अब भी रहें ।
शर्विलक--श्रीमान् जैसा कहते हैं वैसा ही होगा, लेकिन इस ( शकार ) को छोड़ दीजिये, छोड़ दीजिये, मार डालता हूँ ।
चारुदत्त-शरण में आये हुये को अभयदान है ।
( अपराधी शत्रु शरण में आया हो उसे शस्त्र से नहीं मारना चाहिये अपि तु उपकार द्वारा मारा हुआ कर देना चाहिये । इत्यादि १०।५५ वाँ पद्य पढ़ता है । )
शर्विलक--तो बताइये आपका और कौन सा प्रिय करूँ ?