भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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दशमोऽङ्कः ६४७

**चारुदत्तः—**एहि मैत्रेय ! (इत्यालिङ्गति ।)

**चेटी—**अहो ! संविधाणं । अज्ज ! वन्दामि । (अहो ! संविधानकम् । आर्य ! वन्दे ।) ( इति चारुदत्तस्य पादयोः पतिता । )

चारुदत्तः— ( पृष्ठे करं दत्त्वा ) रदनिके ! उत्तिष्ठ । ( इत्युत्थापयति । )

धूता— (वसन्तसेनां दृष्ट्वा ) दिट्ठिआ कुसलिणो बहिणीआ ? ( दिष्ट्या कुशलिनी भगिनी ? )

**वसन्तसेना—**अहुणा कुसलिणो संवृत्ताम्हि । ( अधुना कुशलिनी संवृत्तास्मि । ) ( इत्यन्योन्यमालिङ्गतः । )

**शर्विलकः—**दिष्टया जीवितसुहृद्वर्ग आर्यः ।

**चारुदत्तः—**युष्मत्प्रसादेन ।

**शर्विलकः—**आर्ये वसन्तसेने ! परितुष्टो राजा भवतीं वधूशब्देनानुगृह्णाति ।

**वसन्तसेना—**अज्ज ! किदत्थम्हि । ( आर्ये ! कृतार्थास्मि । )

शर्विलकः— ( वसन्तसेना मवगुण्ठ्य चारुदत्तं प्रति ) आर्य ! किमस्य भिक्षोः क्रियताम् ?

**चारुदत्तः—**भिक्षो ! किं तव बहुमतम् ?


**चारुदत्तः—**आओ मैत्रेय ! ( यह कहकर आलिंगन करता है । )

**चेटी—**अहो ! कैसा शुभ संयोग बना है । आर्य ! प्रणाम करती हूँ । ( यह कहकर चारुदत्त के पैरों पर गिर जाती है । )

चारुदत्त— ( पीठ पर हाथ रखकर ) रदनिका ! उठो । ( यह कह कर उठाता है । )

धूता— ( वसन्तसेना को देखकर ) सौभाग्यवश बहिन कुशलतायुक्त हैं ?

**वसन्तसेना—**अब कुशलयुक्त हो गयी हूँ । ( यह कह कर एक दूसरे का आलिंगन करती हैं । )

**शर्विलक—**सौभाग्यवश आर्य सुहृद्वर्गसहित जीवित हैं ।

**चारुदत्त—**तुम्हारी अनुकम्पा से ।

**शर्विलक—**सम्माननीय वसन्तसेना जी ! प्रसन्न राजा ( आर्यक ) आपको 'वधू' शब्द से अनुगृहीत ( अलंकृत ) कर रहे हैं ।

**वसन्तसेना—**आर्य ! मैं कृतार्थ हो गयी हूँ ।

शर्विलक— ( वसन्तसेना को घूंघट युक्त बनाकर चारुदत्त की ओर ) आर्य ! इस भिक्षु का क्या किया जाय ?

**चारुदत्त—**भिक्षु ! तुम्हारा सबसे अधिक अभीष्ट क्या है ?