भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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श्लोकानुक्रमणिका

| अङ्काः/श्लोकाः | | | अङ्काः/श्लोकाः | | | :--- | :---: | :---: | :--- | :---: | :---: | | | | | अमौक्तिकमसौवर्णम् | १० | १८ | | अंसेन विभ्रत्करवीरमालां | १० | २१ | अयं च सुरतज्वालः | ४ | ११ | | अग्राह्या मूर्धजेष्वेताः | ८ | २१ | अयं तव शरीरस्य | ४ | ७ | | अङ्गारकविरुद्धस्य | ६ | ३३ | अयं पटः सूत्रदरिद्रतां | २ | १० | | अत्थं शदं देमि शुवण्णअं | ८ | ४० | अयं हि पातकी विप्रो | ९ | ३६ | | अद्धं कलेवलं पडिवृत्तं | १० | ३५ | अयमेवंविधे काले | ६ | ३१ | | अद्याप्यस्य तथैव केश- | ८ | ५ | अये शस्त्रं मया प्राप्तं | ६ | २४ | | अनया हि समालब्धं | ३ | १५ | अलं चतुःशालमिमं प्रवेश्य | ३ | ७ | | अन्धआले पळाअन्ती | १ | ३१ | अवणेध बालअअणं | २ | १८ | | अन्धस्य दृष्टिरिव | ४ | ४६ | अवनतशिरसः प्रयाण | ८ | १५ | | अन्यं मनुष्यं हृदयेन | ४ | १६ | अवन्तिपुर्यां द्विजसार्थवाहो | १ | ६ | | अन्यस्यामपि जातौ मा | ८ | ४३ | अवहरइ कोवि तुरिअं | ६ | ११ | | अन्यासु भित्तिषु मया | ३ | १४ | अविज्ञातावसवेतेन | १ | ५४ | | अपण्डितास्ते पुरुषा मता मे | ४ | १२ | अशरणशरणप्रमोद- | ८ | ४ | | अपतितमपि तावत्सेव० | ८ | ४२ | अशी शुतिक्खे वलिदे | १ | ३० | | अपद्मा श्रीरेशा प्रहरणम् | ५ | १२ | असौ हि दत्त्वा तिमिराव० | ३ | ६ | | अपश्यतोऽद्य तां कान्तां | ७ | ६ | अस्मत्समक्षं हि वसन्तसेना | ९ | ३० | | अपापानां कुले जाते | ६ | ३७ | अह्मेहि चण्डं अहि | १ | २८ | | अप्येष नाम परिभूत- | ८ | २६ | | | | | अप्रीतिर्भवतु विमुच्यतां | ८ | ४१ | आअच्छध वीसत्था | ६ | ६ | | अभ्युदये अवशाणे | १० | १६ | आअट्टिदे शलोशं | १० | ३७ | | अब्भअं तुह देह हरो | ६ | २७ | आकर्षन्तु सुबद्ध्येनं | १० | ५३ | | अभ्युक्षितोऽसि सलिलैः | ६ | १६ | आत्मभाग्यक्षतद्रव्यः | ३ | २७ | | अमी हि दृष्ट्वा मदुपेतमेत- | १० | ६ | आर्येकेणार्यवृत्तेन | १० | ५१ | | अमी हि वस्त्रान्तनिरुद्ध- | १० | १६ | आलाने गृह्यते हस्ती | २ | ५० | | अमी हि वृक्षाः फलपुष्प- | ८ | ७ | आलोकविशाला मे | १ | ३६ | | अमूंहि भित्त्वा जलदान्तराणि | ५ | ४४ | आलोकितं गृहशिखण्डिभिः | ५ | १ |

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