मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ
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| ६६४ | मृच्छकटिकम् |
|---|
| अङ्काः/श्लोकाः | अङ्काः/श्लोकाः | ||
|---|---|---|---|
| धन्यानि तेषां खलुजीवितानि | ५ ४९ | पूर्वं मानादवज्ञाय | ८ १७ |
| धाराभिरार्यजनचित्त | ५ ४५ | पूर्वानुबद्धवैरेण | १० ४५ |
| धिगस्तु खलु दारिद्र्यं | ३ १९ | प्रभवति यदि धर्मो दूषित- | १० ३४ |
| न | प्रविश गृहमिति प्रतोद्यमाना | १ ५६ | |
| न खलु मम विषादः | ४ २० | प्रसरसि भयविक्लवा | १ २४ |
| न गणयति पराभवं | २ ७ | प्राप्तोऽहं व्यसनकृतां | १० २५ |
| न पर्वताग्रे नलिनी | ४ १७ | प्राप्यैतद्व्यसनमहार्णवं | १० ३३ |
| न भीतो मरणादस्मि | १० २७ | प्रियसहृदयकारणे | ४ २७ |
| न महीतलस्थितिसहानि | १० ५६ | ब | |
| नयनसलिलसिक्तं | १० ३ | बलाकपाण्डुरोष्णीषं | ५ १६ |
| नरपतिपुरुषाणां | ७ ३ | बहुकुसुमविचित्तिदा | ८ ८ |
| निःश्वासोऽस्य न शङ्कितः | ३ १८ | बालां स्त्रियं च नगरस्य | ८ १३ |
| निवासश्चिन्तायाः | १ १५ | भ | |
| निष्पन्दीकृतपद्मखण्ड | ५ २४ | भण कस्स जम्मछट्ठो | ६ १० |
| नृणां लोकान्तरस्थानां | ६ ४२ | भवेद गोष्ठीयानं न च | ६ ४ |
| नृपतिपुरुषशङ्कितप्रचारं | ३ १० | भाग्यानि मे यदि तदा | ६ २ |
| नो मुष्णाम्यबलां | ४ ६ | भीदामअपपदारणं | ६ १६ |
| प | भीमस्यान्तरिष्यामि | ६ १७ | |
| पक्षविकलश्च पक्षी | ५ ४१ | भुजग इव गतो गिरिः | ३ २१ |
| पङ्कक्लिन्नमुखाः पिबन्ति | ५ १४ | भैक्ष्येणाप्यर्जयिष्यामि | ३ २६ |
| पंचउज्जण जेण मालिद | ८ २ | भो मेघ गम्भीरतरं नद | ५ ४७ |
| पदमव्याकोशं भास्करं | ३ १३ | म | |
| परगृहललिताः परान्नपुष्टाः | ४ २८ | मंशेण तिक्खामिलकेण | १० २९ |
| परिजनैकथासक्तः | ४ ३ | मखशतपरिपूतं गोत्रमु | १० १२ |
| परिज्ञातस्य मे राज्ञा | ६ ८ | मदनमपि गुणैर्विशेषयन्ती | ४ ४ |
| पर्यङ्कग्रन्थिबन्धद्विगुणित | १ १ | मम मअणअणंम | १ २१ |
| पवनचपलवेगः स्थूल | ५ १७ | मया किल नृशंसेन | ९ ३८ |
| पश्यन्ति मां दशदिशो | ८ २४ | मया खलु नृशंसेन | ९ ३० |
| पातु वो नीलकण्ठस्य | १ २ | मयाप्ता महती बुद्धिः | ४ २२ |
| पादप्यह्ररपरिभव | ६ २३ | मयि विनिहितदृष्टिः | ६ १९ |
| पादेनैकेन गगने | २ ११ | महावाताध्मातंमहिष | ५ २२ |