मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ
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श्लोकानुक्रमणिका
६६३
ज
| श्लोक | अङ्कः | श्लोकाः |
|---|---|---|
| जइ वज्जसि पादालं | २ | ३ |
| जदिच्छशे लंवदशाविशालं | ८ | २२ |
| जधा जधा वशदि अब्भ | ५ | १० |
| जयति वृषभकेतुर्दक्षयज्ञ- | १० | ४६ |
| जलधर निलंज्जस्त्वं | ५ | २८ |
| जाणंतो वि हु जादि | ६ | २१ |
| जाणामि चारुदत्तं | ६ | १५ |
| जाणामि ण कीलिशं | २ | ६ |
| जादी तुज्झ विसुद्धा | ६ | २३ |
| जूदेण तं कदं मे | २ | १७ |
| जे अत्तबलं जाणिआ | २ | १४ |
| जे चुम्बदे अम्बिकम!दु | ८ | १२ |
| जेण-म्हि गब्भदाशे | ८ | २५ |
| ज्ञातीन्विटाम्स्वभुज- | ४ | २६ |
| ज्ञातो हि किं नु खलु | ६ | ६ |
झ
| श्लोक | अङ्कः | श्लोकाः |
|---|---|---|
| झाणज्झणंतबहुभूषण | १ | २५ |
ण
| श्लोक | अङ्कः | श्लोकाः |
|---|---|---|
| णअलीपधाणभूदे | १० | ८ |
| ण अलुमदि अंतलिक्खे | १० | ६ |
| णवबंधणमुक्काए | २ | १ |
| णहमज्जगदे शूले | ८ | १० |
| ण हु अम्हे चांडाला | १० | २२ |
| णिव्वक्कलं मूलकपेशिवण्णं | १ | ५२ |
| ण्हादेहं शलिलजलेहिं | ६ | १ |
त
| श्लोक | अङ्कः | श्लोकाः |
|---|---|---|
| तक्किक ण केलअ कालण | १० | १ |
| तं तस्य स्वरसंक्रमं | ३ | ५ |
| तपसा मनसा वाग्भिः | १ | १६ |
| तयोरिदं सत्सुरतोत्सवा- | ३ | ७ |
| तरुणजनसहायश्चिन्त्यतां | १ | ३१ |
| तालीषु तारं विटपेषु मन्द्रं | ५ | ५२ |
| तुलनां चाद्रिराजस्य | ६ | २० |
| तेनास्म्यकृतवैरेण | १० | २८ |
| त्यजति किल तं जयश्रीः | ६ | १८ |
| त्रेता हृतसर्वस्वः | १ | ९ |
| त्वत्स्नेहबद्धहृदयो हि | ४ | ६ |
| त्वदर्थमेतद्विनिपात्य- | १० | ४३ |
| त्वद्यानं यः समारुह्य | १० | ५२ |
| त्वरया सर्पणं तत्र | १० | ५७ |
द
| श्लोक | अङ्कः | श्लोकाः |
|---|---|---|
| दत्त्वा निशाया वचनीय- | ४ | १ |
| दाक्षिण्योदकवाहिनी | ८ | ३८ |
| दारिद्र्यं शोचामि भवन्त- | १ | ३८ |
| दारिद्र्यात्पुरुषस्य | १ | ३६ |
| दारिद्र्याद्ध्रियमेति | १ | १४ |
| दारिद्र्यान्मरणाद्वा | १ | ११ |
| दारिद्र्येणाभिभूतेन | ४ | ५ |
| दिण्णकलवीलदामे | १० | २ |
| दिष्ट्या भो व्यसनमहार्णवा- | १० | ४६ |
| दीनानां कल्पवृक्ष- | १ | ४८ |
| दुर्बलं नृपतेश्चक्षुः | ९ | ३२ |
| दुर्वर्णोऽसि विनष्टोऽसि | २ | १३ |
| दुष्टात्मा परगुणमत्सरी | ६ | २७ |
| देशः को नु जलावसेकशिथि- | ३ | १२ |
| दो ज्जेव पूअणीओ | ६ | १४ |
| द्रव्यं लब्धं द्यूतेनैव | २ | ८ |
| द्वयमिदमतीव लोके | ४ | २५ |
| द्विरदेन्द्रगतिश्चकोरनेत्रो | १ | ३ |
ध
| श्लोक | अङ्कः | श्लोकाः |
|---|---|---|
| धनैर्वियुक्तस्य नरस्य लोके | ५ | ४० |