मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ
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६६२ मृच्छकटिकम्
क
| पाठः | अङ्काः | श्लोकाः |
|---|---|---|
| कः श्रद्धास्यति भूतार्थं | ३ | २४ |
| ,, ,, | ५ | ३४ |
| कत्ताशददे णिण्णाणअश्व | २ | ५ |
| करिकरसमबाहुः | ७ | ५ |
| कञ्चुलुआ गोच्छड | १ | ५१ |
| कस्सट्ठमो दिणअरो | ६ | ९ |
| कस्स तुहं तणुमज्झे | २ | १६ |
| कर्हि कर्हि सुसहिअ | २ | ४ |
| कांश्चित्तुच्छयति प्रपूरयति | १० | ६० |
| का उण तुलिदं एशा | १० | ३८ |
| कामं नीचमिदं वदन्तु | ३ | ११ |
| कामं प्रदोषतिमिरेण | १ | ३५ |
| किं अच्छध वीसट्ठा | ६ | ५ |
| किं यात्यस्य पुराः शनैः प्रवहणं | ७ | २ |
| किं याशि धावशि पलाअशि | १ | १८ |
| किं यासि बालकदली | १ | २० |
| किं शवके वालिपुत्ते महि | ८ | ३४ |
| किं कुलेनोपदिष्टेन | ८ | २६ |
| , ,, | ६ | ७ |
| किं ते ह्यहं पूर्वप्रतिप्रसक्ता | ५ | २६ |
| किं त्वं कटीतटनिवे० | १ | २७ |
| किं त्वं पदैर्मम पदानि | १ | २२ |
| किं त्वं भयेन परिवर्तित- | १ | १७ |
| किं नु नाम भवेत्कार्यम् | ८ | २६ |
| किं नु स्वर्गत्पुनः प्राप्ता | १० | ४० |
| किं पेक्खध छिज्जंतं | १० | ४ |
| किं पेक्खध शप्पुलीशं | १० | २४ |
| किं भीमशेणे जमदग्निपुत्ते | १ | २९ |
| कुतो बाष्पाम्बुधाराभिः | १० | ४२ |
| कृत्वा शरीरपरिणाहसुख- | ३ | ६ |
| कृत्वा समुद्रमुदकोच्छ्रय- | ६ | २२ |
| कृत्वैवं मनुजपतेर्महद्व्यलोकं | ७ | ८ |
| केयमभ्युद्यते शस्त्रे | १० | ३६ |
| केशवगात्रश्यामः | ५ | ३ |
| को तं गुणरविदं | ६ | १३ |
| कोऽयमेवंविधे काले | १० | २६ |
| क्षीरिण्यः सन्तु गावो | १० | ६० |
| क्षेमेण व्रज बान्धवान् | ७ | ७ |
ख
| पाठः | अङ्काः | श्लोकाः |
|---|---|---|
| खणेण गंठी खणजूलके मे | ६ | २ |
| खलचरित निकृष्टजात- | ८ | ३२ |
ग
| पाठः | अङ्काः | श्लोकाः |
|---|---|---|
| गता नाशं तारा उप | ५ | २५ |
| गर्जन्ति शैलशिखरेषु | ५ | १३ |
| गर्जं वा वर्ष वा शक्र | ५ | ३१ |
| गुणप्रवालं विनयप्रशाखं | ४ | ३२ |
| गुणेषु यत्नः पुरुषेण कार्यः | ४ | २३ |
| गुणेष्वेव हि कर्तव्यः | ४ | २२ |
घ
| पाठः | अङ्काः | श्लोकाः |
|---|---|---|
| घोणोन्नतं मुखमपाङ्ग | ६ | १६ |
च
| पाठः | अङ्काः | श्लोकाः |
|---|---|---|
| चन्दनश्चन्द्रशीलाढ्यो | ६ | २६ |
| चाणक्केन जधा शीदा | ८ | ३५ |
| चालुदत्तविणाशाय | ८ | ४४ |
| चिन्तासक्तनिमग्नमन्त्रि | ६ | १४ |
| चिरं खलु भविष्यामि | १० | १७ |
छ
| पाठः | अङ्काः | श्लोकाः |
|---|---|---|
| छन्नं कार्यमुपक्षिपन्ति | ६ | ३ |
| छन्नं दोषमुदाहरन्ति | ९ | ४ |
| छायार्थं ग्रीष्मसंतप्तो | ४ | १८ |
| छायासु प्रतिमुक्तशष्प० | ८ | ११ |