मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ
पृष्ठ 754, कुल 760 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 754
६६६ मृच्छकटिकम्
| अङ्काः | श्लोकाः | अङ्काः | श्लोकाः | ||
|---|---|---|---|---|---|
| वैदेश्येन कृतो भवेन्मम | ३ | २३ | स तावदस्माद्व्यसनार्णवो- | ७ | ४ |
| व्यवहारः सविघ्नोऽयं | ६ | १८ | सत्यं न मे विभवनाश- | १ | १३ |
| श | सदा प्रदोषो मम याति | ५ | ३१ | ||
| शंजम्मध णिअपोटं | ८ | १ | समरव्यसनी प्रमादशून्यः | १ | ५ |
| शक्कालधणे क्खु शुज्जणे | २ | १५ | समुद्रवीचीव चलस्वभावाः | ४ | १५ |
| शत्रुः कृतापराधः | १० | ५४ | सर्वगात्रेषु विन्यस्तैः | १० | ५ |
| शरच्चन्द्रप्रतीकाशं | ८ | १६ | सव्यं मे स्पन्दते चक्षुः | ९ | १५ |
| शब्बकालं मए पुश्ते | ८ | २८ | साटोपकूटकपटावृत- | ५ | ३६ |
| शब्बे क्खु होइ लोए | १० | १५ | सिण्णसिलाअलहत्थो | ६ | २२ |
| शशिविमलमयूख- | १० | १३ | सीधुसुरासवमत्तिआ | ४ | ३० |
| शशपलक्कवलद्दे | ३ | २ | सुअणे क्खु भिच्चवाणु कम्पके | ३ | १ |
| शास्त्रज्ञः कपटानुसार- | ९ | ५ | सुखं हि दुःखान्यनुभूय | १ | १० |
| शिखा प्रदीपस्य सुवर्ण- | ३ | १५ | सुदृष्टः क्रियतामेषः | ४ | २४ |
| शिल मुण्डिद तुण्ड मुण्डिदे | ८ | ३ | सोऽस्मद्विधानां प्रणयैः | १ | ४६ |
| शिलशि मम णिलीणे | ८ | १२ | स्खलति चरणं भूमौ न्यस्तं | ६ | ३ |
| शुक्खा हि ववदेशाशे | १० | २० | स्तम्भेषु प्रचलितवेदि- | ५ | ५० |
| शुवण्णं देमि पिअं | ८ | ३१ | स्त्रियो हि नाम खल्वेताः | ४ | १९ |
| शुष्कवृक्षस्थितो ध्वाङ्क्षः | ६ | ११ | स्त्रीभिर्विमानितानां | ८ | ९ |
| शून्यमपुत्रस्य गृहं | १ | ८ | स्त्रीषु न रागः कार्यः | ४ | १३ |
| शून्यैर्गृहैः खलु समाः | ५ | ४२ | ह | ||
| शूले विवकंते पंडवे | १ | ४७ | हत्थशंजदो मुहशंजदो | ८ | ४७ |
| स | हत्वा तं कुन्नृपमहं हि | १० | ४७ | ||
| सगं नैव हि कश्चिदस्य | १ | ३७ | हत्वा रिपुं तं बलमन्त्रिहीनं | १० | ४८ |
| संस्रवत्तैरिव चक्रवाक- | ५ | ५ | हा प्रेयसि प्रेयसि विद्यमाने | १० | ५७ |
| संभ्रमघग्घरकण्ठो | ६ | १० | हिंगुज्जले जीरकमद्दमृश्ते | ८ | १३ |
| सकामान्विष्यतेऽस्माभिः | १ | ४४ | हिंगुज्जले दिण्णमरीचचुण्णे | ८ | १४ |
| सच्चेण सुहं क्खु लब्भइ | ६ | ३५ | हित्वाहं नरपतिबन्धनाप- | ६ | १ |