भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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परिशिष्ट

छन्दोविवेचन

छन्दःशास्त्र के अनुसार संस्कृत के प्रत्येक श्लोक में चार पाद या चरण होते हैं। इन छन्दों के दो भेद हैं—(१) वर्णवृत्त और (२) मात्रिक। वर्णवृत्तों में प्रत्येक चरण के वर्णों की गणना की जाती है और मात्रिक छन्दों में प्रत्येक चरण की मात्राओं की गणना की जाती है। वर्णवृत्तों को वृत्त और मात्रिक छन्दों को जाति कहा जाता है, ये तीन प्रकार के होते हैं--(१) समवृत्त—इसके चारों चरणों में वर्णों की संख्या बराबर-बराबर होती है। (२) अर्धसमवृत्त—इसमें प्रथम और तृतीय चरण में तथा द्वितीय और चतुर्थ चरण में वर्णों की संख्या समान रहती है। (३) विषमवृत्त—इसमें सभी चरणों में समानता नहीं रहती है। इसका प्रयोग कम मिलता है।

गणपरिचय—

वर्णवृत्तों में वर्णों की गणना के लिये 'गण' का उपयोग होता है। एक गण में तीन वर्ण होते हैं। ये गण आठ हैं—(१) यगण, (२) मगण, (३) तगण, (४) रगण, (५) जगण, (६) भगण, (७) नगण, (८) सगण। इनमें लघु वर्ण के लिये '।' ऐसा और गुरु के लिये 'ऽ' ऐसा चिह्न प्रयुक्त होता है। किस गण में कौन ह्रस्व और कौन गुरु होता है इनके लिये निम्न सूत्र प्रसिद्ध है—

'यमाताराजभानसलगा।'

इसका स्पष्ट ज्ञान इस श्लोक से होता है—

“आदिमध्यावसानेषु य-र-ता यान्ति लाघवम्।
भजसा गौरवं यान्ति, मनौ तु गुरुलाघवम्॥”

जो सामान्यतया दीर्घ=गुरु प्रसिद्ध हैं उनके अतिरिक्त अनुस्वार वाला, विसर्ग वाला तथा संयुक्त अक्षर के पूर्व का लघु वर्ण भी गुरु माना जाता है। पाद के अन्त का लघु वर्ण विकल्प से गुरु माना जा सकता है—

“सानुस्वारश्च दीर्घश्च विसर्गी च गुरुर्भवेत्।
वर्णः संयोगपूर्वश्च तथा पादान्तगोऽपि वा॥”

छन्दों के लक्षणों में यति=विराम का भी निर्देश रहता है।