मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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मृच्छकटिक में प्रयुक्त छन्द—
मृच्छकटिक में विविध छन्दों का सुन्दर प्रयोग किया गया है यहाँ उनका संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है।
(१) अनुष्टुप् या श्लोक—
श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं सर्वत्र लघु पंचमम् । द्विचतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः ॥ अथवा पंचमं लघु सर्वत्र सप्तमं द्विचतुर्थयोः । षष्ठं गुरु विजानीयाच्छेषेषु नियमो न हि ॥
इसके चार चरणों में आठ-आठ अक्षर होते हैं। इनमें पंचम लघु और षष्ठ गुरु होता है। द्वितीय और चतुर्थ चरण में सप्तम लघु होता है। शेष के लिये कोई नियम नहीं है। उदा० प्रथम अंक में २, १६, ३४ आदि।
(२) आर्या—
यस्याः प्रथमे पादे द्वादशमात्रास्तथा तृतीयेऽपि । अष्टादश द्वितीये चतुर्थके पंचदश साऽर्या ॥
यह मात्रिक वृत्त है। इसके प्रथम पाद में १२ मात्रायें, द्वितीय में १८, तृतीय में १२ और चतुर्थ में १५ मात्रायें होती हैं। यह छन्द भी सरलतया समझा जाता है। मृच्छकटिक में इसका पर्याप्त प्रयोग है। उदा० प्रथम अंक में ८, ११, ३३ आदि श्लोक हैं।
(३) इन्द्रवंशा—
तच्चेन्द्रवंशा प्रथमाक्षरे गुरौ ।
यह वंशस्थ के समान है। इसका प्रथम वर्ण गुरु होता है। यह स्वतन्त्ररूप से नहीं प्रयुक्त है। यह उपजाति के रूप में प्रयुक्त है। प्रथम अंक का ४६ और तृतीय का ७ श्लोक इसका उदा० है।
(४) इन्द्रवज्रा—
स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः ।
प्रत्येक चरण में तगण तगण जगण और दो गुरु वर्णों के क्रम से ११ वर्ण होते हैं। उदा० चतुर्थ अंक का १६, पंचम का ४६ और दशम का ११, २१, ४८, ५८ श्लोक हैं।
(५) उपजाति—
स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः । उपेन्द्रवज्रा जतजास्ततो गौ ।