भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 757, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 757

परिशिष्ट ६६१

“अनन्तरोदीरितलक्ष्मभाजो पादौ यदीयावुपजातयस्ताः ।
इत्थंक्लिवान्यास्वपि मिश्रितासु वदन्ति जातिष्विदमेव नाम ।”

इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा के दो-दो पादों के मिलने पर इसी प्रकार अन्य छन्दों के मिलने पर ‘उपजाति’ भेद माना जाता है। इस छन्द का पर्याप्त प्रयोग किया गया है। उदा० प्रथम अंक का ३८, ४६, तृतीय अंक का ६, चतुर्थ अंक का १, १२, १५, ३२, पंचम अंक का २१, २९, ४०, ४७, ५२, अष्टम अंक का २७, ३०, नवम अंक का १० २६, और दशम अंक का ६, १६, ४०, ४३ श्लोक ।

(६) उपेन्द्रवज्रा--

उपेन्द्रवज्रा जतजास्ततो गौ ।

इसमें जगण, तगण, जगण के बाद दो गुरु वर्ण होते हैं। यह प्रथम अंक में ६ चतुर्थ में २३ और षष्ठ में ३ श्लोक में है।

(७) गीति :-

आर्यापूर्वार्धसमं द्वितीयमपि यत्र भवति हंसगते ।
छन्दोविदस्तदानीं गीति ताममृतवाणि भाषन्ते ॥

यह आर्या के समान होता है केवल अन्तिम पाद में १५ के स्थान पर १८ मात्रायें होती हैं। यह चतुर्थ अंक के ३४ वें श्लोक में है। इसे ‘उद्गाथा’ भी कहते हैं।

(८) पथ्यावक्त्र--

युजोश्चतुर्थतो जेन पथ्यावक्त्रं प्रकीर्तितम् ।

अनुष्टुप् छन्द के द्वितीय और चतुर्थ चरण में जब चतुर्थ अक्षर के बाद जगण आता है तब यह छन्द होता है। वास्तव में यह अनुष्टुप् का भेद हैं। मृच्छकटिक में इसका प्रचुर प्रयोग है। प्रथम अंक के—२, ५४, ५८, द्वितीय अंक के १२, तृतीय अंक के १६, २४, २५, २७, २८, २६, चतुर्थ अंक के ५, ७, ८, १८, १९, २१, पंचम अंक के ७, १६, ३९, षष्ठ अंक के १७, २६, सप्तम अंक के ६, अष्टम अंक के ६, १६, १७, २१, २८, २६, ३६, नवम अंक के ७, ८, ११, १८, २०, २४, ३०, ३१, ३२, ३३, ३६, ३७, ३८, ३६, ४२, दशम अंक के ५, १७, १८, २३, २६, २७, २८, ३२, ३९, ४१, ४२, ४५, ५०, ५१, ५२, ५६।

(६) पुष्पिताग्रा--

अयुजि नयुगरेफतो यकारो युजि च नजो जरगाश्च पुष्पिताग्रा ।