मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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यह अर्धसम वृत्त है। इसके प्रथम और तृतीय चरण में नगण, नगण, रगण, यगण-इस क्रम से १२ अक्षर होते हैं। और द्वितीय तथा चतुर्थ चरण में नगण, जगण, जगण, रगण और अन्त में एक गुरु-इस क्रम से १३ अक्षर होते हैं। यह प्रथम अंक के २४, ५६, द्वितीय अंक के ७, तृतीय अंक के १०, २१, २२, चतुर्थ अंक के ४, २७, २८, अष्टम अंक के ४, ८, १५, ३२ और दशम अंक का १३ श्लोक।
(१०) प्रमिताक्षरा--
प्रमिताक्षरा सजससैः कथिता।
इसके पाद में सगण, जगण, सगण, सगण---इस क्रम से १२ अक्षर होते हैं। यह दशम अंक के ५६ श्लोक में हैं।
(११) प्रहर्षिणी--
त्र्याशाभिर्मनजरगा प्रहर्षिणीयम्।
इसके प्रत्येक पाद में मगण, नगण, जगण, रगण और एक गुरु-इस क्रम से १३ अक्षर होते हैं। इसमें ३ और १० पर यति होती है। यह चतुर्थ अंक के २, पञ्चम के ५०, षष्ठम् के १, सप्तम के ८, अष्टम के ४१, नवम के २७ और दशम के २५, ३३, ४७, ४९, श्लोक में है।
(१२) मालभारिणी--
विषमे ससजा गुरू समे चेत् सभरा यैन तु मालभारिणीयम्।
इसे औपच्छन्दसिक भी कहा जाता है। इसमें प्रथम तथा तृतीय पादों में सगण, सगण, जगण और दो गुरु-इस क्रम में ११, ११ अक्षर होते हैं। द्वितीय और चतुर्थ पादों में सगण, भगण, रगण और यगण--इस क्रम से १२, १२ अक्षर होते हैं। यह अर्ध समवृत्त है। यह प्रथम अंक के ३, ५० श्लोक में है।
(१३) मालिनी--
ननमययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः।
इसमें नगण, नगण, मगण, यगण, यगण इस क्रम से १५ अक्षर प्रत्येक पाद में होते हैं। ८ और ७ वर्णों पर यति होती है। यह प्रथम अंक के ३१, ५७, चतुर्थ अंक के २०, पंचम अंक के १७, सप्तम अंक के ३, ५, अष्टम अंक के ४२, नवम अंक के १२, ४३, दशम अंक के ३, १२, ३४, ४६ श्लोक में है।
(१४) वंशस्थ--
जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ।
इसके प्रत्येक पाद में जगण, तगण, जगण, रगण-इस क्रम से १२ अक्षर होते हैं। यह प्रथम अंक के ७, १०, ५३, तृतीय अंक के ८, १७, पंचम अंक के ३७,