भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

६७० मृच्छकटिकम्

यह अर्धसम वृत्त है। इसके प्रथम और तृतीय चरण में नगण, नगण, रगण, यगण-इस क्रम से १२ अक्षर होते हैं। और द्वितीय तथा चतुर्थ चरण में नगण, जगण, जगण, रगण और अन्त में एक गुरु-इस क्रम से १३ अक्षर होते हैं। यह प्रथम अंक के २४, ५६, द्वितीय अंक के ७, तृतीय अंक के १०, २१, २२, चतुर्थ अंक के ४, २७, २८, अष्टम अंक के ४, ८, १५, ३२ और दशम अंक का १३ श्लोक।

(१०) प्रमिताक्षरा--

प्रमिताक्षरा सजससैः कथिता।

इसके पाद में सगण, जगण, सगण, सगण---इस क्रम से १२ अक्षर होते हैं। यह दशम अंक के ५६ श्लोक में हैं।

(११) प्रहर्षिणी--

त्र्याशाभिर्मनजरगा प्रहर्षिणीयम्।

इसके प्रत्येक पाद में मगण, नगण, जगण, रगण और एक गुरु-इस क्रम से १३ अक्षर होते हैं। इसमें ३ और १० पर यति होती है। यह चतुर्थ अंक के २, पञ्चम के ५०, षष्ठम् के १, सप्तम के ८, अष्टम के ४१, नवम के २७ और दशम के २५, ३३, ४७, ४९, श्लोक में है।

(१२) मालभारिणी--

विषमे ससजा गुरू समे चेत् सभरा यैन तु मालभारिणीयम्।

इसे औपच्छन्दसिक भी कहा जाता है। इसमें प्रथम तथा तृतीय पादों में सगण, सगण, जगण और दो गुरु-इस क्रम में ११, ११ अक्षर होते हैं। द्वितीय और चतुर्थ पादों में सगण, भगण, रगण और यगण--इस क्रम से १२, १२ अक्षर होते हैं। यह अर्ध समवृत्त है। यह प्रथम अंक के ३, ५० श्लोक में है।

(१३) मालिनी--

ननमययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः।

इसमें नगण, नगण, मगण, यगण, यगण इस क्रम से १५ अक्षर प्रत्येक पाद में होते हैं। ८ और ७ वर्णों पर यति होती है। यह प्रथम अंक के ३१, ५७, चतुर्थ अंक के २०, पंचम अंक के १७, सप्तम अंक के ३, ५, अष्टम अंक के ४२, नवम अंक के १२, ४३, दशम अंक के ३, १२, ३४, ४६ श्लोक में है।

(१४) वंशस्थ--

जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ।

इसके प्रत्येक पाद में जगण, तगण, जगण, रगण-इस क्रम से १२ अक्षर होते हैं। यह प्रथम अंक के ७, १०, ५३, तृतीय अंक के ८, १७, पंचम अंक के ३७,

परिशिष्ट ६७१

सप्तम अंक के ४, अष्टम अंक के ७, नवम अंक के २५ श्लोक में है। इसे वंशस्थ बिल भी कहा जाता है।

(१५) वसन्ततिलका--

उक्ता वसन्ततिलका त-भ-जा जगौ गः ।

इसके प्रत्येक चरण में तगण, भगण, जगण; जगण और दो गुरु—इस क्रम से १४-१४ वर्ण होते हैं। यह छन्द प्रचुर रूपेण प्रयुक्त है। प्रथम अंक के ९, १२, १३, १७, २०, २२, २७, ३५, ४६, तृतीय अंक के ३, ४, ९, १४, १६, चतुर्थ अंक के ६, १४, २६, पंचम अंक के १, २, ४, ८, १३, १५, ३३, ३६, ४२, ४५, षष्ठ अंक के २, अष्टम अंक के २३, २४, २६, नवम अंक के ६, १६, १६, २२, २८, २६, ३४, दशम अंक के ३१, ३४, श्लोक में हैं।

(१६) विद्युन्माला--

मो मो गो गो विद्युन्माला ।

इसके प्रत्येक पाद में मगण, मगण और दो गुरु-इस क्रम से ८, ८ अक्षर होते हैं। यह द्वितीय अंक के ८ श्लोक में है।

(१७) वैश्वदेवी--

वाणार्श्वेश्चिन्ना वैश्वदेवी ममौ यौ ।

इसके प्रत्येक पाद में मगण, मगण, यगण, यगण,—इस क्रम से १२ वर्ण होते हैं। पंचम वर्ण के बाद यति होती है। यह तृतीय अंक के १३ वें श्लोक में है।

(१८) शार्दूलविक्रीडित -

सूर्याश्वैर्यदि मः सजौ सततगाः शार्दूलविक्रीडितम् ।

इसके प्रत्येक पाद में क्रमशः मगण, सगण, जगण, सगण, तगण, तगण और अन्त में एक गुरु वर्ण मिलाकर १९ वर्ण होते हैं। इसमें १२ और ७ वर्ण पर यति होती है। इसका पर्याप्त प्रयोग किया गया है। यह प्रथम अंक के १, १४, ३२, ३६ ३७, द्वितीय अंक के १२, तृतीय अंक के ५, ११, १२, १८, २०, २३, चतुर्थ अंक के ६, पंचम अंक के ५, ६, १४, १८, २०, २३, २४, २७, ३५, ४६, सप्तम अंक के २, ७, अष्टम अंक के ५, ११, २८, नवम अंक के ३, ४, ५, १४, दशम अंक के ६० श्लोक में है।

(१६) शिखरिणी--

रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमनसभलागः शिखरिणी ।

इस छन्द के प्रत्येक पाद में यगण, मगण, नगण, सगण, भगण और अन्त में लघु और एक गुरु—इस क्रम से १७-१७ वर्ण होते हैं। इसमें ६ और ११ वर्ण

६७२ मृच्छकटिकम्

पर यति होती है। यह प्रथम अंक के १५, पञ्चम अंक के १२, २२, २५, षष्ठ अंक के ४ श्लोक में है।

(२०) सुमधुरा—

म्रौ म्नौ मो नो गुरुश्चेद् हयऋतुरसैरुक्ता सुमधुरा।

इस छन्द के प्रत्येक पाद में मगण, रगण, मगण, नगण, मगण, नगण, और एक गुरु--इस क्रम से १९ वर्ण होते हैं। इसमें ७ और १३ वर्ण पर यति होती है। यह नवम अंक के २१ श्लोक में है।

(२१) स्रग्धरा—

म्रभ्नैर्यानां त्रयेण त्रिमुनि-यतियुता स्रग्धरा कीर्तितेयम्।

इस छन्द के प्रत्येक पाद में मगण, रगण, भगण, नगण, यगण, यगण, यगण, इस क्रम से २१ वर्ण होते हैं। इसमें ७, ७, ७ वर्ण पर यति होती है। सामान्यतया प्रयुक्त छन्दों में यह सबसे बड़ा है। यह प्रथम अंक के १, ४, ४८ और दशम अंक के ५६, ६१ श्लोक में है।

(२२) हरिणी—

नसमरसलागा षड् वेदैर्हयैर्हरिणी मता।

इस छन्द के प्रत्येक पाद में नगण, सगण, मगण, रगण, सगण और लघु तथा अन्त में गुरु--इस क्रम से १७, १७ वर्ण होते हैं। इसमें ६, ४, ७ पर यति होती है। यह चतुर्थ अंक के ३ और नवम अंक के १३ श्लोक में है।

प्राकृत छन्द—

प्राकृत भाषा के विभिन्न रूपों का प्रयोग मृच्छकटिक में हुआ है। इस पर भूमिका में लिखा जा चुका है। प्राकृत के अनेक छन्द भी इसमें प्रयुक्त हैं। इनकी संस्कृतच्छाया भी मूल में दी गयी है। प्राकृतच्छन्दों के विषय में विशेष ज्ञान के लिये 'प्राकृत-पिंगल' आदि ग्रन्थ देखने चाहिये। यहाँ गाथा, आर्या, वैतालीय आदि छन्द प्रयुक्त हैं।

उपसंहार—

ऊपर यह प्रस्तुत किया जा चुका है कि मृच्छकटिक में लगभग २२ प्रकार के संस्कृत छन्दों का और कुछ प्राकृत छन्दों का प्रयोग किया गया है। परिशीलन से यह ज्ञात होता है कि इसके रचनाकार को (१) पथ्यावक्त्र, (२) वसन्ततिलका और (३) शार्दूलविक्रीडित छन्द अधिक प्रिय थे।

—:०:—