भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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परिशिष्ट ६७१

सप्तम अंक के ४, अष्टम अंक के ७, नवम अंक के २५ श्लोक में है। इसे वंशस्थ बिल भी कहा जाता है।

(१५) वसन्ततिलका--

उक्ता वसन्ततिलका त-भ-जा जगौ गः ।

इसके प्रत्येक चरण में तगण, भगण, जगण; जगण और दो गुरु—इस क्रम से १४-१४ वर्ण होते हैं। यह छन्द प्रचुर रूपेण प्रयुक्त है। प्रथम अंक के ९, १२, १३, १७, २०, २२, २७, ३५, ४६, तृतीय अंक के ३, ४, ९, १४, १६, चतुर्थ अंक के ६, १४, २६, पंचम अंक के १, २, ४, ८, १३, १५, ३३, ३६, ४२, ४५, षष्ठ अंक के २, अष्टम अंक के २३, २४, २६, नवम अंक के ६, १६, १६, २२, २८, २६, ३४, दशम अंक के ३१, ३४, श्लोक में हैं।

(१६) विद्युन्माला--

मो मो गो गो विद्युन्माला ।

इसके प्रत्येक पाद में मगण, मगण और दो गुरु-इस क्रम से ८, ८ अक्षर होते हैं। यह द्वितीय अंक के ८ श्लोक में है।

(१७) वैश्वदेवी--

वाणार्श्वेश्चिन्ना वैश्वदेवी ममौ यौ ।

इसके प्रत्येक पाद में मगण, मगण, यगण, यगण,—इस क्रम से १२ वर्ण होते हैं। पंचम वर्ण के बाद यति होती है। यह तृतीय अंक के १३ वें श्लोक में है।

(१८) शार्दूलविक्रीडित -

सूर्याश्वैर्यदि मः सजौ सततगाः शार्दूलविक्रीडितम् ।

इसके प्रत्येक पाद में क्रमशः मगण, सगण, जगण, सगण, तगण, तगण और अन्त में एक गुरु वर्ण मिलाकर १९ वर्ण होते हैं। इसमें १२ और ७ वर्ण पर यति होती है। इसका पर्याप्त प्रयोग किया गया है। यह प्रथम अंक के १, १४, ३२, ३६ ३७, द्वितीय अंक के १२, तृतीय अंक के ५, ११, १२, १८, २०, २३, चतुर्थ अंक के ६, पंचम अंक के ५, ६, १४, १८, २०, २३, २४, २७, ३५, ४६, सप्तम अंक के २, ७, अष्टम अंक के ५, ११, २८, नवम अंक के ३, ४, ५, १४, दशम अंक के ६० श्लोक में है।

(१६) शिखरिणी--

रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमनसभलागः शिखरिणी ।

इस छन्द के प्रत्येक पाद में यगण, मगण, नगण, सगण, भगण और अन्त में लघु और एक गुरु—इस क्रम से १७-१७ वर्ण होते हैं। इसमें ६ और ११ वर्ण