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मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

६६८ मृच्छकटिकम्

मृच्छकटिक में प्रयुक्त छन्द—

मृच्छकटिक में विविध छन्दों का सुन्दर प्रयोग किया गया है यहाँ उनका संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है।

(१) अनुष्टुप् या श्लोक—

श्लोके षष्ठं गुरु ज्ञेयं सर्वत्र लघु पंचमम् । द्विचतुष्पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः ॥ अथवा पंचमं लघु सर्वत्र सप्तमं द्विचतुर्थयोः । षष्ठं गुरु विजानीयाच्छेषेषु नियमो न हि ॥

इसके चार चरणों में आठ-आठ अक्षर होते हैं। इनमें पंचम लघु और षष्ठ गुरु होता है। द्वितीय और चतुर्थ चरण में सप्तम लघु होता है। शेष के लिये कोई नियम नहीं है। उदा० प्रथम अंक में २, १६, ३४ आदि।

(२) आर्या—

यस्याः प्रथमे पादे द्वादशमात्रास्तथा तृतीयेऽपि । अष्टादश द्वितीये चतुर्थके पंचदश साऽर्या ॥

यह मात्रिक वृत्त है। इसके प्रथम पाद में १२ मात्रायें, द्वितीय में १८, तृतीय में १२ और चतुर्थ में १५ मात्रायें होती हैं। यह छन्द भी सरलतया समझा जाता है। मृच्छकटिक में इसका पर्याप्त प्रयोग है। उदा० प्रथम अंक में ८, ११, ३३ आदि श्लोक हैं।

(३) इन्द्रवंशा—

तच्चेन्द्रवंशा प्रथमाक्षरे गुरौ ।

यह वंशस्थ के समान है। इसका प्रथम वर्ण गुरु होता है। यह स्वतन्त्ररूप से नहीं प्रयुक्त है। यह उपजाति के रूप में प्रयुक्त है। प्रथम अंक का ४६ और तृतीय का ७ श्लोक इसका उदा० है।

(४) इन्द्रवज्रा—

स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः ।

प्रत्येक चरण में तगण तगण जगण और दो गुरु वर्णों के क्रम से ११ वर्ण होते हैं। उदा० चतुर्थ अंक का १६, पंचम का ४६ और दशम का ११, २१, ४८, ५८ श्लोक हैं।

(५) उपजाति—

स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः । उपेन्द्रवज्रा जतजास्ततो गौ ।

परिशिष्ट ६६१

“अनन्तरोदीरितलक्ष्मभाजो पादौ यदीयावुपजातयस्ताः ।
इत्थंक्लिवान्यास्वपि मिश्रितासु वदन्ति जातिष्विदमेव नाम ।”

इन्द्रवज्रा और उपेन्द्रवज्रा के दो-दो पादों के मिलने पर इसी प्रकार अन्य छन्दों के मिलने पर ‘उपजाति’ भेद माना जाता है। इस छन्द का पर्याप्त प्रयोग किया गया है। उदा० प्रथम अंक का ३८, ४६, तृतीय अंक का ६, चतुर्थ अंक का १, १२, १५, ३२, पंचम अंक का २१, २९, ४०, ४७, ५२, अष्टम अंक का २७, ३०, नवम अंक का १० २६, और दशम अंक का ६, १६, ४०, ४३ श्लोक ।

(६) उपेन्द्रवज्रा--

उपेन्द्रवज्रा जतजास्ततो गौ ।

इसमें जगण, तगण, जगण के बाद दो गुरु वर्ण होते हैं। यह प्रथम अंक में ६ चतुर्थ में २३ और षष्ठ में ३ श्लोक में है।

(७) गीति :-

आर्यापूर्वार्धसमं द्वितीयमपि यत्र भवति हंसगते ।
छन्दोविदस्तदानीं गीति ताममृतवाणि भाषन्ते ॥

यह आर्या के समान होता है केवल अन्तिम पाद में १५ के स्थान पर १८ मात्रायें होती हैं। यह चतुर्थ अंक के ३४ वें श्लोक में है। इसे ‘उद्गाथा’ भी कहते हैं।

(८) पथ्यावक्त्र--

युजोश्चतुर्थतो जेन पथ्यावक्त्रं प्रकीर्तितम् ।

अनुष्टुप् छन्द के द्वितीय और चतुर्थ चरण में जब चतुर्थ अक्षर के बाद जगण आता है तब यह छन्द होता है। वास्तव में यह अनुष्टुप् का भेद हैं। मृच्छकटिक में इसका प्रचुर प्रयोग है। प्रथम अंक के—२, ५४, ५८, द्वितीय अंक के १२, तृतीय अंक के १६, २४, २५, २७, २८, २६, चतुर्थ अंक के ५, ७, ८, १८, १९, २१, पंचम अंक के ७, १६, ३९, षष्ठ अंक के १७, २६, सप्तम अंक के ६, अष्टम अंक के ६, १६, १७, २१, २८, २६, ३६, नवम अंक के ७, ८, ११, १८, २०, २४, ३०, ३१, ३२, ३३, ३६, ३७, ३८, ३६, ४२, दशम अंक के ५, १७, १८, २३, २६, २७, २८, ३२, ३९, ४१, ४२, ४५, ५०, ५१, ५२, ५६।

(६) पुष्पिताग्रा--

अयुजि नयुगरेफतो यकारो युजि च नजो जरगाश्च पुष्पिताग्रा ।

६७० मृच्छकटिकम्

यह अर्धसम वृत्त है। इसके प्रथम और तृतीय चरण में नगण, नगण, रगण, यगण-इस क्रम से १२ अक्षर होते हैं। और द्वितीय तथा चतुर्थ चरण में नगण, जगण, जगण, रगण और अन्त में एक गुरु-इस क्रम से १३ अक्षर होते हैं। यह प्रथम अंक के २४, ५६, द्वितीय अंक के ७, तृतीय अंक के १०, २१, २२, चतुर्थ अंक के ४, २७, २८, अष्टम अंक के ४, ८, १५, ३२ और दशम अंक का १३ श्लोक।

(१०) प्रमिताक्षरा--

प्रमिताक्षरा सजससैः कथिता।

इसके पाद में सगण, जगण, सगण, सगण---इस क्रम से १२ अक्षर होते हैं। यह दशम अंक के ५६ श्लोक में हैं।

(११) प्रहर्षिणी--

त्र्याशाभिर्मनजरगा प्रहर्षिणीयम्।

इसके प्रत्येक पाद में मगण, नगण, जगण, रगण और एक गुरु-इस क्रम से १३ अक्षर होते हैं। इसमें ३ और १० पर यति होती है। यह चतुर्थ अंक के २, पञ्चम के ५०, षष्ठम् के १, सप्तम के ८, अष्टम के ४१, नवम के २७ और दशम के २५, ३३, ४७, ४९, श्लोक में है।

(१२) मालभारिणी--

विषमे ससजा गुरू समे चेत् सभरा यैन तु मालभारिणीयम्।

इसे औपच्छन्दसिक भी कहा जाता है। इसमें प्रथम तथा तृतीय पादों में सगण, सगण, जगण और दो गुरु-इस क्रम में ११, ११ अक्षर होते हैं। द्वितीय और चतुर्थ पादों में सगण, भगण, रगण और यगण--इस क्रम से १२, १२ अक्षर होते हैं। यह अर्ध समवृत्त है। यह प्रथम अंक के ३, ५० श्लोक में है।

(१३) मालिनी--

ननमययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः।

इसमें नगण, नगण, मगण, यगण, यगण इस क्रम से १५ अक्षर प्रत्येक पाद में होते हैं। ८ और ७ वर्णों पर यति होती है। यह प्रथम अंक के ३१, ५७, चतुर्थ अंक के २०, पंचम अंक के १७, सप्तम अंक के ३, ५, अष्टम अंक के ४२, नवम अंक के १२, ४३, दशम अंक के ३, १२, ३४, ४६ श्लोक में है।

(१४) वंशस्थ--

जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ।

इसके प्रत्येक पाद में जगण, तगण, जगण, रगण-इस क्रम से १२ अक्षर होते हैं। यह प्रथम अंक के ७, १०, ५३, तृतीय अंक के ८, १७, पंचम अंक के ३७,

परिशिष्ट ६७१

सप्तम अंक के ४, अष्टम अंक के ७, नवम अंक के २५ श्लोक में है। इसे वंशस्थ बिल भी कहा जाता है।

(१५) वसन्ततिलका--

उक्ता वसन्ततिलका त-भ-जा जगौ गः ।

इसके प्रत्येक चरण में तगण, भगण, जगण; जगण और दो गुरु—इस क्रम से १४-१४ वर्ण होते हैं। यह छन्द प्रचुर रूपेण प्रयुक्त है। प्रथम अंक के ९, १२, १३, १७, २०, २२, २७, ३५, ४६, तृतीय अंक के ३, ४, ९, १४, १६, चतुर्थ अंक के ६, १४, २६, पंचम अंक के १, २, ४, ८, १३, १५, ३३, ३६, ४२, ४५, षष्ठ अंक के २, अष्टम अंक के २३, २४, २६, नवम अंक के ६, १६, १६, २२, २८, २६, ३४, दशम अंक के ३१, ३४, श्लोक में हैं।

(१६) विद्युन्माला--

मो मो गो गो विद्युन्माला ।

इसके प्रत्येक पाद में मगण, मगण और दो गुरु-इस क्रम से ८, ८ अक्षर होते हैं। यह द्वितीय अंक के ८ श्लोक में है।

(१७) वैश्वदेवी--

वाणार्श्वेश्चिन्ना वैश्वदेवी ममौ यौ ।

इसके प्रत्येक पाद में मगण, मगण, यगण, यगण,—इस क्रम से १२ वर्ण होते हैं। पंचम वर्ण के बाद यति होती है। यह तृतीय अंक के १३ वें श्लोक में है।

(१८) शार्दूलविक्रीडित -

सूर्याश्वैर्यदि मः सजौ सततगाः शार्दूलविक्रीडितम् ।

इसके प्रत्येक पाद में क्रमशः मगण, सगण, जगण, सगण, तगण, तगण और अन्त में एक गुरु वर्ण मिलाकर १९ वर्ण होते हैं। इसमें १२ और ७ वर्ण पर यति होती है। इसका पर्याप्त प्रयोग किया गया है। यह प्रथम अंक के १, १४, ३२, ३६ ३७, द्वितीय अंक के १२, तृतीय अंक के ५, ११, १२, १८, २०, २३, चतुर्थ अंक के ६, पंचम अंक के ५, ६, १४, १८, २०, २३, २४, २७, ३५, ४६, सप्तम अंक के २, ७, अष्टम अंक के ५, ११, २८, नवम अंक के ३, ४, ५, १४, दशम अंक के ६० श्लोक में है।

(१६) शिखरिणी--

रसैः रुद्रैश्छिन्ना यमनसभलागः शिखरिणी ।

इस छन्द के प्रत्येक पाद में यगण, मगण, नगण, सगण, भगण और अन्त में लघु और एक गुरु—इस क्रम से १७-१७ वर्ण होते हैं। इसमें ६ और ११ वर्ण

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पर यति होती है। यह प्रथम अंक के १५, पञ्चम अंक के १२, २२, २५, षष्ठ अंक के ४ श्लोक में है।

(२०) सुमधुरा—

म्रौ म्नौ मो नो गुरुश्चेद् हयऋतुरसैरुक्ता सुमधुरा।

इस छन्द के प्रत्येक पाद में मगण, रगण, मगण, नगण, मगण, नगण, और एक गुरु--इस क्रम से १९ वर्ण होते हैं। इसमें ७ और १३ वर्ण पर यति होती है। यह नवम अंक के २१ श्लोक में है।

(२१) स्रग्धरा—

म्रभ्नैर्यानां त्रयेण त्रिमुनि-यतियुता स्रग्धरा कीर्तितेयम्।

इस छन्द के प्रत्येक पाद में मगण, रगण, भगण, नगण, यगण, यगण, यगण, इस क्रम से २१ वर्ण होते हैं। इसमें ७, ७, ७ वर्ण पर यति होती है। सामान्यतया प्रयुक्त छन्दों में यह सबसे बड़ा है। यह प्रथम अंक के १, ४, ४८ और दशम अंक के ५६, ६१ श्लोक में है।

(२२) हरिणी—

नसमरसलागा षड् वेदैर्हयैर्हरिणी मता।

इस छन्द के प्रत्येक पाद में नगण, सगण, मगण, रगण, सगण और लघु तथा अन्त में गुरु--इस क्रम से १७, १७ वर्ण होते हैं। इसमें ६, ४, ७ पर यति होती है। यह चतुर्थ अंक के ३ और नवम अंक के १३ श्लोक में है।

प्राकृत छन्द—

प्राकृत भाषा के विभिन्न रूपों का प्रयोग मृच्छकटिक में हुआ है। इस पर भूमिका में लिखा जा चुका है। प्राकृत के अनेक छन्द भी इसमें प्रयुक्त हैं। इनकी संस्कृतच्छाया भी मूल में दी गयी है। प्राकृतच्छन्दों के विषय में विशेष ज्ञान के लिये 'प्राकृत-पिंगल' आदि ग्रन्थ देखने चाहिये। यहाँ गाथा, आर्या, वैतालीय आदि छन्द प्रयुक्त हैं।

उपसंहार—

ऊपर यह प्रस्तुत किया जा चुका है कि मृच्छकटिक में लगभग २२ प्रकार के संस्कृत छन्दों का और कुछ प्राकृत छन्दों का प्रयोग किया गया है। परिशीलन से यह ज्ञात होता है कि इसके रचनाकार को (१) पथ्यावक्त्र, (२) वसन्ततिलका और (३) शार्दूलविक्रीडित छन्द अधिक प्रिय थे।

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