मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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का अर्थ अलग-अलग लिखा गया है और पूरे श्लोक का वाक्यार्थ अलग से लिखा गया है। इसी प्रकार कठिन गद्यांशों के भी पदार्थ और वाक्यार्थ अलग-अलग लिखे गये हैं। इससे छात्रों को अर्थज्ञान में पूरी सुविधा हो जायगी। जहाँ भी कोई विशेष विचारणीय विषय है उसका विवेचन 'विमर्श' के अन्तर्गत स्वतन्त्र रूप से किया गया है। संस्कृत-व्याख्या में परम्परागत रीति का अनुसरण करते हुए प्रत्येक पद का पर्याय शब्द लिखा गया है। भावार्थ स्पष्ट किया गया है। अलंकारों और छन्दों का भी निर्देश किया गया है। प्रारम्भ में एक विस्तृत भूमिका है। इसमें प्रायः समस्त अपेक्षित विषयों का प्रतिपादन किया गया है। इस संस्करण से जिज्ञासु और छात्र दोनों का यदि अपेक्षित लाभ हो सका तो मैं अपने परिश्रम को सफल समझूँगा।
प्रस्तुत संस्करण के सम्पादन में जिन व्याख्याकारों और समीक्षकों की सहायता ली गयी है उनका मैं हृदय से कृतज्ञ हूँ।
नाट्यशास्त्र-मर्मज्ञ और समीक्षक आदरणीय डॉ० विश्वनाथ भट्टाचार्य, प्रोफेसर संस्कृत-विभाग, कलासंकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने प्रस्तुत संस्करण सम्पादित करने की प्रेरणा दी और 'प्राक्कथन' लिखकर अनुगृहीत किया। अतः सर्वप्रथम उनके प्रति मैं अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ।
संस्कृत ग्रन्थों के प्रकाशन में अग्रणी 'कृष्णदास अकादमी' के संचालकों का आभारी हूँ, जिन्होने इस विपुलकाय संस्करण को प्रकाशित करवाया। इसके सम्पादनकार्य में प्रिय मित्र डॉ० सुधाकर मालवीय ने बहुत सहयोग दिया। अतः उन्हें भूरिशः धन्यवाद देता हूँ।
मेरा पूरा प्रयास रहा है कि यह संस्करण सर्वातिशायी बने। तथापि प्रमाद, अनवधान, अज्ञान या अन्य किसी कारण से कुछ त्रुटि रह जाना संभव है। निर्मत्सर विद्वान् उन्हें सूचित करके अनुगृहीत करेंगे।
दीपावली
१९४३
विनीत—
जयशङ्कर लाल त्रिपाठी