मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संस्कृत-वाङ्मय में रूपकों का एक विपुल संग्रह है। अति प्राचीन काल से लेकर अद्यावधि अनेक कवियों ने इस दिशा में सराहनीय प्रयास किया है। विदेशों में संस्कृत भाषा के प्रति रुचि जगाने में रूपकों का विशेष योगदान रहा है, इस तथ्य से सभी विद्वान् परिचित हैं।
संस्कृत के अधिकांश रूपक रामायण, महाभारत और किसी महाविभूति के जीवनवृत्त पर आधृत हैं। सामान्य जीवन की यथार्थ घटनाओं को उद्देश्य मानकर लिखे गये रूपकों की संख्या अत्यल्प है। इस सन्दर्भ में महाकवि शूद्रक का ‘मृच्छकटिक’ सर्वोपरि है। अपने रचनाकाल में इसकी जो भी स्थिति रही हो परन्तु उत्तर काल में इसकी प्रतिष्ठा अनवरत बढ़ती ही गयी। फलतः इसकी गणना एक विशेष श्रेणी के रूपकों में होने लगी।
महाकवि ने ‘प्रकरण’ के रूप में इसकी रचना की है, जिससे नायक और नायिका के जीवन की सत्य घटनाएँ चित्रित करने में किसी प्रकार की बाधा न हो सके। स्वकालीन समाज के प्रायः प्रत्येक वर्ग की कलई खोलने में कवि ने जिस निर्भीकता का परिचय दिया है, वह सराहनीय है।
इस ‘प्रकरण’ के लेखक और काल के विषय में बहुत अधिक विवाद है। परन्तु इसकी भाषा, शैली आदि की समीक्षा करने पर यह महाकवि कालिदास से कुछ पूर्व की या समकालीन रचना प्रतीत होती है। यह दश अङ्कों का एक विपुल-काय प्रकरण है। समय-समय पर विभिन्न विद्वानों ने इसकी व्याख्याएँ लिखीं। पृथ्वोधर की व्याख्या अति प्राचीन है। इसमें कहीं विस्तार और कहीं संक्षेप है। जीवानन्द विद्यासागर की व्याख्या अति उपयोगी है। एम. आर. काले का अंग्रेजी अनुवाद और टिप्पणियों के साथ सुन्दर संस्करण है। हिन्दी भाषा में अनेक व्याख्याएँ प्रकाशित हो चुकी हैं।
विगत अनेक वर्षों से अध्यापन-काल में छात्रों की असुविधाओं का अनुभव कर रहा था। एक ऐसे संस्करण की आवश्यकता थी जिसमें ग्रन्थ को शब्दशः समझने में सुविधा हो, गम्भीर स्थलों का तात्पर्य ज्ञात हो सके और समीक्षायोग्य सभी विषयों का व्यवस्थित रूप में ज्ञान हो सके। इन सभी उद्देश्यों को ध्यान में रखकर प्रस्तुत संस्करण बनाया गया है। इसमें प्रत्येक श्लोक के प्रत्येक पद