मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
सम्पादकीय
संस्कृत-वाङ्मय में रूपकों का एक विपुल संग्रह है। अति प्राचीन काल से लेकर अद्यावधि अनेक कवियों ने इस दिशा में सराहनीय प्रयास किया है। विदेशों में संस्कृत भाषा के प्रति रुचि जगाने में रूपकों का विशेष योगदान रहा है, इस तथ्य से सभी विद्वान् परिचित हैं।
संस्कृत के अधिकांश रूपक रामायण, महाभारत और किसी महाविभूति के जीवनवृत्त पर आधृत हैं। सामान्य जीवन की यथार्थ घटनाओं को उद्देश्य मानकर लिखे गये रूपकों की संख्या अत्यल्प है। इस सन्दर्भ में महाकवि शूद्रक का ‘मृच्छकटिक’ सर्वोपरि है। अपने रचनाकाल में इसकी जो भी स्थिति रही हो परन्तु उत्तर काल में इसकी प्रतिष्ठा अनवरत बढ़ती ही गयी। फलतः इसकी गणना एक विशेष श्रेणी के रूपकों में होने लगी।
महाकवि ने ‘प्रकरण’ के रूप में इसकी रचना की है, जिससे नायक और नायिका के जीवन की सत्य घटनाएँ चित्रित करने में किसी प्रकार की बाधा न हो सके। स्वकालीन समाज के प्रायः प्रत्येक वर्ग की कलई खोलने में कवि ने जिस निर्भीकता का परिचय दिया है, वह सराहनीय है।
इस ‘प्रकरण’ के लेखक और काल के विषय में बहुत अधिक विवाद है। परन्तु इसकी भाषा, शैली आदि की समीक्षा करने पर यह महाकवि कालिदास से कुछ पूर्व की या समकालीन रचना प्रतीत होती है। यह दश अङ्कों का एक विपुल-काय प्रकरण है। समय-समय पर विभिन्न विद्वानों ने इसकी व्याख्याएँ लिखीं। पृथ्वोधर की व्याख्या अति प्राचीन है। इसमें कहीं विस्तार और कहीं संक्षेप है। जीवानन्द विद्यासागर की व्याख्या अति उपयोगी है। एम. आर. काले का अंग्रेजी अनुवाद और टिप्पणियों के साथ सुन्दर संस्करण है। हिन्दी भाषा में अनेक व्याख्याएँ प्रकाशित हो चुकी हैं।
विगत अनेक वर्षों से अध्यापन-काल में छात्रों की असुविधाओं का अनुभव कर रहा था। एक ऐसे संस्करण की आवश्यकता थी जिसमें ग्रन्थ को शब्दशः समझने में सुविधा हो, गम्भीर स्थलों का तात्पर्य ज्ञात हो सके और समीक्षायोग्य सभी विषयों का व्यवस्थित रूप में ज्ञान हो सके। इन सभी उद्देश्यों को ध्यान में रखकर प्रस्तुत संस्करण बनाया गया है। इसमें प्रत्येक श्लोक के प्रत्येक पद
( घ )
का अर्थ अलग-अलग लिखा गया है और पूरे श्लोक का वाक्यार्थ अलग से लिखा गया है। इसी प्रकार कठिन गद्यांशों के भी पदार्थ और वाक्यार्थ अलग-अलग लिखे गये हैं। इससे छात्रों को अर्थज्ञान में पूरी सुविधा हो जायगी। जहाँ भी कोई विशेष विचारणीय विषय है उसका विवेचन 'विमर्श' के अन्तर्गत स्वतन्त्र रूप से किया गया है। संस्कृत-व्याख्या में परम्परागत रीति का अनुसरण करते हुए प्रत्येक पद का पर्याय शब्द लिखा गया है। भावार्थ स्पष्ट किया गया है। अलंकारों और छन्दों का भी निर्देश किया गया है। प्रारम्भ में एक विस्तृत भूमिका है। इसमें प्रायः समस्त अपेक्षित विषयों का प्रतिपादन किया गया है। इस संस्करण से जिज्ञासु और छात्र दोनों का यदि अपेक्षित लाभ हो सका तो मैं अपने परिश्रम को सफल समझूँगा।
प्रस्तुत संस्करण के सम्पादन में जिन व्याख्याकारों और समीक्षकों की सहायता ली गयी है उनका मैं हृदय से कृतज्ञ हूँ।
नाट्यशास्त्र-मर्मज्ञ और समीक्षक आदरणीय डॉ० विश्वनाथ भट्टाचार्य, प्रोफेसर संस्कृत-विभाग, कलासंकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ने प्रस्तुत संस्करण सम्पादित करने की प्रेरणा दी और 'प्राक्कथन' लिखकर अनुगृहीत किया। अतः सर्वप्रथम उनके प्रति मैं अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ।
संस्कृत ग्रन्थों के प्रकाशन में अग्रणी 'कृष्णदास अकादमी' के संचालकों का आभारी हूँ, जिन्होने इस विपुलकाय संस्करण को प्रकाशित करवाया। इसके सम्पादनकार्य में प्रिय मित्र डॉ० सुधाकर मालवीय ने बहुत सहयोग दिया। अतः उन्हें भूरिशः धन्यवाद देता हूँ।
मेरा पूरा प्रयास रहा है कि यह संस्करण सर्वातिशायी बने। तथापि प्रमाद, अनवधान, अज्ञान या अन्य किसी कारण से कुछ त्रुटि रह जाना संभव है। निर्मत्सर विद्वान् उन्हें सूचित करके अनुगृहीत करेंगे।
दीपावली
१९४३
विनीत—
जयशङ्कर लाल त्रिपाठी
विषयानुक्रमणी
| प्राक्कथन | क |
| सम्पादकीय | ग |
| विषयानुक्रमणी | ङ |
| भूमिका | १ |
| मृच्छकटिक का रचयिता | ४ |
| शूद्रक | ९ |
| शूद्रक के विषय में ऐतिहासिक उल्लेख | १० |
| साहित्यिक उल्लेख | १२ |
| मृच्छकटिक का रचना काल | १२ |
| शूद्रक का परिचय | १५ |
| शूद्रक का निवास स्थान | १५ |
| शूद्रक की रचनाएँ | १५ |
| मृच्छकटिक का मूल स्रोत | १५ |
| मृच्छकटिक नामकरण का अभिप्राय | १६ |
| मृच्छकटिक एक प्रकरण (रूपकविशेष) है | १८ |
| मृच्छकटिक का संक्षिप्त कथानक | १९ |
| पात्रों का चरित्र-चित्रण | ३४ |
| चारुदत्त | ३४ |
( व्यक्तित्व, परम उदार, अतिशय दयालु, शरणागत-रक्षक, सत्यवक्ता, धर्माचारपरायण, प्रतिष्ठा-प्रेमी, कला-प्रेमी, आदर्श-प्रेमी, पत्नी का महत्त्व समझने वाला, पुत्रस्नेही, आदर्शमित्र, चारुदत्त की निर्धनता, भाग्यवादी, उपसंहार )
| वसन्तसेना | ४३ |
( व्यक्तित्व, वेश्या की अपेक्षा गणिका का महत्त्व, अतुलवैभवशाली निर्लोभता, अतिप्रतिभाशाली, चारुदत्त से अटूट प्रेमभावना, धूता के प्रति आदर भावना, रोहसेन के प्रति वात्सल्य, धर्माचरण में प्रवृत्ति, उपसंहार )
( च )
शकार ५०
विदूषक ५२
शर्विलक ५५
धूता ५७
मदनिका ५८
भिक्षु ५९
मृच्छकटिक में नाट्यशास्त्रीय तत्त्व
पाँच अर्थप्रकृतियाँ ६०
कार्य की पाँच अवस्थाएँ ६१
पाँच सन्धियाँ ६२
मृच्छकटिक में रस ६३
संयोग शृङ्गार ६४
विप्रलम्भ शृङ्गार ६५
हास्य रस ६६
अलङ्कार-योजना ६७
छन्दोयोजना ६७
भाषा-शैली ६७
मृच्छकटिक की घटनाओं का स्थान ६८
मृच्छकटिक की घटनाओं का समय ६९
मृच्छकटिक-कालीन समाज-व्यवस्था
सामाजिक स्थिति ७२
राजनीतिक स्थिति ७४
धार्मिक स्थिति ७६
कला और संगीत की स्थिति ७६
उपसंहार ७७
पात्र-परिचय ८०
मृच्छकटिक
प्रथम अङ्क १
द्वितीय अङ्क १२८
तृतीय अङ्क १८१
चतुर्थ अङ्क २३२
पञ्चम अङ्क २९९
( छ )
| षष्ठ अङ्क | ३६७ |
| सप्तम अङ्क | ४१२ |
| अष्टम अङ्क | ४२६ |
| नवम अङ्क | ५०३ |
| दशम अङ्क | ५७० |
| मृच्छकटिकस्थ-सुभाषितानि | |
| गद्यानि | ६५५ |
| श्लोकाः | ६५७ |
| श्लोकानुक्रमणी | ६६० |
| परिशिष्ट | |
| छन्दोविवेचन | ६६७ |
शब्दसंक्षेप-संकेत
| द्र० | = | द्रष्टव्य |
| वा० रा० | = | वाल्मीकीयरामायण |
| पा० सू० | = | पाणिनीयसूत्र |
| पृ० | = | पृष्ठ |
| सा० द० | = | साहित्यदर्पण |
| मनु० | = | मनुस्मृति |
| अ० को० | = | अमरकोश |
भूमिका
संस्कृत-साहित्य में अभिनय-प्रदर्शन के स्रोत वैदिक काल से ही प्राप्त होते हैं। वेदों में स्थित संवादसूक्तों में इस कला के स्पष्ट दर्शन होते हैं। परिशीलन से स्पष्टतया ज्ञात होता है कि रामायण और महाभारत-काल में इस मनोरम कला की ओर लोगों की पर्याप्त रुचि हो चुकी थी।¹ वे इस कला से अच्छी तरह परिचित हो चुके थे। वाल्मीकीय रामायण के अनुसार राजविहीन जनपद में 'नट' और 'नर्तक' प्रसन्न नहीं दिखाई देते थे। इसमें नटों द्वारा सामाजिकों के मनोरंजन का उल्लेख है।²
नटसूत्रों की प्रामाणिकता का स्पष्ट उल्लेख पाणिनि (ई. पू. ५००) की अष्टाध्यायी में है।³ पतंजलि (ई. पू. १५०) के महाभाष्य में क्रिया की वर्तमानकालिकता का उपपादन करने के लिये 'कंसं घातयति' 'बलिं बन्धयति' आदि में नटों (शोभनिक या शौभिक) का उल्लेख है।⁴ महाभाष्य में 'कंसवध' और 'बलिबन्ध' नामक नाटकों का स्पष्ट उल्लेख है। इससे यह कहा जा सकता है कि पतंजलि के समय (ई. पू. १५०) में भारतीय समाज नाट्यकला से सुपरिचित होकर इसका आनन्द उठाने लगा था।
आचार्य भरत ने अपने नाट्यशास्त्र में यह लिखा⁵ है "सांसारिक मनुष्यों को अति खिन्न देखकर इन्द्र आदि देवताओं ने ब्रह्मा के पास जाकर ऐसे वेद के निर्माण करने की प्रार्थना की जिससे वेद के अनधिकारी स्त्री, शूद्र आदि सभी लोगों का मनोरंजन हो। यह सुनकर ब्रह्मा ने चारों वेदों का ध्यान करके ऋग्वेद से पाठ्य, सामवेद से गान, यजुर्वेद से अभिनय और अथर्ववेद से रस लेकर 'नाट्यवेद' नामक
१. द्र० संस्कृत-साहित्य का इतिहास (बलदेव उपाध्याय) पृ० ४६५
२. नाराजके जनपदे प्रहृष्टनटनर्तकाः। (वा० रा० २।६७।१५)
३. पाराशर्य्यशिलालिभ्यां भिक्षुनटसूत्रयोः। (पा० सू० ४।३।११०) कर्मन्दकृशाश्वा-दिनिः। (पा. सू. ४।३।१११)
४. ये तावदेते शोभनिका नामैते प्रत्यक्षं कंसं घातयन्ति, प्रत्यक्षं च बलिं बन्धयन्ति।
वर्तमाने लट् (३।२।१११) पर महाभाष्य
५. द्र० संस्कृत-साहित्य का इतिहास पृ० ४६९
२ मृच्छकटिक
पंचम वेद की रचना की।$^१$ और इन्द्र से कुशल, प्रगल्भ देवताओं में इसका प्रचार करने को कहा। इन्द्र ने कहा कि देवता लोग नाट्यकर्म में कुशल नहीं हैं। वेदों का मर्म जानने वाले मुनि लोग इसका ग्रहण और प्रयोग करने में समर्थ हैं। तब ब्रह्मा के कथनानुसार भरत मुनि ने अपने पुत्रों को इसकी शिक्षा दी। नाटक में सभी वस्तुओं का प्रदर्शन संभव है।$^२$ सर्वप्रथम ‘त्रिपुरदाह’ और इसके बाद ‘समुद्रमन्थन’ का अभिनय किया गया। यह विवेचन सिद्ध करता है कि भारत में अति प्राचीन काल में नाटकों की उत्पत्ति दिखाई देती है।
कुछ विद्वानों ने भारतीय नाटकों के विकास में ग्रीकप्रभाव माना है। इसका प्रमाण ‘यवनिका’ शब्द का प्रयोग कहा है। परन्तु संस्कृत में ‘जवनिका’ शब्द का प्रयोग सामान्य पर्दा के अर्थ में प्राप्त होता है। यूनानी शब्द यकारादि है, संस्कृत शब्द जकारादि है। अतः इस आधार पर ग्रीकप्रभाव की कल्पना ठीक नहीं है।$^३$
ग्रीक में सुखान्त और दुःखान्त दो प्रकार के नाटक हैं। किन्तु संस्कृत में केवल सुखान्त नाटक ही लिखे गये। परिमाण की दृष्टि से भी संस्कृत नाटक ग्रीक नाटकों से भिन्न हैं। प्रस्तुत ‘मृच्छकटिक’ अकेला ही ग्रीक के तीन-चार नाटकों के बराबर है।
संस्कृत-नाटकों में संस्कृत भाषा के साथ विभिन्न प्राकृत भाषाओं का प्रयोग भी इन नाटकों का साधारण जन तक प्रचार सिद्ध करते हैं। संस्कृत नाटकों में अंकों के द्वारा विभाजन किया जाता है और अंक के अन्त में सभी पात्रों का रंग-मंच से निकलना आवश्यक है। परन्तु ग्रीक नाटकों में ऐसी व्यवस्था नहीं है।
विदूषक की कल्पना संस्कृत नाटकों की अपनी विशेषता है। यह पात्र केवल मजाक के लिये नहीं होता है अपितु कभी-कभी महत्त्वपूर्ण भूमिका भी निभाता है। मृच्छकटिक का विदूषक भी इसी श्रेणी का है।
संस्कृत नाटकों की कथावस्तु मौलिक है। ये रामायण और महाभारत पर प्रमुख रूप से आधृत हैं। इनमें ख्यातवृत्त को महत्त्व दिया जाता है।
१. एवं संकल्प्य भगवान् सर्ववेदाननुस्मरन् ।
नाट्यवेदं ततश्चक्रे चतुर्वेदाङ्गसम्भवम् ॥
जग्राह पाठ्यमृग्वेदात् सामभ्यो गीतिमेव च ।
यजुर्वेदादभिनयान् रसानाथर्वणादपि ॥
(नाट्यशास्त्र १।१६, १७)
२. न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला ।
नासौ योगो न तत्कर्म नाट्यॆऽस्मिन् यन्न दृश्यते ॥
(नाट्यशास्त्र १।११४)
३. द्र० संस्कृत साहित्य का इतिहास पृ० ४७२-७३
भूमिका
ग्रीक नाटकों में (१) स्थानान्विति, (२) कालान्विति और (३) कार्यान्विति प्राप्त होतीं हैं। परन्तु संस्कृत नाटकों में केवल 'कार्यान्विति' पर बल दिया जाता है। ग्रीक नाटकों में 'कोरस' [ एक साथ गाने नाचने वालों की टोली ] का महत्त्व है। जब कि संस्कृत नाटकों में इसका अभाव है। अकेला सूत्रधार ही नान्दीपाठ के बाद नाटक प्रारम्भ करा देता है।
रंगमंच की दृष्टि से भी दोनों में बहुत अन्तर है। ग्रीक (यूनान) में नाटकों को खुले आसमान में सामान्य जनता के लिये खेला जाता था। जब कि संस्कृत नाटक प्रारंभिक काल से ही कलात्मक प्रेक्षागृहों में खेले जाते थे। इनके निर्माण की दक्षता की जानकारी प्राचीन काल से ही मिलती है। संस्कृत नाटकों का उद्देश्य केवल मनोरंजन कराना ही नहीं है, साथ-साथ शिक्षा देना भी रहा है। इसी प्रकार के ऐसे अनेक अन्तर हैं जो संस्कृत नाटकों पर ग्रीकप्रभाव का खण्डन करते हैं।$^१$ अतः संस्कृत नाटकों पर ग्रीकप्रभाव मानना अनुचित और अप्रामाणिक है।
संस्कृत में काव्य को सामान्यरूप से दो भेदों में बांटा गया है—(क) दृश्य और (ख) श्रव्य।$^२$ श्रव्य की अपेक्षा दृश्य का महत्त्व अधिक है। रंगमंच पर जिनका अभिनय करना संभव होता है उन्हें 'दृश्य' काव्य कहते हैं। इसके दो भेद होते हैं—(क) रूपक और (ख) उपरूपक। रूपक को रस, भाव, आदि का आश्रय माना जाता है।$^३$ इसके दश भेद होते हैं—
नाटकमथ प्रकरणं भाणव्यायोग-समवकारडिमाः।
ईहामृगाङ्कवीथ्यः प्रहसनमिति रूपकाणि दश ॥$^४$
१-नाटक, २-प्रकरण, ३-भाण, ४-व्यायोग, ५-समवकार, ६-डिम, ७-ईहामृग, ८-अंक, ९-वीथी, १०-प्रहसन।
उपरूपक के भी नाटिका आदि १८ भेद माने गये हैं। कुछ बातों को छोड़कर इनमें भी वे सभी बातें होतीं हैं जो नाटक में मानी जातीं हैं।$^५$
१. संस्कृत-साहित्य का इतिहास पृ० ४७४-७८
२. दृश्यश्रव्यभेदेन काव्यं द्विधा मतम्। साहित्यदर्पण ६।१
३. अवस्थानुकृतिर्नाट्यं रूपं दृश्यतयोच्यते।
रूपकं तत्समावेशाद्दशधैव रसाश्रयम् ॥ दशरूपक १।७
४. साहित्यदर्पण ६।३
५. अष्टादश प्राहुरुपरूपकाणि मनीषिणः।
विना विशेषं सर्वेषां लक्ष्म नाटकवन्मतम् ॥ साहित्यदर्पण ६।६
४
मृच्छकटिक
दृश्य काव्य के भेद, उपभेद—वस्तु, नेता और रस के आधार पर किये जाते हैं। परन्तु आधुनिक समीक्षक नाटक में इन तत्त्वों पर भी महत्त्व देते हैं—कथानक, पात्र, उनका चरित्रचित्रण, संवाद, देश तथा काल का निर्णय, भाषा, शैली और अभिनययोग्यता आदि। इन सभी की दृष्टि से मृच्छकटिक की समीक्षा करनी आवश्यक है। परन्तु इन पर विचार करने के पहले इसके विवादग्रस्त विषय 'रचयिता' पर विचार कर लेना अच्छा है।
मृच्छकटिक का रचयिता
यद्यपि उपलब्ध सभी हस्तलेखों और प्रकाशित संस्करणों की भूमिका में मृच्छकटिक का रचयिता 'शूद्रक' नृप को ही माना गया है। परन्तु अभी तक विद्वान इसके रचयिता के विषय में सन्देह करते आ रहे हैं। इस सम्बन्ध में उपलब्ध मत और उनकी समीक्षा यहाँ प्रस्तुत है—
मृच्छकटिक दण्डी की रचना है—पिशेल आदि का मत—
श्री पिशेल महोदय का मत है कि मृच्छकटिक दण्डी की रचना है। उनका यह कहना है कि राजशेखर ने दण्डी के तीन प्रबन्ध माने हैं—
“त्रयो दण्डिप्रबन्धाश्च त्रिषु लोकेषु विश्रुताः।”१
इन तीनों में (क) दशकुमार-चरित और (ख) काव्यादर्श के अतिरिक्त तीसरी रचना (ग) 'मृच्छकटिक' है। पिशेल ने अपने मत के समर्थन में ये तर्क दिये हैं—
(१) ‘लिम्पतीव तमोऽङ्गानि वर्षतीवाञ्जनं नभः ।’२ यह पद्य उदाहरण के रूप में काव्यादर्श ( २।२२६ ) में है। यही पद्य मृच्छकटिक के प्रथम अंक (१।३४) में भी है। इससे दोनों रचनाओं का एक कर्ता प्रतीत होता है।
(२) दशकुमार-चरित में सामाजिक अवस्था का जैसा वर्णन मिलता है वैसा ही मृच्छकटिक में भी है। दोनों की यह समानता भी दोनों का एक ही कर्ता होना सिद्ध करती है।३
पिशेल के उपर्युक्त मत का समर्थन मॅकडानल आदि ने भी किया है।
उपर्युक्त मत का खण्डन
दूसरे विद्वानों के मत में पिशेल के मत में कोई ठोस आधार नहीं है 'लिम्पतीव' यह पद्य तो सर्वप्रथम भास के 'चारुदत्त' में मिलता है। वहीं से अन्य कृतियों
१. राजशेखर २. काव्यादर्श २।२२६, मृच्छकटिक १।३४ ३. मृच्छकटिक-भूमिका M. R. काले पृ० १७
भूमिका ५
में उद्धृत है। सामाजिक अवस्था के वर्णन की समानता भी उक्त मत सिद्ध नहीं कर सकती क्योंकि कभी-कभी परिस्थितिवशात् दो लेखकों के समय में भी एक जैसी सामाजिक दशा मिलना संभव है। और जब से 'अवन्तिसुन्दरीकथा' नामक ग्रन्थ मिल गया है तब से विद्वान इसे ही दण्डी की तीसरी रचना के रूप में स्वीकार करते हैं। अतः पीटर्सन आदि विद्वान पिशेल का मत नहीं मानते हैं।¹
मृच्छकटिक भास की रचना है---
कुछ विद्वानों की धारणा है कि मृच्छकटिक महाकवि भास की रचना है। महाकवि भास ने अपने 'चारुदत्त' नामक नाटक को ही बाद में परिवर्द्धित करके 'मृच्छकटिक' नाम से प्रसिद्ध कर दिया।²
उक्त मत का खण्डन
किन्तु उपर्युक्त मत में कोई ठोस आधार नहीं है। कारण यह है कि जब भास ने अपनी अन्य सभी कृतियों में कर्ता के रूप में अपना उल्लेख किया है तब मृच्छकटिक को 'शूद्रक' नाम से क्यों लिखा ? भास को शूद्र मानने की कल्पना भी निराधार है। क्योंकि प्रस्तुत मृच्छकटिक की प्रस्तावना में इसके रचयिता को एक समर्थ और सम्पन्न राजा बताया गया है। वह अनेक विषयों का प्रौढ़ विद्वान भी था। अतः उसे जात्या शूद्र मानना तर्कसंगत नहीं है।
मृच्छकटिक किसी अज्ञात कवि की रचना है—
वास्तव में मृच्छकटिक के रचयिता का ज्ञान करना संभव नहीं है। यह किसी अज्ञात कवि की रचना है। यह मत डा० सिल्वालेवी ने प्रस्तुत किया था।³ इनका यह कहना है कि शूद्रक मृच्छकटिक के रचयिता नहीं हो सकते अपितु किसी अन्य कवि ने इसकी रचना करके अपनी इस रचना की प्राचीनता सिद्ध करने की भावना से शूद्रक की कृति घोषित कर दी। उस कवि ने अपनी कृति को शूद्रक के नाम से क्यों घोषित किया ? इस शंका का उत्तर देते हुये सिल्वालेवी का यह कहना है कि वह लेखक वास्तव में कालिदास से अर्वाचीन था किन्तु अपनी कृति को कालिदास से प्राचीन सिद्ध करना चाहता था। अतः कालिदास के आश्रयदाता राजा विक्रमादित्य से भी प्राचीन राजा शूद्रक के नाम से अपनी कृति को प्रसिद्ध कर दिया।
१. मृच्छकटिक-भूमिका श्रीनिवास शास्त्री पृ० ३
२. मृच्छकटिक-भूमिका M. R, काले पृ० १७
३. मृच्छकटिक-भूमिका पं० कान्तानाथ शास्त्री तैलंग पृ० १०
६ मृच्छकटिक
डा० कीथ आदि कुछ विद्वान भी इस मत का अंशतः समर्थन करते हैं। उनके अनुसार कोई अज्ञात व्यक्ति ही मृच्छकटिक का रचयिता था। शूद्रक कोई वास्तविक व्यक्ति न होकर केवल कल्पित व्यक्ति था।¹
उपर्युक्त मत का खण्डन
परन्तु अधिकांश समीक्षक उपर्युक्त मत को नहीं मानते हैं। उनके अनुसार मृच्छकटिक को किसी अज्ञात कवि की रचना सिद्ध करने के लिए ठोस आधार और प्रमाणों का होना आवश्यक है। परन्तु इसमें केवल कल्पना के अतिरिक्त कोई प्रमाण नहीं दिखलाई देता है। उपलब्ध सभी प्रकाशित और हस्तलिखित संस्करणों की प्रस्तावना में शूद्रक को ही इसका रचयिता कहा गया है।² इसके अतिरिक्त शूद्रक को ऐतिहासिक व्यक्ति न मानकर केवल कल्पित मानना भी प्रमादपूर्ण है।
पं० कान्तानाथ शास्त्री तेलंग का मत
“हमारे³ विचार से भी शूद्रक 'मृच्छकटिक' के कर्ता नहीं हैं। इसके कर्ता कोई दूसरे ही कवि हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि किसी कवि ने भास का 'दरिद्र-चारुदत्त' देखा। उन्हें वह अपूर्ण प्रतीत हुआ। उन पर उसे पूर्ण करने की धुन सवार हुई। उन्होंने आवश्यकता और अपनी रुचि के अनुसार 'दरिद्रचारुदत्त' में परिवर्तन किये। उसकी कथा के साथ अपनी कल्पना से रची हुई अथवा गुणाढ्य की 'बृहत्कथा' से ली हुई गोपालदारक आर्यक के विद्रोह की कथा वट थी। इस प्रकार 'मृच्छकटिक' तैयार हुआ। कवि ने अपना नाम जानबूझ कर छिपाया। प्रस्तावना में शूद्रक के साथ 'किल' का प्रयोग यही सूचित करता है। कवि ने इस शब्द का प्रयोग जानबूझ कर किया है। यह भी एक दो बार नहीं, चार-चार बार। तीन बार तो इसका प्रयोग शूद्रक के साथ किया गया है और एक बार चारुदत्त के। प्रस्तावना में शूद्रक का नाम बताने वाले पद्य देने के पहले ही कवि ने लिखा है--“एतत्कविः किल।” इसके बाद पुनः पांचवें पद्य में शूद्रक के साथ 'किल' शब्द है। इस अव्यय का प्रयोग प्रायः 'ऐतिह्य' 'अलीकता' या 'सम्भावना' सूचन करने के लिये पाया जाता है। यह अधिकतर अनिश्चय व्यक्त करता है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि यहाँ इसका प्रयोग 'इदं किलाव्याज-
१. Sanskrit Drama पृ० १२६
२. मृच्छकटिक-भूमिका श्रीनिवास शास्त्री पृ० २
३. मृच्छकटिक-भूमिका पं० कान्तानाथ शास्त्री तैलंग पृ० ११-१२
भूमिका
७
मनोहरं वपुः' (शाकु०) की तरह ऐतिह्यादि अर्थों से भिन्न अर्थ का ज्ञान कराने के लिये किया गया है। "लब्ध्वा चायुः शताब्दं दशदिनसहितं शूद्रकोऽग्निं प्रविष्टः', 'बभूव', और 'चकार' के प्रकाश में यहाँ 'किल' शब्द 'ऐतिह्य' आदि अर्थों का ही बोध कराता है। कवि को अपनी आयु का निश्चित प्रमाण कैसे मालूम हो सकता है ? वह कैसे जान सकता है कि आगे चलकर उसकी मृत्यु कैसे और कब होगी ? 'बभूव' और 'चकार' का लिट् लकार भी परोक्ष भूत का बोधक होने के कारण ऐतिह्य आदि अर्थों का ही समर्थन करता है।"
"यहाँ यह भी नहीं कहा जा सकता कि नाटक तो शूद्रक का है, केवल प्रस्तावना के श्लोक दूसरे कवि के द्वारा प्रक्षिप्त हैं। ऐसा मानने का यह अर्थ होगा कि शूद्रक ने अपना नाटक बिना नाम डाले ही चला दिया। इसके अतिरिक्त 'बभूव' और 'चकार' के प्रकाश में यह भी मानना पड़ेगा कि शूद्रक के मरने के बहुत बाद प्रस्तावना के श्लोक डाले गये। ऐसी स्थिति में यह प्रश्न उठेगा कि आखिर शूद्रक ने अपना नाटक अपना नाम दिये बिना ही क्यों चला दिया ? वह तो राजा था। उसे किसी का डर तो था नहीं। इसके अतिरिक्त बहुत दीर्घकाल तक किसी को उसका नाम डालने की क्यों नहीं सूझी ? बहुत लम्बे काल के बाद यह प्रश्न क्यों खड़ा हुआ ? इन प्रश्नों का कोई समुचित उत्तर नहीं मिलता। हमारे विचार से ये श्लोक यदि प्रक्षिप्त होते तो इनका स्वरूप ही दूसरा होता। यदि सच्चे दिल से केवल कवि का नाम स्थायी बनाने तथा उसका परिचय देने के लिये ही ये श्लोक प्रक्षिप्त होते तो इसमें सन्देह उत्पन्न करने वाली विचित्र बातें तथा परोक्षभूत की क्रिया न रखी गयी होती। जिस प्रकार अन्य प्रसिद्ध नाटकों के कवि अपना परिचय देते हैं वैसे ही सच मालूम होने वाले श्लोक बना कर मेल मिला दिया होता। अतः हम तो यही मानना श्रेयस्कर समझते हैं कि यह नाटक शूद्रक का नहीं है। किसी दूसरे कवि ने इसे रचकर शूद्रक के नाम से चला दिया है। शूद्रक इतिहासप्रसिद्ध व्यक्ति थे या नहीं, इससे कोई मतलब नहीं है।"
आगे उन्होंने अपना पक्ष प्रस्तुत करते हुये लिखा है कि उस कवि ने अपना नाटक शूद्रक के नाम से क्यों चला दिया--इसके दो कारण हो सकते हैं--(१) उसने सोचा होगा कि इसमें आधा भाग भास का है। यदि इसे मैं अपने नाम से चलाऊँगा तो लोग मुझे चोर कहेंगे। (२) इस नाटक का घटनाचक्र तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों तथा मान्यताओं के विपरीत जान पड़ता है। चारुदत्त तथा शर्विलक जैसे ब्राह्मणों का वेश्याओं के साथ विवाह, ब्राह्मणों का चोर होना, चन्दनक और वीरक जैसे शूद्रों का राज्य के उच्च पदों पर स्थित होना—इत्यादि घटनायें क्रान्तिकारी विचारों की सूचक हैं। अतः यदि वह कवि अपने नाम से
८ मृच्छकटिक
इस नाटक को प्रचलित करता तो समाज और राजा उसकी दुर्गति कर देते। इसी कारण से उसने एक प्राचीन राजा के नाम से अपनी रचना को प्रसिद्ध किया होगा।
उपर्युक्त मत में अनुपपत्तियाँ
माननीय तेलंग जी के उपर्युक्त मत से तो ऐसा प्रतीत होता है कि शूद्रक का 'मृच्छकटिक' के साथ कोई सम्बन्ध ही नहीं है। किसी कवि ने श्रम एवं प्रतिभा से इतनी विशाल और महत्त्वपूर्ण कृति की रचना की हो और वह बिना किसी विशेष कारण अपना नाम छोड़कर अन्य 'शूद्रक' के नाम से प्रसिद्ध कर दे, ऐसी बात बुद्धिगम्य नहीं है। ऐसा कोई उदाहरण नहीं दिखाई देता। यह कहा जाय कि क्रान्तिकारी विचार प्रस्तुत करने के कारण उसे राजा या समाज का भय था, तो यह भी तर्कसंगत नहीं है, क्योंकि क्रान्तिकारी को किसी से भय नहीं होता है। 'किल' 'चकार' 'बभूव' आदि शब्दों के प्रयोग अवश्य विचारणीय हैं।
मृच्छकटिक शूद्रक की ही रचना है-परम्परावादी मत
परम्परावादी विद्वानों का मत है कि शूद्रक ही मृच्छकटिक के रचयिता हैं। प्रत्येक नाटक में उसके रचयिता का नाम उसकी प्रस्तावना में प्राप्त होता है। ठीक यही स्थिति मृच्छकटिक में भी है। इसकी भी प्रस्तावना में स्पष्ट शब्दों में 'शूद्रक नृप' को ही इसका रचयिता लिखा है।१ यहाँ परोक्ष भूतकालिक क्रिया के वाचक 'चकार' 'बभूव' 'अग्निं प्रविष्टः' आदि पदों का प्रयोग सन्देह अवश्य पैदा करता हैं। इन प्रयोगों की उपपत्ति का प्रयास विभिन्न टीकाकारों ने किया है। यहाँ यह भी कहा जा सकता है कि कुछ श्लोक प्रक्षिप्त हों। अथवा लिपिकर्ता आदि के प्रमाद से अशुद्ध हो गये हों। अतः जब तक कोई ठोस आधार और प्रबल प्रमाण उपलब्ध नहीं होता तब तक शूद्रक को ही मृच्छकटिक का रचयिता मानना उचित है।
शूद्रक नृप के पुत्र के आश्रित कवि की रचना है—
ऊपर विभिन्न कल्पनाओं के साथ मेरा एक विनम्र परामर्श है कि मृच्छकटिक का रचयिता शूद्रक नहीं है। ऐसा लगता है कि शूद्रक का पुत्र जब राजा बना तो उसे अपने पिता की प्रसिद्धि स्थिर बनाने का विचार आया और उसने अपने आश्रित किसी महाकवि द्वारा यह रचना करायी। बाद में धनादि देकर अपने पिता का नाम उसमें जुड़वा दिया। चूँकि उस समय राजा शूद्रक नहीं थे। अतः उस कवि ने
१. द्र० प्रस्तुत संस्करण की प्रस्तावना के श्लोक।
दशमोऽङ्कः (संहार - मुक्ति व भारतवाक्य)
भूमिका ६
उनका नाम तो जोड़ दिया किन्तु भूतकालिक क्रियावाची पदों का प्रयोग करके भ्रम उत्पन्न करा दिया। संभव है उसे यह आभास न हुआ हो कि भविष्य में उसके प्रयोगों की समीक्षा करने पर अनेक समस्यायें खड़ी हो जायेंगी।
यदि वास्तव में शूद्रक ही रचयिता होते तो वे आत्मप्रशंसा में इतने श्लोक न लिखते। यदि आत्मप्रशंसा-प्रेमी होते तो 'मृच्छकटिक' की समाप्ति में भी अपना नाम अवश्य लिखते। मुझे जितने भी प्रकाशित संस्करण उपलब्ध हुए, उनमें 'संहारो नाम दशमोऽङ्कः' इतना ही लिखा है।
अस्तु, जो भी हो, अभी तक यह समस्या ही बनी है। इस विषय में 'इदमित्थम्' कह सकना दुस्साहसमात्र है।
शूद्रक—
जब तक कोई ठोस आधार नहीं प्राप्त होता तब तक शूद्रक को ही मृच्छकटिक का कर्ता मानना चाहिये। परन्तु ऐसा मान लेने पर दूसरा प्रश्न उठता है शूद्रक के व्यक्तित्व के विषय में। मृच्छकटिक की प्रस्तावना में यह स्पष्ट है कि शूद्रक एक प्रौढ़ विद्वान और बलशाली राजा था। वह अनेक विषयों का मर्मज्ञ और वैदिक परम्परा का अनुयायी था। उसने इस प्रस्तुत प्रकरण की रचना की।
भारत में ऐसे अनेक राजा हुए हैं जिनकी साहित्यिक गतिविधियां भी उच्च-कोटि की थीं। इनमें समुद्रगुप्त, हर्षवर्धन, यशोवर्मा, मुञ्ज तथा भोज आदि प्रमुख हैं। इन्होंने राजकार्य की व्यस्तता में भी उत्कृष्ट रचनायें कीं। अतः शूद्रक भी राजा होकर इस प्रकरण की रचना कर सकता है, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। प्रस्तावना में 'शूद्रको नृपः' यह स्पष्ट लिखा है।
परन्तु भारतीय समाज में ऐसे भी अनेक कवियों की चर्चा है जिन्होंने राजा द्वारा पुरस्कृत होने पर कृतज्ञतास्वरूप अपनी कृति को उस राजा के नाम से प्रसिद्ध कर दिया। इस बात का स्पष्ट उल्लेख आचार्य मम्मट के काव्य-प्रकाश में काव्य-प्रयोजन की चर्चा के प्रसंग में है "काव्यं यशसे, अर्थकृते' की व्याख्या में लिखा है—"श्रीहर्षादेर्धावकादीनामिव धनम्।" सम्भव है यह स्थिति शूद्रक या उसके पुत्र की राजसभा के किसी पण्डित की भी रही हो। राजशेखर ने इस प्रकार के कुछ राजाओं का उल्लेख भी किया है—"वासुदेव-शातवाहन-शूद्रक-साहसांकादीन् सकलान् सभापतीन् दानमानाभ्यामनुकुर्यात्।" (काव्यमीमांसा) उपर्युक्त तथ्य के आधार पर यह कहा जा सकता है कि स्वयं शूद्रक ने अथवा उसके आश्रित किसी कवि ने या शूद्रक के पुत्र के आश्रित किसी कवि ने मृच्छकटिक की रचना की है और शूद्रक के नाम से प्रसिद्ध कर दी है।
१० | मृच्छकटिक
कुछ समय पहले मद्रास में 'अवन्तिसुन्दरी-कथा' नाम का एक ग्रन्थ मिला जिसे विद्वानों ने दण्डी की तीसरी कृति माना। उसमें शूद्रक की प्रशंसा में निम्न श्लोक है--
शूद्रकेणासकृज्जित्वा स्वच्छया खड्गधारया।
जगद् भूयोऽवष्टब्धं वाचा स्वचरितार्थया ॥१
इसमें शूद्रक को एक वीर योद्धा कहा गया है। 'वाचा स्वचरितार्थया' इन पदों से यही प्रतीत होता है कि शूद्रक ने अपनी रचना में आत्मकथा प्रतिबिम्बित की है। कुछ विद्वानों का कहना है कि मृच्छकटिक में शूद्रक के जीवन की कुछ प्रमुख घटनाओं का संकेत है। यहाँ का चारुदत्त शूद्रक के मित्र बन्धुदत्त का दूसरा रूप है। और गोपालपुत्र आर्यक के रूप में शूद्रक ने स्वयं को प्रस्तुत किया है। परन्तु इस कल्पना में कोई ठोस तर्क या प्रमाण नहीं दिया गया। केवल यही कहा जा सकता है कि शूद्रक एक वीर योद्धा था।
वामन की काव्यालंकार-सूत्रवृत्ति से भी यह संकेत मिलता है कि शूद्रक नाम का कोई कवि था। उसकी रचनायें लोककथाश्रित थीं। अर्थगुणों के विवेचन के प्रसङ्ग में वामन ने श्लेष (घटना) का उल्लेख किया है और शूद्रक की रचनाओं में इस श्लेष का विशेष प्रयोग बताया है "शूद्रकादिरचितेषु प्रबन्धेषु अस्य भूयान् प्रपञ्चो दृश्यते।" (काव्यालङ्कार-सूत्रवृत्ति ३।२।४) इस उल्लेख से शूद्रक का कवि होना और श्लेष में उसकी दक्षता ये दो बातें प्रमाणित होती हैं।
परन्तु उपर्युक्त उल्लेख से यह अनुमान लगाना कठिन है कि वामन शूद्रक को मृच्छकटिक के रचयिता के रूप में जानता था अथवा नहीं। कारण यह है कि मृच्छकटिक को विशेष रूप से श्लेषगुणयुक्त कहना कठिन है। परन्तु वामन ने सूत्रवृत्ति में ऐसे कई उदाहरण दिये हैं जिनसे यह स्पष्ट है कि वह भी मृच्छकटिक से सुपरिचित था। यह श्लेष गुण श्लेष अलंकार से सर्वथा भिन्न है। अतः वामन के उपर्युक्त कथन से भी यह अनुमान करना सम्भव है कि शूद्रक ने मृच्छकटिक के अतिरिक्त और दूसरी भी रचना की थी।
शूद्रक के विषय में ऐतिहासिक उल्लेख :
संस्कृत-साहित्य में अनेक शूद्रकों का उल्लेख प्राप्त होता है। अतः इसको केवल काल्पनिक व्यक्ति मानना ठीक नहीं है। यह शूद्रक विभिन्न प्रसंगों और विभिन्न कालों में चर्चित है। अतः इन शूद्रकों में कौन शूद्रक मृच्छकटिक का रचयिता है—यह कहना कठिन है। इस विषय में निम्न विवेचन उपयोगी होगा—
१. मृच्छकटिक भूमिका M. R. काले पृ० २१ में उद्धृत।
भूमिका
(१) स्कन्दपुराण में कुमारिका-खण्ड में यह लिखा है कि कलि सम्वत् ३२६० अर्थात् १६० ई० में शूद्रक नाम का कोई राजा हुआ था।¹ कुछ विद्वान स्कन्द-पुराण में निर्दिष्ट शूद्रक को आन्ध्रवंशीय प्रथम राजा 'सिमुक' से अभिन्न मानते हैं। उनके कथन का आधार है भागवतपुराण में आन्ध्रवंश के प्रथम राजा को 'शूद्र' कहना। यह भी सम्भव है कि सिमुक का वास्तविक नाम 'शूद्रक' ही रहा हो। M.R. काले महोदय ने आन्ध्रवंश का प्रथम राजा 'शूद्रक' ही माना है। उसका यह समय आन्तरिक प्रमाणों से भी पुष्ट होता है और उसके पूर्ववर्ती कवि भास के समय से भी मेल खाता है।²
(२) आन्ध्रवंश का राज्य दक्षिण भारत में था और वामन की काव्यालंकार-सूत्रवृत्ति के एक टीकाकार के अनुसार 'शूद्रक' भी दक्षिण का था। इस कथन की पुष्टि मृच्छकटिक के अन्तःसाक्ष्यों से भी होती है। दूसरे अंक में 'खुण्डमोटक' शब्द का प्रयोग दक्षिण भारत का है। दशम अंक में चारुदत्त के वध के समय चाण्डालों द्वारा 'सह्यवासिनी' का स्मरण “भगवति सह्यवासिनि ! प्रसीद प्रसीद” भी दाक्षिणात्य होने में प्रमाण है। भवभूति ने भी दुर्गा को इसी नाम से लिखा है। इसके विपरीत उत्तर भारत में 'विन्ध्यवासिनी' शब्द प्रयुक्त होता है। छठे अंक में वीरक और चन्दनक के कलह में 'दाक्षिणात्य' तथा 'कर्णाटककलहप्रयोग' आदि शब्द यही सिद्ध करते हैं। पैसा के अर्थ में 'नाणक' का प्रयोग भी उक्त कथन की पुष्टि करता है। इससे शूद्रक का दाक्षिणात्य होना सिद्ध होता है।³ परन्तु कुछ विद्वान उज्जयिनी का विशेष वर्णन देखकर वहीं का मानते हैं। अथवा दक्षिण से आकर वहाँ रहने लगा हो, ऐसा कहते हैं।
राजशेखर के अनुसार 'रामिल' और 'सोमिल' नामक कवियों ने 'शूद्रककथा' नाम का ग्रन्थ लिखा था⁴। यह 'सोमिल' वही प्रतीत होता है जिसका उल्लेख कालिदास ने 'सौमिल्लक' नाम से किया है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि
१. त्रिषु वर्षसहस्रेषु कलेर्यातेषु पार्थिव।
त्रिशतेषु दशन्यूनेष्वस्यां भुवि भविष्यति ॥
शूद्रको नाम वीराणामधिपः सिद्धिमत्र सः।
चर्चितायां समाराध्य लप्स्यते भूभयापहः ॥
२. मृच्छकटिक भूमिका M.R. काले पृ० १९।
३. द्र० मृच्छकटिक-भूमिका श्रीनिवासशास्त्री पृ० १३ ।
४. तौ शूद्रककथाकारौ रम्यो रामिलसौमिलौ।
काव्यं ययोर्द्वयोरासीदर्धनारीनरोपमम् ॥
१२ मृच्छकटिक
'सोमिल' कालिदास से प्राचीन था और शूद्रक इसका समकालीन या इससे पूर्ववर्ती था।
प्रो० कोनो ने आभीरवंश के राजा शिवदत्त को ही शूद्रक बताया है। इनका राज्यकाल ई० की तीसरी शती है। इसका आधार 'गोपालदारक' शब्द है।$^१$ अन्य कुछ विद्वानों ने भी कुछ शब्दों के साम्यादि को आधार मानकर अनेक कल्पनायें की हैं जिनका कोई विशेष महत्त्व नहीं है।
साहित्यिक उल्लेख :
कुछ ऐसे साहित्यिक उल्लेख यह सिद्ध करते हैं कि उदयन तथा विक्रमादित्य के समान शूद्रक भी एक साहित्यानुरागी राजा था। शूद्रक के नाम से 'विक्रान्त-शूद्रक' 'शूद्रकवध', 'शूद्रकचरित' आदि ग्रन्थों का उल्लेख मिलता है। परन्तु अभी तक ये ग्रन्थ उपलब्ध नहीं हुये हैं। अतः इनके द्वारा किसी प्रकार का निर्णय करना कठिन है। कल्हण ने अपनी 'राजतरंगिणी' में और सोमदेव ने अपने 'कथासरित्-सागर' में 'शूद्रक' का उल्लेख किया है। बाण ने अपनी 'कादम्बरी' में शूद्रक को विदिशा का राजा बताया है और 'हर्षचरित' में इसे चन्द्रकेतु का शत्रु कहा है। दण्डी ने भी 'दशकुमारचरित' में शूद्रक का उल्लेख किया है। 'वेताल-पंचविंशतिका' में शूद्रक की राजधानी 'वर्धमान' या 'शोभावती' कही गयी है। वामन ने अपने काव्यालंकारसूत्र में शूद्रक का कवि के रूप में स्पष्ट उल्लेख किया है और मृच्छकटिक के कुछ उदाहरण भी दिये हैं।$^२$
उपर्युक्त विवेचन से यह प्रतीत होता है कि शूद्रक नाम के कई राजा और कवि हुये थे। परन्तु मृच्छकटिक का रचयिता कौन सा शूद्रक है-यह कहना कठिन है।
मृच्छकटिक का रचनाकाल
जिस प्रकार मृच्छकटिक के कर्ता शूद्रक का व्यक्तित्व विवादग्रस्त है ठीक इसी प्रकार इनका काल भी। इनका काल ई० पू० ३०० से लेकर ई०अ० ६०० तक के मध्य में दोलायमान है।
(क) ई० पू० ३०० से लेकर ई० प्रथम शती तक :
कुछ विद्वान यह कहते हैं कि मृच्छकटिक का रचयिता शूद्रक आन्ध्रवंशीय प्रथम राजा से अभिन्न है। अतः इसका काल ई० पू० तीसरी शती से लेकर ई०
१ मृच्छकटिक-भूमिका श्री कान्तानाथ शास्त्री तेलंग पृ० ८।
२. मृच्छकटिक-भूमिका श्रीनिवास शास्त्री पृ० ८।
भूमिका १३
अ० प्रथम शती का मध्य हो सकता है। इस काल की पुष्टि अन्तःसाक्ष्य और बाह्य साक्ष्य दोनों से होती है। इस वक्तव्य में M.R. काले के विचार ध्यान देने योग्य हैं —
(१) इस नाटक के कथानक के अनुसार उस समय बौद्ध धर्म उन्नत अवस्था में था। जनता में बौद्ध भिक्षुओं का सम्मान था। भिक्षु भी अपने धर्म का पालन सावधानी से करते थे। ईसा की पहली शती से ही बौद्धधर्म ह्रासोन्मुख हो चला था। अतः इसकी रचना इस काल के पहले की होनी चाहिये, जैसा कि भण्डारकर ने बताया है कि आन्ध्रवंशीय राजाओं के समय बौद्ध धर्म उन्नत अवस्था में था।$^१$
(२) नवम अंक में अधिकरणिक ने 'अङ्गारकविरुद्धस्य' [ ९।३३ ] इस श्लोक में मंगल को वृहस्पति का शत्रु ग्रह बताया गया है। यह मान्यता वराहमिहिर से पहले की थी। वराहमिहिर का काल ई० ५०० के लगभग माना जाता है। अतः इससे काफी पहले ही इस मृच्छकटिक की रचना हो जानी चाहिये।
(३) "वैशिकी कला"$^२$ का उल्लेख तथा किसी वेश्या के नायिका बनने की कल्पना वात्स्यायन के कामसूत्र की रचना के समकालीन या उसके बाद होनी चाहिये। कामसूत्र की रचना ई० १०० के अनन्तर नहीं मानी जा सकती। अतः मृच्छकटिक भी इसी के समीप का होना चाहिये।
(४) नाट्यकला के ऐसे अनेक नियम बाद में प्रचलित हुये जिनसे मृच्छकटिक का कर्ता परिचित नहीं प्रतीत होता है। उदाहरणार्थ—किसी पात्र के विशेष प्राकृत बोलने का नियम, रसों की प्रधानता का नियम आदि। इसके अतिरिक्त मृच्छकटिक में भास के समान सादगी और सरलता है। इसकी शैली कालिदास के समान न तो परिष्कृत है और न भवभूति के समान कलापूर्ण। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि मृच्छकटिक की रचना संस्कृत नाटकों के आरम्भिक काल की है।
(५) मृच्छकटिक की प्राकृत भाषायें व्याकरण के नियमों के सर्वथा अनुकूल नहीं प्रतीत होती हैं। वे प्राकृत भाषा के प्रारम्भिक विकास को सूचित करती हैं। इससे कालिदास की अपेक्षा शूद्रक की प्राचीनता सिद्ध होती है।
उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि शूद्रक कालिदास से प्राचीन हैं। क्योंकि रामिल तथा सोमिल ने 'शूद्रककथा' लिखी थी और कालिदास ने सोमिल का उल्लेख किया है। यहाँ शंका हो सकती है कि कालिदास
१. मृच्छकटिक भूमिका M.R. काले पृ० ३२ में। २. मृच्छकटिक १।४।
१४ मृच्छकटिक
ने शूद्रक का उल्लेख क्यों नहीं किया ? उत्तर है कि उस समय तक शायद शूद्रक की उतनी अधिक प्रसिद्धि नहीं हो पायी होगी।
(ख) ३०० ई० से लेकर ७०० ई० के मध्य :
कुछ विद्वान उपर्युक्त प्राचीनता नहीं मानते हैं। उनका तर्क यह है कि भास के 'चारुदत्त' नाटक की खोज के बाद यह सिद्ध हो गया है कि 'मृच्छकटिक' की रचना 'चारुदत्त' के आधार पर हुई है। अतः मृच्छकटिक के कर्ता शूद्रक की सीमा भास का समय हो सकती है और भास का समय अभी तक अनिर्णीत है। उनका समय ई० पू० ३०० से लेकर ई० अ० ६०० के मध्य माना जा सकता है। मृच्छकटिक के नवमं अंक में अधिकरणिक ने चारुदत्त को दण्ड देने के लिये मनु का यह आदेश उद्धृत किया है।
“अयं हि पातकी विप्रो न वध्यो मनुरब्रवीत् । राष्ट्रादस्मात्तु निर्वास्यो विभवैरक्षतः सह ॥”१
मनु का काल ई० पू० २०० है। अतः मृच्छकटिक की पूर्व सीमा ई० पू २०० के लगभग हो सकती है।२
डा० कीथ का मत है कि यह सन्देहास्पद है कि मृच्छकटिक कालिदास से प्राचीन है या अर्वाचीन। जैकोबी का मत है कि मृच्छकटिक कालिदास से अर्वाचीन है। कुछ समालोचकों का यह मत है कि कालिदास के नाटकों पर मृच्छकटिक का कोई प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं होता है, अतः कालिदास मृच्छकटिक की अपर सीमा नहीं हो सकते।
इनकी अपर सीमा क्या है ? वामन ने अपनी काव्यालंकार-सूत्र-वृत्ति में शूद्रक का कवि के रूप में उल्लेख किया है और मृच्छकटिक के कई पद्य भी उद्धृत किये हैं। अतः मृच्छकटिक की अपर सीमा वही है। दण्डी के काव्यादर्श में “लिम्पतीव” (१.३४) यह पद्य मिलता है। अतः ई० ७०० अपर सीमा है, ऐसा भी कुछ लोग मानते हैं। डा० देवस्थली के अनुसार पंचतन्त्र के दो पद्य मृच्छकटिक में हैं और पंचतन्त्र का समय ई० अ० ५०० है। अतः यह अपर सीमा हो सकती है। किन्तु इसका खण्डन कुछ विद्वानों ने किया है। उनके अनुसार पंचतन्त्र का काल अभी तक अनिर्णीत है।३ अतः दण्डी ही इसके अपर सीमा हो सकते हैं।
१. मृच्छकटिक ९।३९ । २. मृच्छकटिक-भूमिका श्री कान्तानाथ शास्त्री तैलंग पृ० १७ । ३. मृच्छकटिक-भूमिका श्री कान्तानाथ शास्त्री तैलंग पृ० १६ ।