मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 93, कुल 760 में से
संदर्भ में पढ़ें४
मृच्छकटिकम्
[नान्द्यन्ते]
विराजमानायाः गौरवर्णायाः विद्युल्लेखायाः शोभा दृश्यते तथैव नीलवर्णस्य भगवतः शङ्करस्य कण्ठे स्वयंग्राहितायाः गौर्याः बाहोः शोभा वर्तत इति भावः । उपमालंकारः, पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ २ ॥
विमर्शः—प्रस्तुत श्लोक में शिव को नीलकण्ठ कहा है। लोकोपकार के लिये भगवान् शङ्कर ने विषपान तक कर लिया था। इसी प्रकार इस प्रकरण का नायक चारुदत्त भी परोपकार करते करते अत्यन्त विपन्नता को प्राप्त कर गया था। जिस प्रकार जलपरिपूरित मेघों में विद्युत्-लेखा स्वयं प्रकट हो जाती है और पार्वती द्वारा शङ्कर के गले में स्वयं भुजाओं का आलिङ्गन कराया जाता है, उसी प्रकार नायक चारुदत्त के प्रति स्वतः आकृष्ट होने वाली वसन्तसेना उसके गले में अपनी भुजाओं का हार पहना देती है, अनुराग प्रकट करती है। इस कथाबीज का संकेत मिलता है "अर्थतः शब्दतो वापि मनाक् काव्यार्थसूचनम् ।" नीलाम्बुद यह विशेषण भी भावी घटना का सूचक है जब वसन्तसेना मेघाच्छन्न काल में चारुदत्त के पास अभिसरण करती है। इसमें श्याम वर्ण का उल्लेख संसार की कालिमा का और विघ्नोत्पादन का संकेत करता है जैसा कि आगे संस्थानक (शकार) के चरित्र में स्पष्ट होता है और गौर वर्ण वसन्तसेना के विशुद्ध पवित्र प्रेम का परिचय प्रदान करता है।
नीलकण्ठः—नीलः=नीलवर्णः कण्ठः=गलप्रदेशः यस्य सः — बहुव्रीहिसमास । श्यामाम्बुदोपमः श्यामश्चासौ अम्बुदश्च श्यामाम्बुदः, तेन उपमा=सादृश्यं यस्य सः—कर्मधारयगर्भतृतीयातत्पुरुषः । श्यामाम्बुद एव उपमा=सादृश्यं यस्य सः —यह भी कुछ लोग मानते हैं । गौरीभुजलता गौर्याः भुजः लता इव—इति गौरी-भुजलता—यहाँ पुरुषव्याघ्र के समान उपमितसमास है । अथवा भुजः एव लता यह विग्रह है ।
नीलकण्ठस्य कण्ठः—इसमें लाटानुप्रास है । विद्युल्लेखा इव—में उपमा है । भुज एव लता—में रूपक अलङ्कार है । ये परस्पर निरपेक्ष रूप से हैं अतः संसृष्टि अलङ्कार है—"मिथोऽनपेक्षयैतेषां स्थितिः संसृष्टिरुच्यते ।"
इसमें पथ्यावक्त्र छन्द है—'युजोश्चतुर्थतो जेन पथ्यावक्त्रं प्रकीर्तितम् ।' अर्थात् सम पादों में चतुर्थ अक्षर के बाद जगण से युक्त पथ्यावक्त्र छन्द होता है ॥ २ ॥
अर्थ— नान्द्यन्ते—नान्दी समाप्त हो जाने पर ।
टीका—नान्द्याः अन्ते=समाप्तौ । नन्दन्ति देवता अस्याम् इति नान्दी । अत्र रमन्ते योगिनोऽस्मिन्निति राम इतिवत् अधिकरणे घञ्—नन्दः, ततः स्वार्थेऽणि, ङीपि 'नान्दी' ति सिध्यति । अथवा नन्दयति=प्रसादयति इति नन्दः, पचादित्वा-