भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः ३

अपि च,--

पातु वो नीलकण्ठस्य कण्ठः श्यामाम्बुदोपमः ।
गौरीभुजलता यत्र विद्युल्लेखेव राजते ॥ २ ॥

शून्यं यथा स्यात् तथा पश्यतः—यह अर्थ करना चाहिये । जीवानन्द ने 'आत्मानम्' और 'पश्यतः' दोनों का विशेषण लिखा है। क्रियाविशेषण मानते हुये लिखा है—"यद्वा क्रियाविशेषणमेतत्, तथात्वे करणम्=हेतुः, व्यपगतं करणं यत्र तत् व्यपगत-करणम्—अहेतुकं यथा स्यात् तथा इत्यर्थः; शुद्धसत्त्वविग्रहस्य योगज्ञानमयस्य योग-गम्यस्य योगिभिश्चिन्त्यमानस्य हि भगवतः शम्भोः योगकरणे कारणानावश्यकत्वा-दिति भावः ।"

मनोरंजनार्थ किये जाने वाले इस 'प्रकरण' के आदि में शङ्कर की समाधि-अवस्था का वर्णन दर्शकों की चित्त की एकाग्रता सूचित करने के लिये है ॥ १ ॥

अन्वयः--नीलकण्ठस्य, श्यामाम्बुदोपमः, [ सः ] कण्ठः, वः, पातु, यत्र, गौरीभुजलता, विद्युल्लेखा, इव, राजते ॥ २ ॥

शब्दार्थः--नीलकण्ठस्य=[ विषपान से ] नीलवर्ण के कण्ठवाले भगवान् शिव का, श्यामाम्बुदोपमः=काले बादल के समान, [ सः-वह पुराणादि कथाओं में प्रसिद्ध ], कण्ठः=कण्ठ, ग्रीवा, [ अर्थात् ग्रीवावाले ] वः=आप [ समस्त दर्शकों ] की, पातु=रक्षा करें; यत्र=जिस [ कण्ठ ] में, गौरीभुजलता=पार्वती की लतातुल्य बाहें, विद्युल्लेखा=बिजली की पतली रेखा, इव=के समान, राजते=सुशोभित हो रही हैं ॥ २ ॥

अर्थ--[समुद्रमन्थन से निकले हुये विष का पान करने से ] नील [ काले ] वर्ण के कण्ठवाले भगवान् शङ्कर का श्याम=नीले बादल के समान [ वह पुराणादि ग्रन्थों में अति प्रसिद्ध ] कण्ठ [अर्थात् कण्ठवाले शिव] आप सभी दर्शकों की रक्षा करे; जिस कण्ठ में गौरी=गौरवर्णवाली पार्वती की लतातुल्य भुजायें बिजली की रेखा=पंक्ति के समान शोभित हो रही हैं ॥ २ ॥

टीका--नीलकण्ठस्य:=नीलः=नीलवर्णः=श्यामवर्णः, कण्ठः=गलप्रदेशो यस्य सः, तस्य शङ्करस्येत्यर्थः, श्यामाम्बुदोपमः=श्यामश्चासावम्बुदश्चेति श्यामाम्बुदः=नीलजलदः, तेन उपमा=सादृश्यं यस्य सः, [ सः=पुराणादिकथासु प्रसिद्धः ] कण्ठः=गलप्रदेशः, तादृशकण्ठवान् इति भावः, वः=युष्मान् दर्शकान् सामाजिकानित्यर्थः, पातु=रक्षतु; यत्र=यस्मिन् कण्ठे, गौरीभुजलता=गौर्याः=गौरवर्णवत्याः पार्वत्याः, भुजः लता इव, पुरुष-व्याघ्र इव समासः, अथवा भुजः=बाहुः एव लता=वल्ली, अत्र कण्ठाश्लेषे वेष्टनधर्मसाम्यात् भुजे लतातत्वधर्मस्य आरोपो बोध्यः, विद्युल्लेखा=विद्युतः=तडितः लेखा=रेखा, पंक्तिः, इव=यथा, राजते=शोभते । यथा नीलमेघमध्ये .