मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ मृच्छकटिकम्
अर्थ—[ योगासन की ] पर्यङ्कनामक ग्रन्थि [ पलथी ] को बांधने के लिये अथवा बांधने से दोहराये गये सर्प के लपेटने से बंधी हुयी जंघाओं वाले, [ यौगिक प्रक्रिया से शरीर के ] भीतर ही प्राण आदि [ पाँच ] वायुओं को रोक देने से विषयज्ञानशून्य इन्द्रियोंवाले, यथार्थ ज्ञानद्वारा अपने में परमात्मा का ही व्यापार-शून्यरूप से अथवा कारणशून्य रूप से अनुभव करने वाले, [ योगिराज भगवान् ] शङ्कर की निराकार का दर्शन=अनुभव करने से होने वाली तल्लीनता के कारण ब्रह्म में लगी हुयी समाधि=चित्त की एकाग्रता [अर्थात् समाधिलीन शङ्कर भगवान्] आप सभी सामाजिकों की रक्षा करे ॥ १ ॥
**टीका—**निर्विघ्नेन प्रारिप्सितग्रन्थपरिसमाप्तिकामः "तथाप्यवश्यं कर्तव्या नान्दी विघ्नोपशान्तये" इत्याप्तवचनमनुसृत्य शम्भोः समाधिवर्णनरूपमङ्गलमाचरति– पर्यङ्केति। पर्यङ्कः=पर्यस्तिका, तस्य ग्रन्थिः=रचनम्, तस्य बन्धार्थम् बन्धेन वा, द्विगुणितः=द्विरावृत्तः, यो भुजगः=सर्पः, तस्य=आश्लेषेण=वेष्टनेन, संवीते=बद्धे=संरुद्धे स्थगिते वा, जानुनी=जङ्घोरुमध्यभागौ यस्य तादृशस्य; अन्तः=शरीराभ्यन्तरे, प्राणानाम्=प्राणापानादिपञ्चवायूनाम्, अवरोधेन=नियमनेन निरोधेन वा, व्युपरतम्=विशेषेण निवृत्तम्, सकलम्=निखिलम्, ज्ञानम्=बाह्यविषयज्ञानम् येषां तानि, तथा रुद्धानि=संयतानि, इन्द्रियाणि यस्य तादृशस्य; तत्त्वदृष्ट्या=अनारोपितज्ञानेन ब्रह्म-दर्शनेन वा, आत्मनि=स्वस्मिन्, आत्मानम्=परमात्मानम्, एव, व्यपगतकरणम्=क्रियाविशेषणमेतत्, करणशब्दोऽत्र व्यापारपरः हेतुपरो वा, एवञ्च व्यापारशून्य-महेतुकं वा यथा स्यात् तथा, पश्यतः=अनुभवतः, साक्षात्कुर्वतः, शम्भोः=योगिराजस्य शङ्करस्य, शून्येक्षणे=निराकारालोचने, घटितः=अत्यन्तसम्बन्धः यो लयः=तल्लीनता, तेन, अथवा शून्येने=संहारोन्मुखत्वात् सृष्टिविमुखेन, ईक्षणेन=दृष्ट्या, घटितः=कृतः, यो लयः=प्रलयः, तस्मिन्, प्रलयकाले इत्यर्थः, ब्रह्मणि=परमात्मनि, लग्नः=निहितः, आसक्तः; समाधिः=समाधानं चित्तैकाग्र्यं वा; समाधिस्थः शङ्कर इति भावः, [ कर्तृ पदमेतत् ] वः=युष्मान् सामाजिकान्; पातु=रक्षतु। स्रग्धरा वृत्तम् ॥ १ ॥
**विमर्श—**नाटक के प्रारम्भ में विघ्नशान्ति के लिये मङ्गलाचरण का विधान है। इसे नान्दी कहते हैं। उसके लिये यह प्रथम श्लोक है। पर्यङ्क-ग्रन्थि शब्द के कई अर्थ किये गये हैं। यह एक विशेष योगासन है। इस में एक पैर की जांघ के ऊपर दूसरे पैर को रखकर दोनों को बांध दिया जाता है। उसे और दृढ़ करने के लिये दोहराये गये सर्प को भगवान शङ्कर ने बांध रखा है। प्राण से प्राण, अपान आदि पाँच वायुओं को लेना चाहिये। इसमें 'व्यपगतकरणम्'—इसे प्रायः 'आत्मानम्' का विशेषण लिखा गया है परन्तु इसकी अपेक्षा इसे 'पश्यतः' क्रिया का विशेषण मानना अधिक तर्कसंगत है। करण का अर्थ व्यापार है। इस प्रकार—व्यापार-