भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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॥ श्रीः ॥

मृच्छकटिकम्

सविमर्श-‘भावप्रकाशिका’-संस्कृत-हिन्दीव्याख्योपेतम्

प्रथमोऽङ्कः

नान्दी—

पर्यङ्कग्रन्थिबन्धद्विगुणितभुजगाश्लेषसंवीतजानो-
रन्तःप्राणावरोधव्युपरतसकलज्ञानरुद्धेन्द्रियस्य ।
आत्मन्यात्मानमेव व्यपगतकरणं पश्यतस्तत्त्वदृष्ट्या
शम्भोर्वः पातु शून्येक्षणघटितलयब्रह्मलग्नः समाधिः ॥ १ ॥


भावप्रकाशिका

विश्वेशं शारदां ढुण्ढिं नत्वा च पवनात्मजम् ।
व्याख्यां मृच्छकटिकस्य कुरुते जयशङ्करः ॥

**अन्वयः—**पर्यङ्क-ग्रन्थि-बन्ध-द्विगुणित-भुजगाश्लेष-संवीतजानोः, अन्तःप्राणावरोधव्युपरत-सकल-ज्ञान-रुद्धेन्द्रियस्य, तत्त्वदृष्ट्या, आत्मनि, आत्मानम्, एव, व्यपगतकरणम्, पश्यतः, शम्भोः, शून्येक्षणघटितलय-ब्रह्मलग्नः, समाधिः, वः, पातु ॥ १ ॥

**शब्दार्थ—**पर्यङ्क-ग्रन्थि-बन्ध-द्विगुणित-भुजगाश्लेष-संवीत-जानोः = [ योगासन की ] पर्यङ्क नामक ग्रन्थि [ गांठ=पलथी ] को बांधने के लिये [ अथवा बांधने से ] दोहरे किये गये सर्प के लपेटने से बंधी हुयी जांघोंवाले, अन्तःप्राणावरोध-व्युपरत-सकल-ज्ञानरुद्धेन्द्रियस्य= [ यौगिक प्रक्रिया द्वारा शरीर के ] भीतर ही प्राण आदि वायुओं के रोक देने के कारण विषय-ज्ञानशून्य इन्द्रियोंवाले, तत्त्वदृष्ट्या=सम्यक् दर्शन से अथवा यथार्थज्ञान द्वारा, आत्मनि=अपने में, आत्मानम्=अपने को=परमात्मा को, एव=ही, व्यपगतकरणम्=व्यापाररहित रूप से अथवा कारणरहित रूप से, पश्यतः=देखनेवाले, अनुभव करनेवाले, शम्भोः=योगिराज भगवान् शङ्कर की, शून्येक्षण-घटितलयब्रह्मलग्नः=निराकार के दर्शन=अनुभव से होने वाली तल्लीनता के कारण ब्रह्म में लगी हुयी अथवा शून्य=सृष्टिविमुख दृष्टि से किये गये प्रलय के समय ब्रह्म में लगी हुयी, समाधि=समाधान, चित्त की एकाग्रता, [अर्थात् समाधिस्थ शंकर जी] वः=आप सामाजिकों की, पातु=रक्षा करे ॥ १ ॥

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