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मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

२ मृच्छकटिकम्

अर्थ—[ योगासन की ] पर्यङ्कनामक ग्रन्थि [ पलथी ] को बांधने के लिये अथवा बांधने से दोहराये गये सर्प के लपेटने से बंधी हुयी जंघाओं वाले, [ यौगिक प्रक्रिया से शरीर के ] भीतर ही प्राण आदि [ पाँच ] वायुओं को रोक देने से विषयज्ञानशून्य इन्द्रियोंवाले, यथार्थ ज्ञानद्वारा अपने में परमात्मा का ही व्यापार-शून्यरूप से अथवा कारणशून्य रूप से अनुभव करने वाले, [ योगिराज भगवान् ] शङ्कर की निराकार का दर्शन=अनुभव करने से होने वाली तल्लीनता के कारण ब्रह्म में लगी हुयी समाधि=चित्त की एकाग्रता [अर्थात् समाधिलीन शङ्कर भगवान्] आप सभी सामाजिकों की रक्षा करे ॥ १ ॥

**टीका—**निर्विघ्नेन प्रारिप्सितग्रन्थपरिसमाप्तिकामः "तथाप्यवश्यं कर्तव्या नान्दी विघ्नोपशान्तये" इत्याप्तवचनमनुसृत्य शम्भोः समाधिवर्णनरूपमङ्गलमाचरति– पर्यङ्केति। पर्यङ्कः=पर्यस्तिका, तस्य ग्रन्थिः=रचनम्, तस्य बन्धार्थम् बन्धेन वा, द्विगुणितः=द्विरावृत्तः, यो भुजगः=सर्पः, तस्य=आश्लेषेण=वेष्टनेन, संवीते=बद्धे=संरुद्धे स्थगिते वा, जानुनी=जङ्घोरुमध्यभागौ यस्य तादृशस्य; अन्तः=शरीराभ्यन्तरे, प्राणानाम्=प्राणापानादिपञ्चवायूनाम्, अवरोधेन=नियमनेन निरोधेन वा, व्युपरतम्=विशेषेण निवृत्तम्, सकलम्=निखिलम्, ज्ञानम्=बाह्यविषयज्ञानम् येषां तानि, तथा रुद्धानि=संयतानि, इन्द्रियाणि यस्य तादृशस्य; तत्त्वदृष्ट्या=अनारोपितज्ञानेन ब्रह्म-दर्शनेन वा, आत्मनि=स्वस्मिन्, आत्मानम्=परमात्मानम्, एव, व्यपगतकरणम्=क्रियाविशेषणमेतत्, करणशब्दोऽत्र व्यापारपरः हेतुपरो वा, एवञ्च व्यापारशून्य-महेतुकं वा यथा स्यात् तथा, पश्यतः=अनुभवतः, साक्षात्कुर्वतः, शम्भोः=योगिराजस्य शङ्करस्य, शून्येक्षणे=निराकारालोचने, घटितः=अत्यन्तसम्बन्धः यो लयः=तल्लीनता, तेन, अथवा शून्येने=संहारोन्मुखत्वात् सृष्टिविमुखेन, ईक्षणेन=दृष्ट्या, घटितः=कृतः, यो लयः=प्रलयः, तस्मिन्, प्रलयकाले इत्यर्थः, ब्रह्मणि=परमात्मनि, लग्नः=निहितः, आसक्तः; समाधिः=समाधानं चित्तैकाग्र्यं वा; समाधिस्थः शङ्कर इति भावः, [ कर्तृ पदमेतत् ] वः=युष्मान् सामाजिकान्; पातु=रक्षतु। स्रग्धरा वृत्तम् ॥ १ ॥

**विमर्श—**नाटक के प्रारम्भ में विघ्नशान्ति के लिये मङ्गलाचरण का विधान है। इसे नान्दी कहते हैं। उसके लिये यह प्रथम श्लोक है। पर्यङ्क-ग्रन्थि शब्द के कई अर्थ किये गये हैं। यह एक विशेष योगासन है। इस में एक पैर की जांघ के ऊपर दूसरे पैर को रखकर दोनों को बांध दिया जाता है। उसे और दृढ़ करने के लिये दोहराये गये सर्प को भगवान शङ्कर ने बांध रखा है। प्राण से प्राण, अपान आदि पाँच वायुओं को लेना चाहिये। इसमें 'व्यपगतकरणम्'—इसे प्रायः 'आत्मानम्' का विशेषण लिखा गया है परन्तु इसकी अपेक्षा इसे 'पश्यतः' क्रिया का विशेषण मानना अधिक तर्कसंगत है। करण का अर्थ व्यापार है। इस प्रकार—व्यापार-

प्रथमोऽङ्कः ३

अपि च,--

पातु वो नीलकण्ठस्य कण्ठः श्यामाम्बुदोपमः ।
गौरीभुजलता यत्र विद्युल्लेखेव राजते ॥ २ ॥

शून्यं यथा स्यात् तथा पश्यतः—यह अर्थ करना चाहिये । जीवानन्द ने 'आत्मानम्' और 'पश्यतः' दोनों का विशेषण लिखा है। क्रियाविशेषण मानते हुये लिखा है—"यद्वा क्रियाविशेषणमेतत्, तथात्वे करणम्=हेतुः, व्यपगतं करणं यत्र तत् व्यपगत-करणम्—अहेतुकं यथा स्यात् तथा इत्यर्थः; शुद्धसत्त्वविग्रहस्य योगज्ञानमयस्य योग-गम्यस्य योगिभिश्चिन्त्यमानस्य हि भगवतः शम्भोः योगकरणे कारणानावश्यकत्वा-दिति भावः ।"

मनोरंजनार्थ किये जाने वाले इस 'प्रकरण' के आदि में शङ्कर की समाधि-अवस्था का वर्णन दर्शकों की चित्त की एकाग्रता सूचित करने के लिये है ॥ १ ॥

अन्वयः--नीलकण्ठस्य, श्यामाम्बुदोपमः, [ सः ] कण्ठः, वः, पातु, यत्र, गौरीभुजलता, विद्युल्लेखा, इव, राजते ॥ २ ॥

शब्दार्थः--नीलकण्ठस्य=[ विषपान से ] नीलवर्ण के कण्ठवाले भगवान् शिव का, श्यामाम्बुदोपमः=काले बादल के समान, [ सः-वह पुराणादि कथाओं में प्रसिद्ध ], कण्ठः=कण्ठ, ग्रीवा, [ अर्थात् ग्रीवावाले ] वः=आप [ समस्त दर्शकों ] की, पातु=रक्षा करें; यत्र=जिस [ कण्ठ ] में, गौरीभुजलता=पार्वती की लतातुल्य बाहें, विद्युल्लेखा=बिजली की पतली रेखा, इव=के समान, राजते=सुशोभित हो रही हैं ॥ २ ॥

अर्थ--[समुद्रमन्थन से निकले हुये विष का पान करने से ] नील [ काले ] वर्ण के कण्ठवाले भगवान् शङ्कर का श्याम=नीले बादल के समान [ वह पुराणादि ग्रन्थों में अति प्रसिद्ध ] कण्ठ [अर्थात् कण्ठवाले शिव] आप सभी दर्शकों की रक्षा करे; जिस कण्ठ में गौरी=गौरवर्णवाली पार्वती की लतातुल्य भुजायें बिजली की रेखा=पंक्ति के समान शोभित हो रही हैं ॥ २ ॥

टीका--नीलकण्ठस्य:=नीलः=नीलवर्णः=श्यामवर्णः, कण्ठः=गलप्रदेशो यस्य सः, तस्य शङ्करस्येत्यर्थः, श्यामाम्बुदोपमः=श्यामश्चासावम्बुदश्चेति श्यामाम्बुदः=नीलजलदः, तेन उपमा=सादृश्यं यस्य सः, [ सः=पुराणादिकथासु प्रसिद्धः ] कण्ठः=गलप्रदेशः, तादृशकण्ठवान् इति भावः, वः=युष्मान् दर्शकान् सामाजिकानित्यर्थः, पातु=रक्षतु; यत्र=यस्मिन् कण्ठे, गौरीभुजलता=गौर्याः=गौरवर्णवत्याः पार्वत्याः, भुजः लता इव, पुरुष-व्याघ्र इव समासः, अथवा भुजः=बाहुः एव लता=वल्ली, अत्र कण्ठाश्लेषे वेष्टनधर्मसाम्यात् भुजे लतातत्वधर्मस्य आरोपो बोध्यः, विद्युल्लेखा=विद्युतः=तडितः लेखा=रेखा, पंक्तिः, इव=यथा, राजते=शोभते । यथा नीलमेघमध्ये .

मृच्छकटिकम्

[नान्द्यन्ते]


विराजमानायाः गौरवर्णायाः विद्युल्लेखायाः शोभा दृश्यते तथैव नीलवर्णस्य भगवतः शङ्करस्य कण्ठे स्वयंग्राहितायाः गौर्याः बाहोः शोभा वर्तत इति भावः । उपमालंकारः, पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ २ ॥

विमर्शः—प्रस्तुत श्लोक में शिव को नीलकण्ठ कहा है। लोकोपकार के लिये भगवान् शङ्कर ने विषपान तक कर लिया था। इसी प्रकार इस प्रकरण का नायक चारुदत्त भी परोपकार करते करते अत्यन्त विपन्नता को प्राप्त कर गया था। जिस प्रकार जलपरिपूरित मेघों में विद्युत्-लेखा स्वयं प्रकट हो जाती है और पार्वती द्वारा शङ्कर के गले में स्वयं भुजाओं का आलिङ्गन कराया जाता है, उसी प्रकार नायक चारुदत्त के प्रति स्वतः आकृष्ट होने वाली वसन्तसेना उसके गले में अपनी भुजाओं का हार पहना देती है, अनुराग प्रकट करती है। इस कथाबीज का संकेत मिलता है "अर्थतः शब्दतो वापि मनाक् काव्यार्थसूचनम् ।" नीलाम्बुद यह विशेषण भी भावी घटना का सूचक है जब वसन्तसेना मेघाच्छन्न काल में चारुदत्त के पास अभिसरण करती है। इसमें श्याम वर्ण का उल्लेख संसार की कालिमा का और विघ्नोत्पादन का संकेत करता है जैसा कि आगे संस्थानक (शकार) के चरित्र में स्पष्ट होता है और गौर वर्ण वसन्तसेना के विशुद्ध पवित्र प्रेम का परिचय प्रदान करता है।

नीलकण्ठः—नीलः=नीलवर्णः कण्ठः=गलप्रदेशः यस्य सः — बहुव्रीहिसमास । श्यामाम्बुदोपमः श्यामश्चासौ अम्बुदश्च श्यामाम्बुदः, तेन उपमा=सादृश्यं यस्य सः—कर्मधारयगर्भतृतीयातत्पुरुषः । श्यामाम्बुद एव उपमा=सादृश्यं यस्य सः —यह भी कुछ लोग मानते हैं । गौरीभुजलता गौर्याः भुजः लता इव—इति गौरी-भुजलता—यहाँ पुरुषव्याघ्र के समान उपमितसमास है । अथवा भुजः एव लता यह विग्रह है ।

नीलकण्ठस्य कण्ठः—इसमें लाटानुप्रास है । विद्युल्लेखा इव—में उपमा है । भुज एव लता—में रूपक अलङ्कार है । ये परस्पर निरपेक्ष रूप से हैं अतः संसृष्टि अलङ्कार है—"मिथोऽनपेक्षयैतेषां स्थितिः संसृष्टिरुच्यते ।"

इसमें पथ्यावक्त्र छन्द है—'युजोश्चतुर्थतो जेन पथ्यावक्त्रं प्रकीर्तितम् ।' अर्थात् सम पादों में चतुर्थ अक्षर के बाद जगण से युक्त पथ्यावक्त्र छन्द होता है ॥ २ ॥

अर्थ— नान्द्यन्ते—नान्दी समाप्त हो जाने पर ।

टीका—नान्द्याः अन्ते=समाप्तौ । नन्दन्ति देवता अस्याम् इति नान्दी । अत्र रमन्ते योगिनोऽस्मिन्निति राम इतिवत् अधिकरणे घञ्—नन्दः, ततः स्वार्थेऽणि, ङीपि 'नान्दी' ति सिध्यति । अथवा नन्दयति=प्रसादयति इति नन्दः, पचादित्वा-

प्रथमोऽङ्कः ५

वृद्धि । नन्द एव नान्दः—'प्रज्ञादिभ्योऽण्' इति स्वार्थेऽणि ततो ङीपि 'नान्दी' इति सिध्यति ।

विमर्श—देवता, ब्राह्मण अथवा राजा आदि को प्रसन्न करने के लिये नाटकादि के प्रारम्भ में आशीर्वाद से युक्त जो स्तुतिपाठ किया जाता है उसे नान्दी कहा जाता है। आचार्य भरत ने लिखा है—

आशीर्वचनसंयुक्ता स्तुतिर्यस्मात् प्रयुज्यते ।
देवद्विजनृपादीनां तस्मान्नान्दीति संज्ञिता ॥ [ साहित्यदर्पण ६।२४ ]
देवद्विजनृपादीनामाशीर्वचनपूर्विका ।
नन्दन्ति देवता यस्यां तस्मान्नान्दीति कीर्तिता ॥

नान्दी के विस्तार के विषय में यह है—

अष्टाभिर्दशभिर्वाऽपि नान्दी द्विदशभिः पदैः ।
आशीर्नमस्क्रिया वस्तुनिर्देशो वापि तन्मुखम् ॥

यहाँ अष्टपदा नान्दी है क्योंकि दो श्लोकों में ४+४=८ पाद हैं। यहाँ कथावस्तु के बीज का सङ्केत होने से पत्रावली नामक 'नान्दी' है—

यस्यां बीजस्य विन्यासो ह्यभिधेयस्य वस्तुनः ।
श्लेषेण वा समासोक्त्या नान्दी पत्रावलीति सा ॥

सर्वत्र नाट्य ग्रन्थों में नान्दीपाठ के बाद सूत्रधार का उल्लेख प्राप्त है। अतः यह शंका स्वाभाविक है कि तब इस नान्दी का पाठ कौन करता है ? समाधान यह है कि सूत्रधार ही नान्दी का पाठ करता है। परन्तु शास्त्रीय परम्परानुसार सर्वप्रथम मंगलाचरण का उल्लेख होना चाहिये अतः पहले नान्दी श्लोकों का उल्लेख करके सूत्रधार शब्द का उल्लेख किया जाता है।

रङ्गशाला का प्रधान व्यवस्थापक सूत्रधार कहा जाता है। यह सूत्रधार ही नान्दी का पाठ करता है। सूत्रधार का यह लक्षण है —

नाट्योपकरणादीनि सूत्रमित्यभिधीयते ।
सूत्रं धारयतीत्यर्थे सूत्रधारो निगद्यते ॥

अर्थात् नाट्य के उपकरण एवं अभिनय के निर्देशन आदि को 'सूत्र' कहा जाता है, इसको धारण करने वाला 'सूत्रधार' कहा जाता है। इस प्रकार रंगमञ्च की व्यवस्था का अधिकारी और अभिनेताओं को निर्देशित करने वाला व्यक्ति सूत्रधार कहा जाता है। मातृगुप्ताचार्य ने सूत्रधार का विशद रूप लिखा है—

चतुरातोद्यनिष्णातोऽनेकभूषासमावृतः ।
नानाभाषणतत्त्वज्ञो नीतिशास्त्रार्थतत्त्ववित् ॥
नानागतिप्रचारज्ञो रसभावविशारदः ।
नाट्यप्रयोगनिपुणो नानाशिल्पकलान्वितः ॥

६ मृच्छकटिकम्

सूत्रधारः-- अलमनेन परिषत्कौतूहलविमर्दकारिणा परिश्रमेण । एवमहमार्यमिश्रान् प्रणिपत्य विज्ञापयामि - यदिदं वयं मृच्छकटिकं नाम प्रकरणं प्रयोक्तुं व्यवसिताः । एतत्कविः किल-


छन्दोविधानतत्त्वज्ञः सर्वशास्त्रविचक्षणः ।
तत्तद्गीतानुगलयकलातालावधारणः ॥
अविधानप्रयोक्ता च योक्तृणामुपदेशकः ।
एवं गुणगणोपेतः सूत्रधारोऽभिधीयते ॥

महाकवि भास आदि के समय में नान्दीपाठ पर्दे के पीछे से किया जाता था । इसके बाद सूत्रधार प्रवेश करके नाटक की प्रस्तावना करता था । चारुदत्त में लिखा है--“नान्द्यन्ते ततः प्रविशति सूत्रधारः।” यह ब्राह्मण रहने पर 'सूत्रधार' कहा जाता था । अन्यवर्ण का होने पर 'स्थापक' कहा जाता था । किन्तु कालिदास के उत्तरवर्त्ती नाटकों में सूत्रधार ही नान्दीपाठ करता था और प्रस्तावना भी करता था ।

शब्दार्थ-- परिषत्कौतूहलविमर्दकारिणा = सभा में उपस्थित लोगों की उत्कण्ठा का विघ्न करने वाले, हानि पहुँचाने वाले, अनेन = इस [ किये जाने वाले ], परिश्रमेण = [ अधिक नान्दीपाठ करने के ] परिश्रम से, अलम् = बस [ करे, अर्थात् अधिक नान्दीपाठ करने की आवश्यकता नहीं है ] । अहम् = मैं सूत्रधार, आर्यमिश्रान् = सम्माननीय सभासदों को, प्रणिपत्य = प्रणाम करके, एवम् = इस प्रकार, विज्ञापयामि = सूचित करता हूँ, यत् = कि, वयम् = हम अभिनेता लोग, इदम् = इस, मृच्छकटिकं नाम = मृच्छकटिक नामक, प्रकरणम् = रूपकविशेष प्रकरण को, प्रयोक्तुम् = अभिनीत करने के लिये, व्यवसिताः = तत्पर [ हैं ], किल = निश्चय ही, एतत्कविः = इस [ प्रकरण ] के लेखक कवि--

अर्थ

सूत्रधारः-- सभा में विराजमान लोगों की उत्सुकता को भंग करने वाले [ हानि पहुँचाने वाले ] इस [ नान्दीपाठ के विस्तार रूप ] परिश्रम को करना व्यर्थ है, अर्थात् इसे समाप्त करो । मैं सम्माननीय विद्वान् दर्शकों को प्रणाम करके इस प्रकार सूचित करता हूँ कि हम [ अभिनेता लोग ] 'मृच्छकटिक' नामक इस प्रकरण का अभिनय करने के लिये तत्पर हैं । इसके रचयिता कवि--

टीका-- परिषीदन्ति अस्यामिति परिषत्, अत्र लक्षणया परिषच्छब्दस्तत्रस्थान् जनान् सभ्यान् बोधयति । एवञ्च परिषद्दाम् = परिषत्स्थितानां जनानाम्, कुतूहलस्य = औत्सुक्यस्य, विमर्दकारिणा = बाधकेन, हानिकरेण वा, अनेन = क्रियमाणेन

प्रथमोऽङ्कः ७


नान्दीपाठरूपेण, परिश्रमेण=आयासेन, अलम्=व्यर्थम्, अधिकनान्दीपाठेन दर्शकाना- मुत्कण्ठाव्याघातात् तस्माद् विरतिरेवोचितेति भावः। आर्यान्-मान्यान्, मिश्रान्= अभ्यस्तबहुशास्त्रान्,

कुलं शीलं दया दानं धर्मः सत्यं कृतज्ञता ।
अद्रोह इति येष्वेतत् तानार्यान् सम्प्रचक्षते ॥

अपि च

कर्तव्यमाचरन् काममकर्तव्यमनाचरन् ।
तिष्ठति प्रकृताचारे स वै आर्य इति स्मृतः ॥

मिश्र इत्युपाधिः। प्रणिपत्य=प्रणम्य, एवम्=वक्ष्यमाणरूपेण, विज्ञापयामि= विनिवेदयामि, वयम्=अभिनेतारः, मृच्छकटिकम्=मृदः=मृत्तिकायाः, शकटिका= क्षुद्रशकटं यस्मिन् तत् मृच्छकटिकम्, अथवा मृदः शकटम्—मृण्मयं शकटं षष्ठेऽङ्के चारुदत्तपुत्ररोहसेनस्य क्रीडनार्थमुक्तं मृच्छकटम्, तदंश्चास्ति इति “अत इनिठनौ” [ पा० सू० ५।२।११५ ] इति ठनि, ठस्येकादेशे मृच्छकटिकम्, नाम=अन्वर्थ- नामकम्, प्रकरणम्=रूपकविशेषम्, प्रयोक्तुम् = अभिनेतुम्, व्यवसिताः=उद्युक्ताः कृतनिश्चयाः वा, । एतत्कविः=एतस्य प्रणेता, किल=निश्चयेन, वाक्यालङ्कारे वेदं बोध्यम् ।

विमर्श—‘अलम् अनेन’ यहाँ पर ‘गम्यमानापि क्रिया कारकविभक्तौ प्रयो- जिका’ इस नियम के आधार पर साधन क्रिया को गम्यमान मान कर तृतीया हुई है—‘अनेन साध्यं नास्ति’ अर्थात् इससे लाभ नहीं है, अतः नान्दीपाठ बन्द करो — यह अर्थ प्रतीत होता है । विमर्दकारिणा--इसका तात्पर्य है अनावश्यक रूप से उत्कण्ठा को दबाने के लिये बाध्य करने वाले । विमर्द + √कृ + णिनि । आर्य शब्द का अभिप्राय संस्कृत टीका में दो श्लोकों में लिखा है। मिश्र शब्द सम्मान एवं वैदुष्य का सूचक है । कुछ विद्वानों ने—आर्येषु=श्रेष्ठेषु, मिश्रान्=मुख्याः तान्’ यह अर्थ लिखा है । इसकी अपेक्षा यहाँ द्वन्द्व मान कर आर्य और मिश्र यह अर्थ करना उचित है। आर्य=सम्माननीय, मिश्र=बहुतशास्त्रों के ज्ञाता। इससे उस सभा में विद्वानों और अन्य विशिष्ट व्यक्तियों की उपस्थिति सिद्ध होती है ।

मृच्छकटिकम्-–इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है—(१) मृदः शकटिका (=मिट्टी की छोटी सी गाड़ी) अस्ति यस्मिन् तत् प्रकरणम्--मृच्छकटिकम् (२) मृदः शकटम् =मृच्छकटम् तद् वर्णितमस्ति अस्मिन्' इस अर्थ में ‘मृच्छकट’ शब्द से मत्वर्थीय ठन्=इक प्रत्यय करने पर मृच्छकटिकम् यह निष्पन्न होता है ।

इस प्रकरण के छठें अङ्क में चारुदत्त के पुत्र रोहसेन का मिट्टी की गाड़ी से खेलना वर्णित है। वहाँ की कथा अत्यन्त मार्मिक है। चारुदत्त अत्यन्त दरिद्र हो

मृच्छकटिकम्


चुका है। उसका पुत्र रोहसेन परिचारिका से सोने की गाड़ी लेकर खेलने का आग्रह करता हुआ रोने लगता है। यह करुण दृश्य देखकर वसन्तसेना का स्त्रीसुलभ वात्सल्य उमड़ने लगता है और वह उस बच्चे को सोने की गाड़ी के लिये अपने सभी स्वर्णभूषण उतार कर दे देती है। यहाँ कवि ने वसन्तसेना के चरित्र को उत्कृष्टता के शिखर पर प्रतिष्ठित कर दिया है।

यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि कालिदास आदि ने अपने नाटकों में अभिनयस्थल का भी संकेत किया है परन्तु इसमें यहाँ ऐसा कोई उल्लेख नहीं है। यह इस प्रकरण की प्राचीनतरता और लेखक की राजानाश्रितता द्योतित करता है।

प्रकरण—रूपक दश होते हैं। उनमें प्रकरण एक है –

नाटकमथ प्रकरणं भाणव्यायोगसमवकारडिमाः।
ईहामृगाङ्कवीथ्यः प्रहसनमिति रूपकाणि दश॥
साहित्यदर्पण ६।३

प्रकरण के स्वरूप के विषय में दशरूपक और साहित्यदर्पण में प्रायः समान वर्णन है—प्रकरण में वृत्त कविकल्पित एवं लोकाश्रित होता है। इसमें मन्त्री, ब्राह्मण या वणिक् नायक होता है। इसका नायक धीरप्रशान्त होता है जो धर्म, काम एवम् अर्थ — इस पुरुषार्थत्रय से सम्पन्न होता है और विपत्ति में फंसता है। इसमें भी नाटक के समान ही सन्धि आदि होतीं हैं। इसमें नायक की नायिकायें दो प्रकार की होती हैं—(१) कुलस्त्री और (२) गणिका। कहीं केवल कुलीना और कहीं केवल वेश्या और कहीं दोनों होती हैं। कुलजा का क्षेत्र भीतर सीमित होता है। वेश्या बाहरी क्षेत्रवाली होती है। इनका अतिक्रमण नहीं होता है। इसमें धूर्त आदि रहते हैं। यह तीन प्रकार का होता है। प्रथम प्रकार की [कुलीन] नायिका रहने पर (१) शुद्ध, वेश्या नायिका होने पर (२) विकृत, और दोनों प्रकार की नायिकायें रहने पर (३) सङ्कीर्ण होता है। दोनों प्रकार की नायिकायें होने से मृच्छटिक तृतीय प्रकार का है। दशरूपक में यह लिखा है—

अथ प्रकरणे वृत्तमुत्पाद्यं लोकसंश्रयम्।
अमात्यविप्रवणिजामेकं कुर्याच्च नायकम्॥
धीरप्रशान्तं सापायं धर्मकामार्थतत्परम्।
शेषं नाटकवत् सन्धि-प्रवेशक-रसादिकम्॥
नायिका तु द्विधा नेतुः कुलस्त्री गणिका तथा।
क्वचिदेकैकैव कुलजा, वेश्या क्वापि, द्वयं क्वचित्॥
कुलजाभ्यन्तरा, बाह्या वेश्या, नातिक्रमोऽनयोः।
आभिः प्रकरणं त्रेधा, सङ्कीर्णं धूर्तसङ्कुलम्॥
[ दशरूपक ३।३६-४२ ]

प्रथमोऽङ्कः


द्विरदेन्द्रगतिश्चकोरनेत्रः परिपूर्णेन्दुमुखः सुविग्रहश्च।
द्विजमुख्यतमः कविर्बभूव प्रथितः शूद्रक इत्यगाधसत्त्वः ॥ ३ ॥

इस प्रकरण का नायक चारुदत्त ब्राह्मण धीरप्रशान्त है। वसन्तसेना गणिका नायिका है और धर्मपत्नी धूता भी नायिका है। शकार आदि धूर्त पात्र हैं। शृङ्गार रस प्रधान है।

अन्वयः— द्विरदेन्द्रगतिः, चकोरनेत्रः, परिपूर्णेन्दुमुखः, सुविग्रहः, द्विजमुख्यतमः, अगाधसत्त्वः, च, शूद्रक, इति, प्रथितः, कविः, बभूव ॥ ३ ॥

शब्दार्थ— द्विरदेन्द्रगतिः= गजराज की चाल के समान मस्त चाल वाले, चकोरनेत्रः= चकोर नामक पक्षी की आखों के समान [सुन्दर] आखों वाले, परिपूर्णेन्दुमुखः= परिपूर्ण चन्द्र=पौर्णमासी के चन्द्रमा के तुल्य मुखवाले, सुविग्रहः= सुन्दर शरीर वाले, अगाधसत्त्वः= असीमित बलवाले, च= और, द्विजमुख्यतमः= क्षत्रियों में श्रेष्ठ, शूद्रकः= शूद्रक, इति= इस नाम से, प्रथितः= प्रसिद्ध, कविः= काव्यनिर्माता, बभूव= हुये ॥३॥

अर्थ— गजराज [ की मस्त चाल ] के समान [ मस्त ] चालवाले, चकोर नामक पक्षी [ की आखों ] के तुल्य आखोंवाले, पौर्णमासी के [ समस्त कला परिपूर्ण ] चन्द्रमा के समान सुन्दर मुखवाले, और सुन्दर [ सुगठित ] शरीरवाले, असीमित बलवाले, क्षत्रियों में श्रेष्ठ 'शूद्रक' इस नाम से प्रसिद्ध कवि हुये ॥ ३ ॥

टीका— द्विरदेन्द्रगतिः= द्वौ रदौ=दन्तौ [ बाह्यदृश्यमानौ ] यस्य सः, द्विरदः= गजः, द्विरदेषु इन्द्रः=अधिपतिः, तस्य गतिः इव गतिर्यस्य स; गजपतिरिव मन्दगतिमानित्यर्थः। चकोरनेत्रः= चकोराख्यस्य पक्षिणो नेत्रे इव नेत्रे यस्य सः; चकोरसदृशसुन्दरनयन इत्यर्थः। परिपूर्णेन्दुमुखः= परिपूर्णः=सकलकलायुतः, इन्दुः=चन्द्रः तस्येव सुन्दरं मुखम्=वदनं यस्य सः; पौर्णमास्याश्चन्द्रतुल्यसुन्दरवदन इत्यर्थः। सुविग्रहः— सुष्ठु=शोभनं विग्रहः=शरीरं यस्य सः; सुन्दरदेह इत्यर्थः। अगाधसत्त्वः— अगाधम्=असीमितं सत्त्वम्=बलं यस्य सः; असीमितबलशालीत्यर्थः। द्विजमुख्यतमः— द्विजेषु=क्षत्रियेषु, मुख्यतमः=श्रेष्ठः, शूद्रकः= एतन्नामकः, इति= अनेन रूपेण, प्रथितः= विख्यातः, कविः— काव्यप्रणयननिपुणः, बभूव= अभूत् ॥ ३ ॥

विमर्श— ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य ये तीनों ही द्विज कहे जाते हैं। मनु ने लिखा है—

ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यस्त्रयो वर्णा द्विजातयः। मनु १०।४ पूर्वार्द्ध

ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य—इन तीनों का उपनयन संस्कार होने से इन्हें द्विज कहा जाता है।

इस श्लोक में पूर्वार्द्ध के पदों में और अगाधसत्त्वः पद में बहुव्रीहि समास है। इनके विग्रहवाक्य संस्कृत टीका में लिखे जा चुके हैं।

१० | मृच्छकटिकम्

अपि च—

ऋग्वेदं सामवेदं गणितमथ कलां वैशिकीं हस्तिशिक्षां
ज्ञात्वा शर्वप्रसादाद् व्यपगततिमिरे चक्षुषी चोपलभ्य ।
राजानं वीक्ष्य पुत्रं परमसमुदयेनाश्वमेधेन चेष्ट्वा
लब्ध्वा चायुः शताब्दं दशदिनसहितं शूद्रकोऽग्निं प्रविष्टः ॥ ४ ॥


इस श्लोक में कवि की प्रशंसा करके उसके प्रति दर्शकों को आकृष्ट किया गया है अतः यहाँ से प्ररोचना प्रारम्भ होती है।

उन्मुखीकरणं तत्र प्रशंसातः प्रयोजनम् । दशरूपक ३।६

द्विरदेन्द्रगतिः, चकोरनेत्रः परिपूर्णेन्दुमुखः—इन तीनों में परस्पर-निरपेक्ष होते हुये लुप्तोपमा अलंकार होने से संसृष्टि है।

इसमें मालभारिणी छन्द है—

विषमे ससजा यदा गुरू चेत् समरा येन तु मालभारणीयम् । वृत्तरत्नाकर परिशिष्ट ॥ ३ ॥

**अन्वयः—**शूद्रकः, ऋग्वेदम्, सामवेदम्, गणितम्, अथ, वैशिकीम्, कलाम्, हस्तिशिक्षाम्, ज्ञात्वा, शर्वप्रसादात्, च, व्यपगततिमिरे, चक्षुषी उपलभ्य, पुत्रम्, राजानम्, वीक्ष्य, परमसमुदयेन, अश्वमेधेन, च, इष्ट्वा, दशदिनसहितम्, दशाब्दम्, आयुः, च, लब्ध्वा, अग्निम्, प्रविष्टः ॥४॥

**शब्दार्थः—**शूद्रकः=शूद्रकनामक राजा कवि ने, ऋग्वेदम्=[देवादिस्तुति-प्रतिपादक] ऋग्वेदसंहिता को, सामवेदम्=[गानपरक मन्त्रसमुदायरूप] सामवेद को, गणितम्=अङ्कविद्या और ज्योतिष को, अथ=और, वैशिकीम्=नाट्य शास्त्र को अथवा वैश्य-सम्बन्धिनी कृषिव्यापार रूप कला को, कलाम्=[शास्त्रों में वर्णित ६४] कलाओं को, हस्तिशिक्षाम्=हाथियों को नियन्त्रण में रखने की शिक्षा को, ज्ञात्वा=जानकर, च=और, शर्वप्रसादात्=भगवान् शङ्कर की कृपा से, व्यपगततिमिरे=[ अज्ञानरूपी ] अन्धकार से रहित, चक्षुषी=नेत्रों को, उपलभ्य=प्राप्त कर के, पुत्रम्=अपने पुत्र को, राजानम्=[राज-सिंहासन पर विराजमान] राजा रूप से, वीक्ष्य=देखकर, च=और, परमसमुदयेन=अत्यन्त उत्थान कराने वाले, अश्वमेधेन=अश्वमेध नामक यज्ञ से, इष्ट्वा=यजन करके अर्थात् अश्वमेध नामक यज्ञ को सम्पादित करके, च=और, दशदिनसहितम्=दश दिनों के सहित, शताब्दम्=एक सौ वर्षों की, आयुः=जीवनकाल, लब्ध्वा=प्राप्त करके, अग्निम्=अग्निहोत्र में, प्रविष्टः=लग गया, अथवा आग में प्रवेश कर गया ॥४॥

और भी—

प्रथमोऽङ्कः ११


अर्थ- [इस प्रकरण के रचयिता कवि] शूद्रक ऋग्वेद, सामवेद, गणितशास्त्र [अङ्कविद्या एवं ज्योतिष शास्त्र] चौंसठ कलाओं, नाट्यशास्त्र, और हस्तिसंचालन की शिक्षा को प्राप्त करके; भगवान् शङ्कर की कृपा से [ अज्ञानरूपी ] अन्धकार से रहित नेत्रों को [ ज्ञाननेत्रों को ] प्राप्त कर के और अपने पुत्र को राजा देखकर अर्थात् अपने पुत्र को अपने राजसिंहासन पर प्रतिष्ठित कर के; अत्यन्त उत्थान कराने वाले अश्वमेधनामक यज्ञ को सम्पन्न करके; और एक सौ वर्ष तथा दश दिनों की आयु प्राप्त करके अग्नि में प्रविष्ट हो गये [ अथवा अग्निहोत्रानुष्ठान में लग गये ] ॥४॥

टीका- ऋग्वेदम् = एतन्नाम्ना प्रसिद्धं प्राचीनतमं स्तुतिसंग्रहात्मकं वैदिकं ग्रन्थम्, अनेन देवतास्तुतिनैपुण्यमुक्तम्; सामवेदम् = गेयमन्त्रसमूहात्मकं तन्नाम्ना प्रसिद्धं ग्रन्थम्, एतेन मन्त्रगाननैपुण्यमुक्तम्; गणितम् = अङ्कविद्यां ज्योतिषशास्त्रञ्च; कलाम् = चतुःषष्टिसङ्ख्याकां कलाम्, तत्प्रतिपादकग्रन्थं वा, वैशिकीम् = विशः = वैश्यस्य इयमित्यर्थे ठकि, वैश्यसम्बन्धिनीं वाणिज्यरूपां कलामित्यर्थः, यद्वा "वेशो वेश्याजनसमाश्रयः" [अमरकोषः २।२।२] इति कोशात् वेशशब्दो वेश्यापरः, तत्र भवां विद्यमानां वा कलां वेश्याजनविषयिणीं कलामित्यर्थः, एतेन अस्मिन् विषयेपि नैपुण्यमुक्तम् । यद्वा—'नामग्रहणे नामैकदेशग्रहणं' मिति नियमेन वेशः = अग्निवेश इति नामा नृपः, तेन, कृतां कलां चतुःषष्टि कला-प्रतिपादकं ग्रन्थमित्यर्थः । यद्वा—वेशः = नेपथ्यग्रहणं तत्सम्बन्धिनीं कलाम् = नाट्यकलामित्यर्थः, हस्तिशिक्षाम् = गजपरिपालन-सञ्चालननैपुण्यम्; ज्ञात्वा = विदित्वा; शिवस्य = शङ्करस्य, प्रसादात् = कृपाबलात्, व्यपगततिमिरम् = व्यपगतम् = दूरीभूतं तिमिरम् = अज्ञानान्धकारम् याभ्यां तादृशे, चक्षुषी = नयने, च, उपलभ्य = सम्प्राप्य, एतेन सर्वपदार्थविषयकयथार्थ-ज्ञानवत्त्वं सूचितम्, भ्रमादीनां निरासश्च कृतः; पुत्रम् = आत्मजम्, राजानम् = राजपदे प्रतिष्ठितम्, वीक्ष्य = विलोक्य, एतेन वार्द्धक्यं पुत्रादिविषये चिन्तारहित्यं च सूचितम्; परमसमुदयेन = परमः = सर्वाधिकः, समुदयः = अभ्युन्नतिः यस्मात्, येन वा तादृशेन, यद्वा परमः = प्रकृष्टः, समुदयः = समरो यस्मिन् सस्तादृशेन, अश्वमेधेन = एतन्नाम्ना प्रसिद्धेन यागविशेषेण, इष्ट्वा = यागं कृत्वा; दशदिनसहितम् = दशदिनाधिकम्, शताबदम् = शतवर्षपरिमितम्, आयुः = जीवनकालम्, च, लब्ध्वा = प्राप्य, अग्निम् = अनलम्, प्रविष्टः = गतः, देहपरित्यागः कृत इति भावः । अत्रत्यो विशिष्ट-विचारोऽग्रे विमर्शे द्रष्टव्यः । स्रग्धरा वृत्तम् ॥ ४ ॥

विमर्श- प्रस्तुत श्लोक में 'वैशिकीम्' शब्द के अनेक अर्थ हैं और यह 'कलाम्' का विशेषण हैं—(१) विशः = वैश्यस्य इयम्-इस अर्थ में ठक् = इक प्रत्यय करने पर 'वाणिज्यरूपी कला को' यह अर्थ होता है। (२) वेश = वेश्याजनसमाश्रयः = वेश्यालय, इससे सम्बन्धित कला को । (३) वेशः = नेपथ्यग्रहण, इससे सम्बन्धित कला = 'नाट्य-

१२ | मृच्छकटिकम्


कला को' यह अर्थ है। (३) वेश:=अग्निवेशनामक राजा, 'नाम का जहाँ ग्रहण होता है, वहाँ उसके एक भाग का भी ग्रहण होता है' इस नियम से 'वैशिकीम्= राजा अग्निवेश द्वारा लिखित चौंसठ कलाओं के प्रतिपादक ग्रन्थ को' यह अर्थ होता है।

'वैशिकी' शब्द तद्धितान्त है अतः इसे 'कला' का विशेषण का मानना उचित है।

इस श्लोक में 'अग्निं प्रविष्ट;' इस भूतकालिक प्रयोग से अनेक शङ्काएँ उपस्थित हुई हैं। (१) लेखक स्वयम् अपनी मृत्यु का उल्लेख कैसे कर सकता है? (२) यदि यह अंश लेखक द्वारा नहीं लिखा गया है तो इसे प्रक्षिप्त मानने में क्या बाधा है? (३) मृत्यु रूप अमङ्गल का उल्लेख करना कहाँ तक उचित है?

इनके समाधानार्थ विद्वानों ने कुछ सुझाव रखे हैं—(१) ज्योतिष आदि के द्वारा अपनी पूर्ण आयु का ज्ञान होने पर स्वेच्छा से अग्नि में अपनी देह का परित्याग करना सम्भव है। प्रस्तुत श्लोक लेखक के पुत्र अथवा अन्य किसी विद्वान् ने लिखकर जोड़ दिया है। इसका समर्थन अग्रिम श्लोक में प्रयुक्त 'बभूव' पद भी करता है। (२) जिस प्रकार अन्य अनेक कवियों की कृतियाँ धनप्राप्ति के बाद आश्रयदाता राजा के नाम से प्रसिद्ध हुई हैं, सम्भव है उसी प्रकार यह भी किसी आश्रित कवि की कृति है जो राजा शूद्रक के नाम से प्रसिद्ध है। (३) प्रक्षिप्त अंश अथवा अन्य की कृति मान लेने पर अमंगल का उल्लेख उतना अनुचित नहीं रहता है क्योंकि शूद्रक के जीवन की पूर्ण सफलता का चित्रण इसमें किया गया है। इस सन्दर्भ में मेरा यह विनम्र परामर्श है कि यहाँ 'प्रविष्ट:' यह अशुद्ध पाठ मानकर इसके स्थान पर भविष्यत्कालिक लुट् लकार का प्रयोग 'प्रवेष्टा' यह मान लेना चाहिये। इससे स्वयं मरण का उल्लेख करना सम्भव है। ज्योतिष आदि के द्वारा अपनी आयु का ज्ञान हो जाने पर उस निश्चित क्षण में वह अपनी इच्छा से अग्नि में प्रवेश कर जायगा। इस प्रकार समस्त शंकाओं का समाधान हो जाता है। दूसरा सुझाव यह है कि यहाँ भूतत्व की अविवक्षा कर दी जाय। तीसरा समाधान है 'प्रविष्टो भविष्यति' यह अर्थ करने के लिये 'भविष्यति' पद का आक्षेप कर लिया जाय। 'सिद्धस्य गतिश्चिन्तनीया' के अनुसार तर्कसंगत समाधान आवश्यक है।

शर्व—ईश्वरः शर्व ईशानः शङ्करश्चन्द्रशेखरः। अमरकोश १।३०

वीक्ष्य=वि√ईक्ष्+ल्यप्। इष्ट्वा=√यज्+क्त्वा, 'य्' का सम्प्रसारण 'इ' और 'अ' का पूर्वरूप तथा ज् का ष् और त् का ष्टुत्व। अश्वमेधः--अश्वस्य मेधः=पशु-त्वेनोपालम्भनं यस्मिन् यागे सः—बहुव्रीहिसमास। स्रग्धरा छन्द है। इसका लक्षण—

म्रभ्नैर्यानां त्रयेण त्रिमुनियतियुता स्रग्धरा कीर्तितेयम् ॥४॥

प्रथमोऽङ्कः १३

अपि च—

समरव्यसनी, प्रमादशून्यः, ककुदो वेदविदां, तपोधनश्च । परवारणबाहुयुद्धलुब्धः क्षितिपालः किल शूद्रको बभूव ॥ ५ ॥

**अन्वयः—**शूद्रकः, समरव्यसनी, प्रमादशून्यः, वेदविदां, ककुदः, तपोधनः, परवारणबाहुयुद्धलुब्धः, च, क्षितिपालः, बभूव, किल ॥ ५ ॥

**शब्दार्थः—**शूद्रकः=[प्रस्तुत प्रकरण के रचयिता] शूद्रक नामक, समरव्यसनी=युद्ध करने के शौकीन=लड़ाकू स्वभाववाले, प्रमादशून्यः=असावधानी से रहित [ सदा सावधान रहने वाले ], वेदविदाम्=वेदों के ज्ञाताओं में, ककुदः=प्रधान=श्रेष्ठ, तपोधनः=तपस्वी, च=और, परवारणबाहुयुद्धलुब्धः=शत्रुओं के हाथियों की सूड़ों से लड़ने के लोभी, क्षितिपालः=पृथ्वी के पालनकर्ता राजा, बभूव=हुये, किल=ऐसी प्रसिद्धि है ॥ ५ ॥

और भी— अर्थ—[ मृच्छकटिक प्रकरण के रचयिता ] 'शूद्रक' युद्ध करने के स्वभाववाले, [ सदैव ] सावधान, वेद जानने वालों में श्रेष्ठ, तपस्यारूपी धनवाले [ महान् तपस्वी], शत्रुओं के हाथियों की सूड़ों के साथ युद्ध करने के लोभी, राजा हुये थे ॥५॥

**टीका—**शूद्रकः=एतन्नामकः प्रस्तुत-प्रकरणस्य रचयिता, समरव्यसनी=समरेषु=युद्धेषु व्यसनी=विशेषाभिरुचिः निरन्तरसमरसंलग्न इत्यर्थः, अनेन युद्धाभिलाषित्त्वं द्योत्यते; प्रमादशून्यः=प्रमादेन=अनवधानतया शून्यः=रहितः, एतेन कार्य-साधने दक्षत्वं प्रतीयते; वेदविदाम् = वैदिकसाहित्याभिज्ञानाम्, ककुदः=श्रेष्ठः; तपोधनः=तप एव धनं यस्य सः—तपोनिष्ठ इत्यर्थः; परवारणबाहुयुद्धलुब्धः=पराः=उत्कृष्टाः वारणाः=गजास्तैः सह बाहुयुद्धे = शुण्डयुद्धे, लुब्धः = अभिलाषी, यद्वा, परेषाम्=शत्रूणाम्, वारणानाम्=गजानाम्, बाहुयुद्धे लुब्धः:=अनुरागीत्यर्थः; यद्वा परेषाम्=शत्रूणाम्, वारणौ=निवारकौ=अवरोधिनौ यौ बाहू=भुजद्वयम्, ताभ्यां सह युद्धलुब्ध इत्यर्थः; क्षितिपालः=पृथ्वीपालको राजा, बभूव = जातः, किल=इति प्रसिद्धिः ॥ ५ ॥

**विमर्श—**इस श्लोक में राजा शूद्रक के स्वभाव, शक्ति, पराक्रम आदि का उल्लेख है। 'समरव्यसनी' इसमें तत्पुरुष समास करना ही उचित है। समरेषु व्यसनं यस्य सः यह बहुव्रीहि करने पर 'समरव्यसनः' यही उचित है क्योंकि बहुव्रीहि करने पर मत्वर्थीय प्रत्यय असाधु होता है। ककुदः—प्राधान्ये राजलिङ्गे च वृषाङ्गे ककुदोऽस्त्रियाम्।” (अमरकोश ३।३।६६।) इसलिये कहीं-कहीं 'ककुदं' यह भी पाठ है।

१४मृच्छकटिकम्

अस्याञ्च तत्कृतौ—

अवन्तिपुर्य्यां द्विजसार्थवाहो युवा दरिद्रः किल चारुदत्तः ।
गुणानुरक्ता गणिका च यस्य वसन्तशोभेव वसन्तसेना ॥ ६ ॥


जिस प्रकार चतुर्थ श्लोक में 'शूद्रकोऽग्नि प्रविष्टः यह भूतकालिक' प्रयोग विचारणीय है उसी प्रकार इस श्लोक में भी 'बभूव' पद चिन्तनीय है क्योंकि लेखक अपने लिये लिट् का प्रयोग नहीं कर सकता। अतः पूर्व श्लोक के साथ यहाँ तक का अंश प्रक्षिप्त मान लेना उचित प्रतीत होता है।

इसमें भी मालभारिणी छन्द है। लक्षण--विषमे स-स-जा यदा गुरु चेत् स-भ-रा येन तु मालभारिणीयम् ।

सार्थक विशेषणों का प्रयोग होने से इसमें 'परिकर' अलङ्कार है ॥ ५ ॥

**अन्वयः—**अवन्तिपुर्याम्, द्विजसार्थवाहः, दरिद्रः, युवा, चारुदत्तः, [ आसीत् ] च, यस्य, गुणानुरक्ता, वसन्तशोभा, इव, वसन्तसेना, [ आसीत् ] ॥ ६ ॥

**शब्दार्थ—**अवन्तिपुर्याम्=अवन्तिपुरी उज्जैन नगर में, द्विजसार्थवाहः=ब्राह्मण-समुदाय में श्रेष्ठ, अथवा पालक, अथवा व्यापारसंलग्न ब्राह्मण, दरिद्रः=निर्धन [ पहले धनी किन्तु अति उदार, दानी होने से बाद में दरिद्रता को प्राप्त ], युवा=यौवनसम्पन्न, तरुण, चारुदत्तः=नामक प्रसिद्ध व्यक्ति, [ हुआ था ऐसी ] किल=प्रसिद्धि है। च=और, यस्य=जिस [ चारुदत्त ] के, गुणानुरक्ता=गुणों के कारण अनुराग करने वाली, वसन्तशोभा=वसन्ताख्य ऋतुविशेष की सुन्दरता, इव=के समान, वसन्तसेना=इस नामवाली, गणिका=वेश्या, [ उसी उज्जयिनी में थी ] ॥ ६ ॥

और उस [ शूद्रक ] की [ मृच्छकटिक नामक ] इस कृति में—

**अर्थ—**उज्जैन नगर में ब्राह्मणश्रेष्ठ, अथवा व्यापारी ब्राह्मण [ जो पहले धनी था किन्तु दानी होने के कारण बाद में ] निर्धन, युवक 'चारुदत्त' [ रहा करता था ], और जिसके [ दया, दाक्षिण्य आदि ] गुणों के कारण प्रेम करने वाली, वसन्तऋतु की सुन्दरता के समान [सुन्दरतावाली] वसन्तसेना नामक गणिका [ भी वहीं रहा करती थी ] ॥ ६ ॥

**टीका—**साम्प्रतमेतत्प्रकरणस्य नायकं वर्णयति अवन्तिपुर्याम् अवन्तिपुरी-उज्जयिनीनगरी तस्याम्, द्विजसार्थवाहः=सार्थम्=समूहम्, वहति=नयतीति सार्थवाहः द्विजश्चासौ सार्थवाहश्च=ब्राह्मणश्रेष्ठः, यद्वा व्यापारलग्न-वणिक्-समूह-प्रधानः, यद्वा द्विजानाम्=ब्राह्मणादिद्विजातीनां सार्थम्=समूहम्, वहति=अन्नादि-प्रदानादिना पालयति, एतेन चारुदत्तस्य ब्राह्मणत्वं सिध्यति, युवा=पूर्णयौवनसम्पन्नः तरुणः, दरिद्रः=निर्धनः, पूर्वं यः धनी आसीत् किन्तु अतीवदानि-स्वभावेन सम्प्रति निर्धनतां

प्रथमोऽङ्कः १५


प्राप्तः, चारुदत्तः=एतन्नामा आसीदिति शेषः । यस्य=चारुदत्तस्य, च, गुणानुरक्ता= गुणैः=दयादाक्षिण्यादिभिः अनुरक्ता=अनुरागवती, दत्तचित्ता, वसन्तशोभा=वसन्त- नामकर्त्तु-विशेषस्य शोभा=श्रीः, कान्तिः, इव=तुल्या, वसन्तसेना=एतन्नामिका, गणिका=वेश्या, आसीत्; यद्वा वसन्तशोभेव वसन्तसेना गणिका यस्य चारुदत्तस्य गुणानुरक्ता जाता । तस्य चारुदत्तस्य दरिद्रत्वेऽपि तस्याद्भुतगुणैरनुरक्ता वसन्त- सेनानाम्रिका गणिका तं प्रति अनुरागवती जातेति भावः ॥ ६ ॥

विमर्श—अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका आदि के अन्तर्गत सात पवित्र नगरियों में अवन्ती भी एक थी। इसी का नाम उज्जायिनी था । यह शिप्रा नदी के तट पर स्थित है। इस समय जो उज्जैन नगर है वह प्राचीन अवन्ती नगरी के स्थान से लगभग एक मील दूर है।

द्विजसार्थवाह—शब्द के अर्थ को लेकर विद्वानों में मतभेद है। 'सार्थ' शब्द वणिक्-समुदाय और समुदायमात्र दोनों अर्थों का वाचक है। इस आधार पर इन अर्थों की कल्पना की जाती है—(१) सार्थवाह=व्यापारी, द्विज=ब्राह्मण व्यापारी, द्विजश्चासौ सार्थवाहश्च । (२) द्विजानाम्=ब्राह्मणानां सार्थम्=समूहम् वहति=अन्नदानादिना पालयति इति द्विजसार्थवाहः=ब्राह्मणपालनकर्ता । अनेक व्याख्याकारों ने चारुदत्त को व्यापारी ब्राह्मण माना है। परन्तु प्रस्तुत प्रकरण में उसके चरित्र की उदारता प्रदर्शित की गई है वह व्यापारी चारुदत्त से सम्भव नहीं है। अतः 'द्विजसार्थवाह' का अर्थ ब्राह्मणसमुदाय का नेता=द्विजश्रेष्ठ यही मानना उचित है। यदि द्विज का अर्थ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—ये तीनों मान लिये जाँय तो इनके समुदाय का पालन अथवा नेतृत्व करने वाला—यह अर्थ भी सम्भव है।

वसन्तसेना की उपमा वसन्त ऋतु की शोभा से करके कवि ने पुष्पों के समान प्रियता और कमनीयता वसन्तसेना की बताई है।

'गुणानुरक्ता' यह पद बहुत महत्त्वपूर्ण है। चारुदत्त यद्यपि अत्यन्त निर्धन हो चुका है तथापि उसमें कुछ अतुलनीय गुण हैं जिनके कारण वसन्तसेना वेश्या होते हुये भी चारुदत्त से प्रेम करने लगती है। इस कथन से वेश्यासामान्य की अर्थ-लोलुपता को छोड़कर गुणप्रियता का प्रतिपादन करना वसन्तसेना के चरित्र की उत्कृष्टता है। वह चारुदत्त के गुणों और यौवन से प्रेम करती है। उसकी निर्धनता प्रेम का बाधक नहीं है।

सार्थो वणिक्समूहे स्यादपि संघातमात्रके । मेदिनी वारस्त्री गणिका वेश्या रूपाजीवाथ सा जनैः । अमरकोश २।६।१६ वैदेहकः सार्थवाहो नैगमो वाणिजो वणिक ॥ अमरकोश २।६ ७८ 'दत्ता सेनान्तनामानि वेश्यानां कल्पयेत् सुधीः ॥

इस वचन के अनुसार वसन्तसेना नाम उचित है।

१६मृच्छकटिकम्

तयोरिदं सत्सुरतोत्सवाश्रयं, नयप्रचारं, व्यवहारदुष्टताम्।
खलस्वभावं, भवितव्यतां तथा चकार सर्वं किल शूद्रको नृपः ॥ ७ ॥

इसमें 'इव' शब्द का प्रयोग होने के कारण श्रौती उपमा है। उपेन्द्रवज्रा छन्द है—
'उपेन्द्रवज्रा प्रथमे लघौ सा।
सा=इन्द्रवज्रा। स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः ॥ ६ ॥

**अन्वयः—**तयोः, सत्सुरतोत्सवाश्रयम्, व्यवहारदुष्टताम्, खलस्वभावम्, तथा, भवितव्यताम्, इदम्, सर्वम्, [ अस्यां कृतौ ] शूद्रकः, नृपः, चकार, किल ॥ ७ ॥

**शब्दार्थ—**तयोः=[ वसन्तसेना एवं चारुदत्त ] उन दोनों के, सत्सुरतोत्सवाश्रयम्=उत्कृष्ट कामलीलारूपी उत्सव पर आश्रित [ =आधृत ], नयप्रचारम्=नीति के प्रचार, व्यवहारदुष्टताम्=व्यवहार=मुकदमें के निर्णय की सदोषता, खलस्वभावम्=[ शकार आदि ] दुष्टों के स्वभाव, तथा=और, भवितव्यता=होनी, इदम्=उपर्युक्त यह, सर्वम्=सभी कुछ, शूद्रकः=शूद्रकनामक, नृपः= राजा ने [ अस्यां कृतौ=अपनी इस मृच्छकटिक कृति में ] चकार=किया है, किल=ऐसी प्रसिद्धि है ॥ ७ ॥

**अर्थ—**उन [ वसन्तसेना एवं चारुदत्त ] दोनों की उत्कृष्ट कामलीला पर आश्रित, नीति की गति, मुकदमें के निर्णय की सदोषता, दुष्टों का स्वभाव और होनी [ भावी ] यह उपर्युक्त सभी कुछ [ वर्णन ] राजा शूद्रक ने [ अपनी इस मृच्छकटिक कृति में ] किया है। [ इस श्लोक का दूसरा अर्थ आगे 'विमर्श' में देखें। ] ॥ ७ ॥

**टीका—**वर्णनीयविषयान् संक्षेपेणाह-तयोः=चारुदत्त-वसन्तसेनयोः, तयोः सम्बद्धमित्यर्थः, सत्सुरतोत्सवाश्रयम्=सत्=श्लाघनीयम् सुरतम्=कामलीला एव उत्सवः=महः, स आश्रयः=वर्णनीयतया उद्देश्यः यस्य सः तम् प्रशस्तसम्भोगलीलाविषयिकामित्यर्थः, नयप्रचारम्=नीतेः गतिम् [ अत्रत्यं तत्त्वं विमर्शे द्रष्टव्यम् ] व्यवहारदुष्टताम्=विवादनिर्णयस्य सदोषताम्, वसन्तसेनायाः मृत्युविषयेऽनपराधिनोऽपि चारुदत्तस्य मृत्युदण्डदानात् तस्य दोषयुक्ततामिति भावः, खलस्वभावम्=खलानाम्=शकारादीनां प्रकृतिम्, तथा, भवितव्यताम्=अपरिहार्याया नियतेः प्रभावम्, इदम्=पूर्वोक्तम्, सर्वम्=सकलम्, शूद्रकः=एतन्नामकः, नृपः=राजा, [ अस्यां कृतौ=मृच्छकटिके ] चकार=कृतवान्, वर्णितवानित्यर्थः ॥ ७ ॥

**विमर्श—**इस श्लोक का अर्थ विवादग्रस्त है। इसका अर्थ करते समय पूर्व पंक्ति 'अस्यां च तत्कृतौ' पर ध्यान देना बहुत आवश्यक है। अतः श्लोक ६ और ७ को मिलाकर अर्थ करना उचित है। इस प्रकार—"अस्यां च तत्कृतौ इदं सर्वं चकार" यह निराकाङ्क्ष वाक्यार्थज्ञान होता है।

प्रथमोऽङ्कः १७


इस श्लोक में 'सत्सुरतोत्सवाश्रयम्' बहुव्रीहि समासयुक्त पद है। इसे कुछ व्याख्याकारों ने 'प्रकरण' का विशेषण बनाकर यह अर्थ किया है –

'यह प्रकरण उन दोनों के उत्कृष्ट सुरत रूपी उत्सव को आश्रय मानकर [ बनाया गया ] है।'

यहाँ तक एक वाक्य बनाने के लिये 'अस्ति' का आक्षेप किया गया है। परन्तु यह तर्कसंगत नहीं है। 'सत्सुरतोत्सवाश्रयम्' इसे 'नयप्रचारम्' का विशेषण मानना चाहिये और नयेन=न्यायपूर्वकम् प्रचारः=प्रचरणम्, जीवनयापनम्, यह अर्थ करना चाहिये। चारुदत्त और वसन्तसेना न्याय के साथ जीना चाहते थे परन्तु शकार आदि दुष्टों ने उसमें बाधा पहुँचाने की पूरी पूरी चेष्टा की, इस तथ्य का प्रतिपादन यह मृच्छकटिक करता है न कि राजनीति के किसी प्रमुख विषय का। यहाँ नय का अर्थ आचार-संहिता करना चाहिये। व्यवहार=मुकदमा की दुष्टता=सदोषता का प्रतिपादन इसमें है। चारुदत्त ने वास्तव में हत्या नहीं की है किन्तु न्यायकर्ताओं के सामने मृत्युदण्ड देने के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं था क्योंकि साक्ष्यों से यही सिद्ध हो रहा था।

खलस्वभाव=शकार आदि दुष्ट पात्रों के स्वभाव का भी प्रतिपादन है।

भवितव्यता--होनी, भाग्य। पूरे प्रकरण मे भवितव्यता ने अनेक चमत्कार प्रस्तुत किये हैं। निर्धन चारुदत्त पर वसन्तसेना का अडिग प्रेम होना, शकार द्वारा वसन्तसेना का वध कर दिये जाने पर भी उसकी मृत्यु न होना, निरपराध चारुदत्त को मृत्युदण्ड दिया जाना, गोपालदारक आर्यक के राजा बनने का सिद्धादेश होना और अन्त तक राजा बन जाना, मृत्यु के अन्तिम क्षणों में वसन्तसेना का चारुदत्त के पास आना और उसे बचा लेना, पालक राजा का वध तथा आर्यक का राजा बनना--ये अनेक घटनायें भवितव्यता की प्रमाण हैं।

तृतीय श्लोक के सन्दर्भ-वाक्य--"एतत्कविः किल" से लेकर सातवें श्लोक तक का पाठ प्रक्षिप्त मानना चाहिये, ऐसा कुछ विद्वानों का कथन है। अतः सूत्रधार के पाठ के बाद "परिक्रम्य, अवलोक्य च--" यही मूल पाठ है, ऐसा कहा जा सकता है।

सत्सुरतोत्सवाश्रयम्--सत्=उत्कृष्ट जो सुरतरूपी उत्सव, वह है आश्रय=प्रतिपाद्य विषय जिसका यहाँ बहुव्रीहि समास है। और नयप्रचारम् का विशेषण है नयेन प्रचारम्=आचारसंहितानुसारं जीवनयापनम् यह अर्थ ही उचित है। प्र + √ चर् + घञ् । भवितव्यता = भू + तव्यत् + तल् + टाप् ।

इसमें वंशस्थ छन्द है। लक्षण--वदन्ति वंशस्थविलं जतौ जरौ ॥ ७ ॥

२ मृ०

१८ मृच्छकटिकम्

[ परिक्रम्यावलोक्य च ] अये ! शून्येयमस्मत्सङ्गीतशाला ! क्व नु गताः कुशीलवाः भविष्यन्ति ? [ विचिन्त्य ] आं ज्ञातम् ।

शून्यमपुत्रस्य गृहं, चिरशून्यं नास्ति यस्य सन्मित्रम् ।
मूर्खस्य दिशः शून्याः, सर्वं शून्यं दरिद्रस्य ॥ ८ ॥


शब्दार्थपरिक्रम्य=[ रंगमंच पर ] घूमकर, =और, अवलोक्य=देखकर, अये=अरे, [ विषाद का सूचक अव्यय ], इयम्=यह, [ सामने लक्ष्यमाण ], अस्मत्सङ्गीतशाला=हम लोगों की संगीतशाला [ संगीत=नृत्य, गीत, वाद्य का अभ्यास करने का स्थान ] शून्या=खाली [ है ]; कुशीलवाः=अभिनेता=नट लोग, क्व=कहाँ, नु=शङ्कासूचक अव्यय, गताः=गये, भविष्यन्ति=होंगे, विचिन्त्य=सोंचकर, आम्=अच्छा [ किसी बात के स्मरण में प्रयुक्त अव्यय ] ज्ञातम्=समझ गया [ याद आ गया ] ।

अर्थ—[घूमकर और चारों ओर देखकर] अरे ! हमारी संगीतशाला [संगीत-अभ्यासगृह] तो खाली है, नट [ आदि अभिनेता ] लोग [ इस समय ] कहाँ गये होंगे ? [ सोंचकर ] अच्छा, याद आ गया ।

टीकापरिक्रम्य=रङ्गमञ्चे परिक्रमणं कृत्वा, =तथा, अवलोक्य=परितो विलोक्य, अये=विषादसूचकमव्ययम्, इयम्=सम्मुखे लक्ष्यमाणा, अस्मत्सङ्गीतशाला=‘गीतं नृत्यं च वाद्यञ्च त्रयं सङ्गीतमुच्यते’ इति लक्षणलक्षितस्य संगीतस्य अभ्यासार्थं शाला=गृहम्, शून्या=नटादिरहिता वर्तत इति शेषः; कुशीलवाः=नटादयः, क्व=कुत्र, नु=शङ्कासूचकमव्ययम्, गताः=प्रयाताः, भविष्यन्ति; आम्=स्मरणार्थकमव्ययम्, ज्ञातम्=पूर्वं विस्मृतं साम्प्रतं स्मृतमित्यर्थः ।

विमर्श—‘अये’ यह पद यहाँ विषाद का सूचक है—‘अये क्रोधे विषादे च’ [ मेदिनी कोष ] । ‘नु’=शङ्कासूचक अव्यय है, अथवा पूछने के अर्थ में अव्यय है—‘नु पृच्छायां विकल्पे च’ अमरकोष ३।३।२५७। सूत्रधार दर्शकों से पूछने का अभिनय करता है, इसे ‘नु’ शब्द से सूचित कराया है । आम्=स्मरण अथवा स्वीकृति=निश्चय का सूचक है—‘आं स्मृतौ चावधारणे” विश्वकोष ।

जैसा कि पहले लिखा जा चुका है कि प्रारम्भिक वाक्यों के बाद जो श्लोक हैं वे प्रक्षिप्त प्रतीत होते हैं । यहाँ से ही वास्तविक पाठ प्रारम्भ होता है । क्योंकि सूत्रधार इतनी देर तक स्वयं बोलता रहे और नान्दीपाठ बन्द करने को कहे, यह तर्कसंगत नहीं लगता है ।

अन्वयः—अपुत्रस्य, गृहम्, शून्यम्, यस्य, सन्मित्रम्, न, अस्ति, [ तस्य ], चिरशून्यम्, [ अस्ति ], मूर्खस्य, दिशः, शून्याः, [ सन्ति ], दरिद्रस्य, सर्वम्, शून्यम् [ भवति ] ॥ ८ ॥

प्रथमोऽङ्कः १६


**शब्दार्थ—**अपुत्रस्य = पुत्रहीन [व्यक्ति] का, गृहम् = घर, शून्यम् = सूना [होता है], यस्य = जिस [व्यक्ति] का, सन्मित्रम् = अच्छा मित्र, न = नहीं, अस्ति = होता है, [तस्य = उसका] चिरशून्यम् = चिरकाल अभिमत कार्य से रहित [होता है], मूर्खस्य = मूर्ख, [व्यक्ति] की [समस्त] दिशः = दिशायें [अर्थात् सभी ओर], शून्याः = सूनी [सहारारहित], [हैं], दरिद्रस्य = निर्धन [व्यक्ति] का, सर्वम् = सभी कुछ, शून्यम् = सूना, [होता है] ॥ ८ ॥

**अर्थ—**पुत्रहीन [सन्तानहीन] का घर सूना [होता है]; जिसका [कोई भी] अच्छा मित्र नहीं होता है, उसका चिरकाल शून्य रहता है; मूर्ख की [सभी] दिशायें शून्य रहती हैं [और] दरिद्र का सब [संसार] सूना = खाली होता है ॥ ८ ॥ [चारुदत्त की निर्धनता को सूचित करने के लिये सूत्रधार यहाँ से उपक्रम बाँधता है।]

**टीका—**अपुत्रस्य = अविद्यमानपुत्रस्य, पुत्रहीनस्य, [पुत्रस्य पुत्र्याश्च द्वन्द्वे पुँल्लिङ्गैकशेषे सति पुत्रशब्द एवोभयार्थवाचकः, तेन पुत्ररहितस्य पुत्रीरहितस्य चेत्यर्थ इति केचित् ।] गृहम् = आवासः, भवनम्, शून्यम् = रिक्तम् भवति, पुत्राभावे गृहस्थसर्ववस्तूनां वैयर्थ्यादिति भावः, यस्य = पुरुषस्य, सन्मित्रम् = शोभनं सुहृद्, न = नैव, अस्ति = वर्तते, तस्य = पुरुषस्य, चिरशून्यम् = चिरम् = दीर्घः कालः, शून्यम् = अभिमतकार्यरहितम्, सन्मित्राभावे कदापि कार्यसाधनाभावात् यावज्जीवं सुखं न लभ्यते इति भावः; मूर्खस्य = मूढस्य, बुद्धिरहितस्य, दिशः = सर्वाः ककुभः, शून्याः = सहायकजनरहिताः भवन्तीति शेषः; दरिद्रस्य = निर्धनस्य पुरुषस्य सर्वम् = सकलं जगत्, शून्यम् = रिक्तम्, भवतीति शेषः । निर्धनस्य पुरुषस्य कदापि कुत्रापि कोऽपि सहायको न भवति तेन विपुलसंख्याकजनमपि जगत् तत्कृते अभावमयमेव भवतीति भावः ॥ ८ ॥

**विमर्श—**समस्त वैभव ऐश्वर्य रहने पर भी यदि गृह-प्राङ्गण में शिशुलीला करने वाला पुत्र नहीं है तो वह घर वास्तव में सूना ही होता है। जिस व्यक्ति का कोई भी अच्छा मित्र नहीं होता है, सहायक नहीं होता है अतः सर्वत्र उसके कार्यों में बाधा पड़ती है, कोई भी अभिमत कार्य नहीं हो पाता है। संसार में सबकुछ रहता है परन्तु मूर्ख उसका उपभोग नहीं करपाता है अतः उसके लिये सभी ओर रिक्तता ही रहती है। इन सबकी अपेक्षा निर्धन की स्थिति और दयनीय होती है क्योंकि सारा संसार ही उसके लिये नहीं के समान है। कोई भी उसका साथ नहीं देता है, न बात सुनता है; न करता है, और न कुछ देता है। अतः दरिद्र होना महा अभिशाप है।

यहाँ दरिद्रता की निन्दा करते हुये आगे निरूपित होनेवाली चारुदत्त की की दरिद्रता का संकेत किया गया है।

२०मृच्छकटिकम्

कृतञ्च सङ्गीतकं मया। अनेन चिरसङ्गीतोपासनेन ग्रीष्मसमये प्रचण्डदिनकरकिरणोच्छुष्कपुष्करबीजमिव प्रचलिततारके क्षुधा ममाक्षिणी खटखटायेते, तत् यावत् गृहिणीमाहूय पृच्छामि-अस्ति किञ्चित् प्रातराशो न वेति। एषोऽस्मि भोः ! कार्य्यवशात् प्रयोगवशाच्च प्राकृतभाषी संवृत्तः-


अपुत्रस्य--अविद्यमान्र: पुत्रो यस्यः सः, बहुव्रीहि है। चिरशून्यम्=चिरंशून्यम्-यह कर्मधारय हैं।

इसमें आर्या छन्द है। लक्षण--

यस्याः पादे प्रथमे द्वादश मात्रास्तथा तृतीयेपि।
अष्टादशद्वितीये चतुर्थके पञ्चदश साऽऽर्या ॥ ८ ॥

शब्दार्थ-मया=मैंने [सूत्रधारने] सङ्गीतकम्=गाना, बजाना और नाचना; कृतम्=सम्पादित कर लिया, अनेन=इस, चिरसङ्गीतोपासनेन=अधिक देर तक सङ्गीत के उपासन-अभ्यास से, ग्रीष्मसमये=गर्मी के दिनों में, प्रचण्ड-दिनकर-किरणोच्छुष्कपुष्कर-बीजम् इव=अत्यधिक तपते हुये सूर्य की किरणों से सूखे हुये कमल के बीज के समान, प्रचलिततारके=चञ्चल पुतलियों वाली, मम=मेरी [सूत्रधार की], अक्षिणी=आंखें, क्षुधा=भूख से, खटखटायेते-खट खट [शब्द] कर रहीं हैं, तत्=इसलिये, यावत्=वाक्यालङ्कार में प्रयुक्त अव्यय, गृहिणीम्=घर की मालकिन नटी को, आहूय=बुलाकर, पृच्छामि=पूछता हूँ; किञ्चित्-प्रातराशः=कुछ भी सबेरे का जलपान, अस्ति=है, न वा=अथवा नहीं। भोः=अरे भाइयो !; एषः=यह, [ अहम्=मैं ], कार्य्यवशात्=प्रयोजनवश, च=और प्रयोगवशात्=नाट्यप्रयोग के कारण, प्राकृतभाषी=प्राकृत भाषा बोलने वाला, संवृत्तः=बन गया, अस्मि=हूँ।

अर्थ-मैंने संगीतक (गीत, नृत्य और वाद्य का) कार्य पूरा कर लिया है। अधिक देर तक इस संगीत का अभ्यास करने के कारण भूख लगने से चंचल पुतलियों वाली मेरी आंखें उसी प्रकार खट खट आवाज कर रहीं हैं जिस प्रकार गर्मी के दिनों में प्रचण्ड सूर्य की किरणों से सूखे हुये कमल के बीज [खट खट] आवाज करते हैं। तो गृहिणी (पत्नी नटी) को बुलाकर पूछता हूँ कि-कुछ जलपान है अथवा नहीं। सज्जनों ! अब मैं प्रयोजनवश और [नाटकीय] प्रयोग-वश प्राकृत भाषा बोलने वाला बन गया हूँ-

टीका-मया=सूत्रधारेण, सङ्गीतकम्=गीतं नृत्यञ्च वाद्यञ्च त्रयं सङ्गीत-मुच्यते-इति लक्षणलक्षितम्, कृतम्=सम्पादितम्, अभ्यस्तं वां। चिरसङ्गीतोपासनेन-चिरम्=दीर्घकालपर्यन्तम्, सङ्गीतस्य=गीतादित्रयस्य, उपासनेन=अभ्यासेन, ग्रीष्म-समये=ग्रीष्मतौ, प्रचण्ड-दिनकर-किरणोच्छुष्क-पुष्कर-बीजम्=प्रचण्डः=प्रतप्तः चासौ.

प्रथमोऽङ्कः २१

दिनकरः=मध्याह्नसूर्यः, तस्य किरणैः=रश्मिभिः, उच्छुष्कम्=सर्वथोपजातशोषम्, पुष्करस्य=कमलस्य, बीजम्=कमलदलमध्ये विद्यमानं बीजम्, इव=तुल्यम्, प्रचलिततारके=चञ्चलतामुपगते तारके=कनीनिके ययोः ते, मम=सूत्रधारस्य, अक्षिणी=नेत्रे, क्षुधा=बुभुक्षया, खटखटायेते=खटत् खटत् इति शब्दं कुरुतः; तत् यावत्=तस्मात् कारणात्, गृहिणीम्=भार्याम्, आहूय=सम्बोध्या, पृच्छामि=पृच्छां करोमि, प्रातराशः=कल्यभोजनम्, प्रातः अश्यते=भुज्यते इति प्रातराशः; कार्यवशात्=कार्यम्=बोधनीयायाः स्त्रियो झटिति ज्ञानम्, तस्य वशात्=कारणात्, स्त्रीत्वेन भार्या प्राकृत-भाषां सरलतया शीघ्रमेव ज्ञास्यतीति भावः; प्रयोगवशात्=नाट्यप्रयोगस्य नियमात्, प्राकृतभाषा-भाषी=प्राकृतभाषा-प्रयोक्ता, संवृत्तः=सञ्जातः, अत्र च “स्त्रीषु ना प्राकृतं वदेत् ।” “पुरुषाः संस्कृतजल्पाः प्राकृतगुम्फोऽपि भवति सुकुमारः ।” “कार्यत-श्चोत्तमादीनां कार्यो भाषाव्यतिक्रमः ।” इत्यादिवचनानुरोधेन स सूत्रधारः नटीं प्रति प्राकृतभाषाप्रयोगमेवोचितं मनुते इति बोध्यम् ।

विमर्श—प्रचलिततारके-जिस प्रकार भीषण ग्रीष्मकाल में कमलपुष्प सूख जाते हैं और उनके भीतर के बीज हिलने पर आवाज करने लगते हैं उसी प्रकार कमलतुल्य नेत्रों में रहने वाली पुतलियाँ भी भूखके कारण चलते रहने से शब्द कर रहीं हैं । खट-खटायेते खटत् इस प्रकार के अव्यक्त शब्दानुकरण के लिये इसका प्रयोग है । खटत् भवति—इस विग्रह में “अव्यक्तानुकरणाद् द्व्यजवरार्धादनितौ डाच्” [पा. सू. ५।४।५७ ] सूत्र से डाच्=आ प्रत्यय होता है और 'डाचि विवक्षिते बहुलं द्वे भवतः' इस नियम से द्वित्व होता है -खटत् + खटत् + आ, इस अवस्था में 'नित्यमाम्रेडिते डाचीति वक्तव्यम्' नियम से तकार और खकार का पररूप होने पर 'खटखटत् + आ बनता है डित् प्रत्यय परे होने से टि=अत् का लोप होने पर 'खटखटा' यह निष्पन्न होता है । “लोहिताडाग्भ्यः क्यष्” [ पा. सू. ३।१।१३ ] इस नियम से क्यष्=य प्रत्यय होने पर – “वा क्यषः” [ पा. सू. १।३।६० ] से वैकल्पिक आत्मनेपद होकर प्रथम पुरुष द्विवचन का रूप सिद्ध होता है । पुतलियों में ऐसी ध्वनि नहीं होती है, अतः यह क्रियापद उचित नहीं है, इसकी अपेक्षा और कोई अनुकरण-वाची शब्द रखना चाहिये था । ‘बीजम् इव अक्षिणी’ इस प्रयोग में उपमान एकवचन और उपमेय द्विवचन का प्रयोग भी अच्छा नहीं है । पृथ्वीधर ने खटखटायेते इस पर यह लिखा है—“संगीतकेन चक्षुषी खटखटायेते इत्यसम्बद्ध-प्रलापेन भाविनः शकारासम्बद्धभाषणस्य सूचनम् ।” अतः इस पद पर विशेष आलोचना अनावश्यक है ।

प्रातराशः-—प्रातः काले अश्यते इति प्रातराशः-कल्यभोजनम् ।

**कार्यवशात्—**यहाँ अपनी भार्या के साथ वार्ता करना कार्य है न कि नाटक का कार्य । क्योंकि ‘स्त्रीषु ना प्राकृतं वदेत्’ पुरुष पात्र को स्त्रियों से प्राकृत भाषा