भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः


द्विरदेन्द्रगतिश्चकोरनेत्रः परिपूर्णेन्दुमुखः सुविग्रहश्च।
द्विजमुख्यतमः कविर्बभूव प्रथितः शूद्रक इत्यगाधसत्त्वः ॥ ३ ॥

इस प्रकरण का नायक चारुदत्त ब्राह्मण धीरप्रशान्त है। वसन्तसेना गणिका नायिका है और धर्मपत्नी धूता भी नायिका है। शकार आदि धूर्त पात्र हैं। शृङ्गार रस प्रधान है।

अन्वयः— द्विरदेन्द्रगतिः, चकोरनेत्रः, परिपूर्णेन्दुमुखः, सुविग्रहः, द्विजमुख्यतमः, अगाधसत्त्वः, च, शूद्रक, इति, प्रथितः, कविः, बभूव ॥ ३ ॥

शब्दार्थ— द्विरदेन्द्रगतिः= गजराज की चाल के समान मस्त चाल वाले, चकोरनेत्रः= चकोर नामक पक्षी की आखों के समान [सुन्दर] आखों वाले, परिपूर्णेन्दुमुखः= परिपूर्ण चन्द्र=पौर्णमासी के चन्द्रमा के तुल्य मुखवाले, सुविग्रहः= सुन्दर शरीर वाले, अगाधसत्त्वः= असीमित बलवाले, च= और, द्विजमुख्यतमः= क्षत्रियों में श्रेष्ठ, शूद्रकः= शूद्रक, इति= इस नाम से, प्रथितः= प्रसिद्ध, कविः= काव्यनिर्माता, बभूव= हुये ॥३॥

अर्थ— गजराज [ की मस्त चाल ] के समान [ मस्त ] चालवाले, चकोर नामक पक्षी [ की आखों ] के तुल्य आखोंवाले, पौर्णमासी के [ समस्त कला परिपूर्ण ] चन्द्रमा के समान सुन्दर मुखवाले, और सुन्दर [ सुगठित ] शरीरवाले, असीमित बलवाले, क्षत्रियों में श्रेष्ठ 'शूद्रक' इस नाम से प्रसिद्ध कवि हुये ॥ ३ ॥

टीका— द्विरदेन्द्रगतिः= द्वौ रदौ=दन्तौ [ बाह्यदृश्यमानौ ] यस्य सः, द्विरदः= गजः, द्विरदेषु इन्द्रः=अधिपतिः, तस्य गतिः इव गतिर्यस्य स; गजपतिरिव मन्दगतिमानित्यर्थः। चकोरनेत्रः= चकोराख्यस्य पक्षिणो नेत्रे इव नेत्रे यस्य सः; चकोरसदृशसुन्दरनयन इत्यर्थः। परिपूर्णेन्दुमुखः= परिपूर्णः=सकलकलायुतः, इन्दुः=चन्द्रः तस्येव सुन्दरं मुखम्=वदनं यस्य सः; पौर्णमास्याश्चन्द्रतुल्यसुन्दरवदन इत्यर्थः। सुविग्रहः— सुष्ठु=शोभनं विग्रहः=शरीरं यस्य सः; सुन्दरदेह इत्यर्थः। अगाधसत्त्वः— अगाधम्=असीमितं सत्त्वम्=बलं यस्य सः; असीमितबलशालीत्यर्थः। द्विजमुख्यतमः— द्विजेषु=क्षत्रियेषु, मुख्यतमः=श्रेष्ठः, शूद्रकः= एतन्नामकः, इति= अनेन रूपेण, प्रथितः= विख्यातः, कविः— काव्यप्रणयननिपुणः, बभूव= अभूत् ॥ ३ ॥

विमर्श— ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य ये तीनों ही द्विज कहे जाते हैं। मनु ने लिखा है—

ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यस्त्रयो वर्णा द्विजातयः। मनु १०।४ पूर्वार्द्ध

ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं वैश्य—इन तीनों का उपनयन संस्कार होने से इन्हें द्विज कहा जाता है।

इस श्लोक में पूर्वार्द्ध के पदों में और अगाधसत्त्वः पद में बहुव्रीहि समास है। इनके विग्रहवाक्य संस्कृत टीका में लिखे जा चुके हैं।