भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 99

१० | मृच्छकटिकम्

अपि च—

ऋग्वेदं सामवेदं गणितमथ कलां वैशिकीं हस्तिशिक्षां
ज्ञात्वा शर्वप्रसादाद् व्यपगततिमिरे चक्षुषी चोपलभ्य ।
राजानं वीक्ष्य पुत्रं परमसमुदयेनाश्वमेधेन चेष्ट्वा
लब्ध्वा चायुः शताब्दं दशदिनसहितं शूद्रकोऽग्निं प्रविष्टः ॥ ४ ॥


इस श्लोक में कवि की प्रशंसा करके उसके प्रति दर्शकों को आकृष्ट किया गया है अतः यहाँ से प्ररोचना प्रारम्भ होती है।

उन्मुखीकरणं तत्र प्रशंसातः प्रयोजनम् । दशरूपक ३।६

द्विरदेन्द्रगतिः, चकोरनेत्रः परिपूर्णेन्दुमुखः—इन तीनों में परस्पर-निरपेक्ष होते हुये लुप्तोपमा अलंकार होने से संसृष्टि है।

इसमें मालभारिणी छन्द है—

विषमे ससजा यदा गुरू चेत् समरा येन तु मालभारणीयम् । वृत्तरत्नाकर परिशिष्ट ॥ ३ ॥

**अन्वयः—**शूद्रकः, ऋग्वेदम्, सामवेदम्, गणितम्, अथ, वैशिकीम्, कलाम्, हस्तिशिक्षाम्, ज्ञात्वा, शर्वप्रसादात्, च, व्यपगततिमिरे, चक्षुषी उपलभ्य, पुत्रम्, राजानम्, वीक्ष्य, परमसमुदयेन, अश्वमेधेन, च, इष्ट्वा, दशदिनसहितम्, दशाब्दम्, आयुः, च, लब्ध्वा, अग्निम्, प्रविष्टः ॥४॥

**शब्दार्थः—**शूद्रकः=शूद्रकनामक राजा कवि ने, ऋग्वेदम्=[देवादिस्तुति-प्रतिपादक] ऋग्वेदसंहिता को, सामवेदम्=[गानपरक मन्त्रसमुदायरूप] सामवेद को, गणितम्=अङ्कविद्या और ज्योतिष को, अथ=और, वैशिकीम्=नाट्य शास्त्र को अथवा वैश्य-सम्बन्धिनी कृषिव्यापार रूप कला को, कलाम्=[शास्त्रों में वर्णित ६४] कलाओं को, हस्तिशिक्षाम्=हाथियों को नियन्त्रण में रखने की शिक्षा को, ज्ञात्वा=जानकर, च=और, शर्वप्रसादात्=भगवान् शङ्कर की कृपा से, व्यपगततिमिरे=[ अज्ञानरूपी ] अन्धकार से रहित, चक्षुषी=नेत्रों को, उपलभ्य=प्राप्त कर के, पुत्रम्=अपने पुत्र को, राजानम्=[राज-सिंहासन पर विराजमान] राजा रूप से, वीक्ष्य=देखकर, च=और, परमसमुदयेन=अत्यन्त उत्थान कराने वाले, अश्वमेधेन=अश्वमेध नामक यज्ञ से, इष्ट्वा=यजन करके अर्थात् अश्वमेध नामक यज्ञ को सम्पादित करके, च=और, दशदिनसहितम्=दश दिनों के सहित, शताब्दम्=एक सौ वर्षों की, आयुः=जीवनकाल, लब्ध्वा=प्राप्त करके, अग्निम्=अग्निहोत्र में, प्रविष्टः=लग गया, अथवा आग में प्रवेश कर गया ॥४॥

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