भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 97

मृच्छकटिकम्


चुका है। उसका पुत्र रोहसेन परिचारिका से सोने की गाड़ी लेकर खेलने का आग्रह करता हुआ रोने लगता है। यह करुण दृश्य देखकर वसन्तसेना का स्त्रीसुलभ वात्सल्य उमड़ने लगता है और वह उस बच्चे को सोने की गाड़ी के लिये अपने सभी स्वर्णभूषण उतार कर दे देती है। यहाँ कवि ने वसन्तसेना के चरित्र को उत्कृष्टता के शिखर पर प्रतिष्ठित कर दिया है।

यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि कालिदास आदि ने अपने नाटकों में अभिनयस्थल का भी संकेत किया है परन्तु इसमें यहाँ ऐसा कोई उल्लेख नहीं है। यह इस प्रकरण की प्राचीनतरता और लेखक की राजानाश्रितता द्योतित करता है।

प्रकरण—रूपक दश होते हैं। उनमें प्रकरण एक है –

नाटकमथ प्रकरणं भाणव्यायोगसमवकारडिमाः।
ईहामृगाङ्कवीथ्यः प्रहसनमिति रूपकाणि दश॥
साहित्यदर्पण ६।३

प्रकरण के स्वरूप के विषय में दशरूपक और साहित्यदर्पण में प्रायः समान वर्णन है—प्रकरण में वृत्त कविकल्पित एवं लोकाश्रित होता है। इसमें मन्त्री, ब्राह्मण या वणिक् नायक होता है। इसका नायक धीरप्रशान्त होता है जो धर्म, काम एवम् अर्थ — इस पुरुषार्थत्रय से सम्पन्न होता है और विपत्ति में फंसता है। इसमें भी नाटक के समान ही सन्धि आदि होतीं हैं। इसमें नायक की नायिकायें दो प्रकार की होती हैं—(१) कुलस्त्री और (२) गणिका। कहीं केवल कुलीना और कहीं केवल वेश्या और कहीं दोनों होती हैं। कुलजा का क्षेत्र भीतर सीमित होता है। वेश्या बाहरी क्षेत्रवाली होती है। इनका अतिक्रमण नहीं होता है। इसमें धूर्त आदि रहते हैं। यह तीन प्रकार का होता है। प्रथम प्रकार की [कुलीन] नायिका रहने पर (१) शुद्ध, वेश्या नायिका होने पर (२) विकृत, और दोनों प्रकार की नायिकायें रहने पर (३) सङ्कीर्ण होता है। दोनों प्रकार की नायिकायें होने से मृच्छटिक तृतीय प्रकार का है। दशरूपक में यह लिखा है—

अथ प्रकरणे वृत्तमुत्पाद्यं लोकसंश्रयम्।
अमात्यविप्रवणिजामेकं कुर्याच्च नायकम्॥
धीरप्रशान्तं सापायं धर्मकामार्थतत्परम्।
शेषं नाटकवत् सन्धि-प्रवेशक-रसादिकम्॥
नायिका तु द्विधा नेतुः कुलस्त्री गणिका तथा।
क्वचिदेकैकैव कुलजा, वेश्या क्वापि, द्वयं क्वचित्॥
कुलजाभ्यन्तरा, बाह्या वेश्या, नातिक्रमोऽनयोः।
आभिः प्रकरणं त्रेधा, सङ्कीर्णं धूर्तसङ्कुलम्॥
[ दशरूपक ३।३६-४२ ]

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