भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः ७


नान्दीपाठरूपेण, परिश्रमेण=आयासेन, अलम्=व्यर्थम्, अधिकनान्दीपाठेन दर्शकाना- मुत्कण्ठाव्याघातात् तस्माद् विरतिरेवोचितेति भावः। आर्यान्-मान्यान्, मिश्रान्= अभ्यस्तबहुशास्त्रान्,

कुलं शीलं दया दानं धर्मः सत्यं कृतज्ञता ।
अद्रोह इति येष्वेतत् तानार्यान् सम्प्रचक्षते ॥

अपि च

कर्तव्यमाचरन् काममकर्तव्यमनाचरन् ।
तिष्ठति प्रकृताचारे स वै आर्य इति स्मृतः ॥

मिश्र इत्युपाधिः। प्रणिपत्य=प्रणम्य, एवम्=वक्ष्यमाणरूपेण, विज्ञापयामि= विनिवेदयामि, वयम्=अभिनेतारः, मृच्छकटिकम्=मृदः=मृत्तिकायाः, शकटिका= क्षुद्रशकटं यस्मिन् तत् मृच्छकटिकम्, अथवा मृदः शकटम्—मृण्मयं शकटं षष्ठेऽङ्के चारुदत्तपुत्ररोहसेनस्य क्रीडनार्थमुक्तं मृच्छकटम्, तदंश्चास्ति इति “अत इनिठनौ” [ पा० सू० ५।२।११५ ] इति ठनि, ठस्येकादेशे मृच्छकटिकम्, नाम=अन्वर्थ- नामकम्, प्रकरणम्=रूपकविशेषम्, प्रयोक्तुम् = अभिनेतुम्, व्यवसिताः=उद्युक्ताः कृतनिश्चयाः वा, । एतत्कविः=एतस्य प्रणेता, किल=निश्चयेन, वाक्यालङ्कारे वेदं बोध्यम् ।

विमर्श—‘अलम् अनेन’ यहाँ पर ‘गम्यमानापि क्रिया कारकविभक्तौ प्रयो- जिका’ इस नियम के आधार पर साधन क्रिया को गम्यमान मान कर तृतीया हुई है—‘अनेन साध्यं नास्ति’ अर्थात् इससे लाभ नहीं है, अतः नान्दीपाठ बन्द करो — यह अर्थ प्रतीत होता है । विमर्दकारिणा--इसका तात्पर्य है अनावश्यक रूप से उत्कण्ठा को दबाने के लिये बाध्य करने वाले । विमर्द + √कृ + णिनि । आर्य शब्द का अभिप्राय संस्कृत टीका में दो श्लोकों में लिखा है। मिश्र शब्द सम्मान एवं वैदुष्य का सूचक है । कुछ विद्वानों ने—आर्येषु=श्रेष्ठेषु, मिश्रान्=मुख्याः तान्’ यह अर्थ लिखा है । इसकी अपेक्षा यहाँ द्वन्द्व मान कर आर्य और मिश्र यह अर्थ करना उचित है। आर्य=सम्माननीय, मिश्र=बहुतशास्त्रों के ज्ञाता। इससे उस सभा में विद्वानों और अन्य विशिष्ट व्यक्तियों की उपस्थिति सिद्ध होती है ।

मृच्छकटिकम्-–इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है—(१) मृदः शकटिका (=मिट्टी की छोटी सी गाड़ी) अस्ति यस्मिन् तत् प्रकरणम्--मृच्छकटिकम् (२) मृदः शकटम् =मृच्छकटम् तद् वर्णितमस्ति अस्मिन्' इस अर्थ में ‘मृच्छकट’ शब्द से मत्वर्थीय ठन्=इक प्रत्यय करने पर मृच्छकटिकम् यह निष्पन्न होता है ।

इस प्रकरण के छठें अङ्क में चारुदत्त के पुत्र रोहसेन का मिट्टी की गाड़ी से खेलना वर्णित है। वहाँ की कथा अत्यन्त मार्मिक है। चारुदत्त अत्यन्त दरिद्र हो