भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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६ मृच्छकटिकम्

सूत्रधारः-- अलमनेन परिषत्कौतूहलविमर्दकारिणा परिश्रमेण । एवमहमार्यमिश्रान् प्रणिपत्य विज्ञापयामि - यदिदं वयं मृच्छकटिकं नाम प्रकरणं प्रयोक्तुं व्यवसिताः । एतत्कविः किल-


छन्दोविधानतत्त्वज्ञः सर्वशास्त्रविचक्षणः ।
तत्तद्गीतानुगलयकलातालावधारणः ॥
अविधानप्रयोक्ता च योक्तृणामुपदेशकः ।
एवं गुणगणोपेतः सूत्रधारोऽभिधीयते ॥

महाकवि भास आदि के समय में नान्दीपाठ पर्दे के पीछे से किया जाता था । इसके बाद सूत्रधार प्रवेश करके नाटक की प्रस्तावना करता था । चारुदत्त में लिखा है--“नान्द्यन्ते ततः प्रविशति सूत्रधारः।” यह ब्राह्मण रहने पर 'सूत्रधार' कहा जाता था । अन्यवर्ण का होने पर 'स्थापक' कहा जाता था । किन्तु कालिदास के उत्तरवर्त्ती नाटकों में सूत्रधार ही नान्दीपाठ करता था और प्रस्तावना भी करता था ।

शब्दार्थ-- परिषत्कौतूहलविमर्दकारिणा = सभा में उपस्थित लोगों की उत्कण्ठा का विघ्न करने वाले, हानि पहुँचाने वाले, अनेन = इस [ किये जाने वाले ], परिश्रमेण = [ अधिक नान्दीपाठ करने के ] परिश्रम से, अलम् = बस [ करे, अर्थात् अधिक नान्दीपाठ करने की आवश्यकता नहीं है ] । अहम् = मैं सूत्रधार, आर्यमिश्रान् = सम्माननीय सभासदों को, प्रणिपत्य = प्रणाम करके, एवम् = इस प्रकार, विज्ञापयामि = सूचित करता हूँ, यत् = कि, वयम् = हम अभिनेता लोग, इदम् = इस, मृच्छकटिकं नाम = मृच्छकटिक नामक, प्रकरणम् = रूपकविशेष प्रकरण को, प्रयोक्तुम् = अभिनीत करने के लिये, व्यवसिताः = तत्पर [ हैं ], किल = निश्चय ही, एतत्कविः = इस [ प्रकरण ] के लेखक कवि--

अर्थ

सूत्रधारः-- सभा में विराजमान लोगों की उत्सुकता को भंग करने वाले [ हानि पहुँचाने वाले ] इस [ नान्दीपाठ के विस्तार रूप ] परिश्रम को करना व्यर्थ है, अर्थात् इसे समाप्त करो । मैं सम्माननीय विद्वान् दर्शकों को प्रणाम करके इस प्रकार सूचित करता हूँ कि हम [ अभिनेता लोग ] 'मृच्छकटिक' नामक इस प्रकरण का अभिनय करने के लिये तत्पर हैं । इसके रचयिता कवि--

टीका-- परिषीदन्ति अस्यामिति परिषत्, अत्र लक्षणया परिषच्छब्दस्तत्रस्थान् जनान् सभ्यान् बोधयति । एवञ्च परिषद्दाम् = परिषत्स्थितानां जनानाम्, कुतूहलस्य = औत्सुक्यस्य, विमर्दकारिणा = बाधकेन, हानिकरेण वा, अनेन = क्रियमाणेन