मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ मृच्छकटिकम्
[ परिक्रम्यावलोक्य च ] अये ! शून्येयमस्मत्सङ्गीतशाला ! क्व नु गताः कुशीलवाः भविष्यन्ति ? [ विचिन्त्य ] आं ज्ञातम् ।
शून्यमपुत्रस्य गृहं, चिरशून्यं नास्ति यस्य सन्मित्रम् ।
मूर्खस्य दिशः शून्याः, सर्वं शून्यं दरिद्रस्य ॥ ८ ॥
शब्दार्थ—परिक्रम्य=[ रंगमंच पर ] घूमकर, च=और, अवलोक्य=देखकर, अये=अरे, [ विषाद का सूचक अव्यय ], इयम्=यह, [ सामने लक्ष्यमाण ], अस्मत्सङ्गीतशाला=हम लोगों की संगीतशाला [ संगीत=नृत्य, गीत, वाद्य का अभ्यास करने का स्थान ] शून्या=खाली [ है ]; कुशीलवाः=अभिनेता=नट लोग, क्व=कहाँ, नु=शङ्कासूचक अव्यय, गताः=गये, भविष्यन्ति=होंगे, विचिन्त्य=सोंचकर, आम्=अच्छा [ किसी बात के स्मरण में प्रयुक्त अव्यय ] ज्ञातम्=समझ गया [ याद आ गया ] ।
अर्थ—[घूमकर और चारों ओर देखकर] अरे ! हमारी संगीतशाला [संगीत-अभ्यासगृह] तो खाली है, नट [ आदि अभिनेता ] लोग [ इस समय ] कहाँ गये होंगे ? [ सोंचकर ] अच्छा, याद आ गया ।
टीका—परिक्रम्य=रङ्गमञ्चे परिक्रमणं कृत्वा, च=तथा, अवलोक्य=परितो विलोक्य, अये=विषादसूचकमव्ययम्, इयम्=सम्मुखे लक्ष्यमाणा, अस्मत्सङ्गीतशाला=‘गीतं नृत्यं च वाद्यञ्च त्रयं सङ्गीतमुच्यते’ इति लक्षणलक्षितस्य संगीतस्य अभ्यासार्थं शाला=गृहम्, शून्या=नटादिरहिता वर्तत इति शेषः; कुशीलवाः=नटादयः, क्व=कुत्र, नु=शङ्कासूचकमव्ययम्, गताः=प्रयाताः, भविष्यन्ति; आम्=स्मरणार्थकमव्ययम्, ज्ञातम्=पूर्वं विस्मृतं साम्प्रतं स्मृतमित्यर्थः ।
विमर्श—‘अये’ यह पद यहाँ विषाद का सूचक है—‘अये क्रोधे विषादे च’ [ मेदिनी कोष ] । ‘नु’=शङ्कासूचक अव्यय है, अथवा पूछने के अर्थ में अव्यय है—‘नु पृच्छायां विकल्पे च’ अमरकोष ३।३।२५७। सूत्रधार दर्शकों से पूछने का अभिनय करता है, इसे ‘नु’ शब्द से सूचित कराया है । आम्=स्मरण अथवा स्वीकृति=निश्चय का सूचक है—‘आं स्मृतौ चावधारणे” विश्वकोष ।
जैसा कि पहले लिखा जा चुका है कि प्रारम्भिक वाक्यों के बाद जो श्लोक हैं वे प्रक्षिप्त प्रतीत होते हैं । यहाँ से ही वास्तविक पाठ प्रारम्भ होता है । क्योंकि सूत्रधार इतनी देर तक स्वयं बोलता रहे और नान्दीपाठ बन्द करने को कहे, यह तर्कसंगत नहीं लगता है ।
अन्वयः—अपुत्रस्य, गृहम्, शून्यम्, यस्य, सन्मित्रम्, न, अस्ति, [ तस्य ], चिरशून्यम्, [ अस्ति ], मूर्खस्य, दिशः, शून्याः, [ सन्ति ], दरिद्रस्य, सर्वम्, शून्यम् [ भवति ] ॥ ८ ॥