मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽङ्कः १७
इस श्लोक में 'सत्सुरतोत्सवाश्रयम्' बहुव्रीहि समासयुक्त पद है। इसे कुछ व्याख्याकारों ने 'प्रकरण' का विशेषण बनाकर यह अर्थ किया है –
'यह प्रकरण उन दोनों के उत्कृष्ट सुरत रूपी उत्सव को आश्रय मानकर [ बनाया गया ] है।'
यहाँ तक एक वाक्य बनाने के लिये 'अस्ति' का आक्षेप किया गया है। परन्तु यह तर्कसंगत नहीं है। 'सत्सुरतोत्सवाश्रयम्' इसे 'नयप्रचारम्' का विशेषण मानना चाहिये और नयेन=न्यायपूर्वकम् प्रचारः=प्रचरणम्, जीवनयापनम्, यह अर्थ करना चाहिये। चारुदत्त और वसन्तसेना न्याय के साथ जीना चाहते थे परन्तु शकार आदि दुष्टों ने उसमें बाधा पहुँचाने की पूरी पूरी चेष्टा की, इस तथ्य का प्रतिपादन यह मृच्छकटिक करता है न कि राजनीति के किसी प्रमुख विषय का। यहाँ नय का अर्थ आचार-संहिता करना चाहिये। व्यवहार=मुकदमा की दुष्टता=सदोषता का प्रतिपादन इसमें है। चारुदत्त ने वास्तव में हत्या नहीं की है किन्तु न्यायकर्ताओं के सामने मृत्युदण्ड देने के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं था क्योंकि साक्ष्यों से यही सिद्ध हो रहा था।
खलस्वभाव=शकार आदि दुष्ट पात्रों के स्वभाव का भी प्रतिपादन है।
भवितव्यता--होनी, भाग्य। पूरे प्रकरण मे भवितव्यता ने अनेक चमत्कार प्रस्तुत किये हैं। निर्धन चारुदत्त पर वसन्तसेना का अडिग प्रेम होना, शकार द्वारा वसन्तसेना का वध कर दिये जाने पर भी उसकी मृत्यु न होना, निरपराध चारुदत्त को मृत्युदण्ड दिया जाना, गोपालदारक आर्यक के राजा बनने का सिद्धादेश होना और अन्त तक राजा बन जाना, मृत्यु के अन्तिम क्षणों में वसन्तसेना का चारुदत्त के पास आना और उसे बचा लेना, पालक राजा का वध तथा आर्यक का राजा बनना--ये अनेक घटनायें भवितव्यता की प्रमाण हैं।
तृतीय श्लोक के सन्दर्भ-वाक्य--"एतत्कविः किल" से लेकर सातवें श्लोक तक का पाठ प्रक्षिप्त मानना चाहिये, ऐसा कुछ विद्वानों का कथन है। अतः सूत्रधार के पाठ के बाद "परिक्रम्य, अवलोक्य च--" यही मूल पाठ है, ऐसा कहा जा सकता है।
सत्सुरतोत्सवाश्रयम्--सत्=उत्कृष्ट जो सुरतरूपी उत्सव, वह है आश्रय=प्रतिपाद्य विषय जिसका यहाँ बहुव्रीहि समास है। और नयप्रचारम् का विशेषण है नयेन प्रचारम्=आचारसंहितानुसारं जीवनयापनम् यह अर्थ ही उचित है। प्र + √ चर् + घञ् । भवितव्यता = भू + तव्यत् + तल् + टाप् ।
इसमें वंशस्थ छन्द है। लक्षण--वदन्ति वंशस्थविलं जतौ जरौ ॥ ७ ॥
२ मृ०