मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १६ | मृच्छकटिकम् |
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तयोरिदं सत्सुरतोत्सवाश्रयं, नयप्रचारं, व्यवहारदुष्टताम्।
खलस्वभावं, भवितव्यतां तथा चकार सर्वं किल शूद्रको नृपः ॥ ७ ॥
इसमें 'इव' शब्द का प्रयोग होने के कारण श्रौती उपमा है। उपेन्द्रवज्रा छन्द है—
'उपेन्द्रवज्रा प्रथमे लघौ सा।
सा=इन्द्रवज्रा। स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः ॥ ६ ॥
**अन्वयः—**तयोः, सत्सुरतोत्सवाश्रयम्, व्यवहारदुष्टताम्, खलस्वभावम्, तथा, भवितव्यताम्, इदम्, सर्वम्, [ अस्यां कृतौ ] शूद्रकः, नृपः, चकार, किल ॥ ७ ॥
**शब्दार्थ—**तयोः=[ वसन्तसेना एवं चारुदत्त ] उन दोनों के, सत्सुरतोत्सवाश्रयम्=उत्कृष्ट कामलीलारूपी उत्सव पर आश्रित [ =आधृत ], नयप्रचारम्=नीति के प्रचार, व्यवहारदुष्टताम्=व्यवहार=मुकदमें के निर्णय की सदोषता, खलस्वभावम्=[ शकार आदि ] दुष्टों के स्वभाव, तथा=और, भवितव्यता=होनी, इदम्=उपर्युक्त यह, सर्वम्=सभी कुछ, शूद्रकः=शूद्रकनामक, नृपः= राजा ने [ अस्यां कृतौ=अपनी इस मृच्छकटिक कृति में ] चकार=किया है, किल=ऐसी प्रसिद्धि है ॥ ७ ॥
**अर्थ—**उन [ वसन्तसेना एवं चारुदत्त ] दोनों की उत्कृष्ट कामलीला पर आश्रित, नीति की गति, मुकदमें के निर्णय की सदोषता, दुष्टों का स्वभाव और होनी [ भावी ] यह उपर्युक्त सभी कुछ [ वर्णन ] राजा शूद्रक ने [ अपनी इस मृच्छकटिक कृति में ] किया है। [ इस श्लोक का दूसरा अर्थ आगे 'विमर्श' में देखें। ] ॥ ७ ॥
**टीका—**वर्णनीयविषयान् संक्षेपेणाह-तयोः=चारुदत्त-वसन्तसेनयोः, तयोः सम्बद्धमित्यर्थः, सत्सुरतोत्सवाश्रयम्=सत्=श्लाघनीयम् सुरतम्=कामलीला एव उत्सवः=महः, स आश्रयः=वर्णनीयतया उद्देश्यः यस्य सः तम् प्रशस्तसम्भोगलीलाविषयिकामित्यर्थः, नयप्रचारम्=नीतेः गतिम् [ अत्रत्यं तत्त्वं विमर्शे द्रष्टव्यम् ] व्यवहारदुष्टताम्=विवादनिर्णयस्य सदोषताम्, वसन्तसेनायाः मृत्युविषयेऽनपराधिनोऽपि चारुदत्तस्य मृत्युदण्डदानात् तस्य दोषयुक्ततामिति भावः, खलस्वभावम्=खलानाम्=शकारादीनां प्रकृतिम्, तथा, भवितव्यताम्=अपरिहार्याया नियतेः प्रभावम्, इदम्=पूर्वोक्तम्, सर्वम्=सकलम्, शूद्रकः=एतन्नामकः, नृपः=राजा, [ अस्यां कृतौ=मृच्छकटिके ] चकार=कृतवान्, वर्णितवानित्यर्थः ॥ ७ ॥
**विमर्श—**इस श्लोक का अर्थ विवादग्रस्त है। इसका अर्थ करते समय पूर्व पंक्ति 'अस्यां च तत्कृतौ' पर ध्यान देना बहुत आवश्यक है। अतः श्लोक ६ और ७ को मिलाकर अर्थ करना उचित है। इस प्रकार—"अस्यां च तत्कृतौ इदं सर्वं चकार" यह निराकाङ्क्ष वाक्यार्थज्ञान होता है।