मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽङ्कः १५
प्राप्तः, चारुदत्तः=एतन्नामा आसीदिति शेषः । यस्य=चारुदत्तस्य, च, गुणानुरक्ता= गुणैः=दयादाक्षिण्यादिभिः अनुरक्ता=अनुरागवती, दत्तचित्ता, वसन्तशोभा=वसन्त- नामकर्त्तु-विशेषस्य शोभा=श्रीः, कान्तिः, इव=तुल्या, वसन्तसेना=एतन्नामिका, गणिका=वेश्या, आसीत्; यद्वा वसन्तशोभेव वसन्तसेना गणिका यस्य चारुदत्तस्य गुणानुरक्ता जाता । तस्य चारुदत्तस्य दरिद्रत्वेऽपि तस्याद्भुतगुणैरनुरक्ता वसन्त- सेनानाम्रिका गणिका तं प्रति अनुरागवती जातेति भावः ॥ ६ ॥
विमर्श—अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका आदि के अन्तर्गत सात पवित्र नगरियों में अवन्ती भी एक थी। इसी का नाम उज्जायिनी था । यह शिप्रा नदी के तट पर स्थित है। इस समय जो उज्जैन नगर है वह प्राचीन अवन्ती नगरी के स्थान से लगभग एक मील दूर है।
द्विजसार्थवाह—शब्द के अर्थ को लेकर विद्वानों में मतभेद है। 'सार्थ' शब्द वणिक्-समुदाय और समुदायमात्र दोनों अर्थों का वाचक है। इस आधार पर इन अर्थों की कल्पना की जाती है—(१) सार्थवाह=व्यापारी, द्विज=ब्राह्मण व्यापारी, द्विजश्चासौ सार्थवाहश्च । (२) द्विजानाम्=ब्राह्मणानां सार्थम्=समूहम् वहति=अन्नदानादिना पालयति इति द्विजसार्थवाहः=ब्राह्मणपालनकर्ता । अनेक व्याख्याकारों ने चारुदत्त को व्यापारी ब्राह्मण माना है। परन्तु प्रस्तुत प्रकरण में उसके चरित्र की उदारता प्रदर्शित की गई है वह व्यापारी चारुदत्त से सम्भव नहीं है। अतः 'द्विजसार्थवाह' का अर्थ ब्राह्मणसमुदाय का नेता=द्विजश्रेष्ठ यही मानना उचित है। यदि द्विज का अर्थ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—ये तीनों मान लिये जाँय तो इनके समुदाय का पालन अथवा नेतृत्व करने वाला—यह अर्थ भी सम्भव है।
वसन्तसेना की उपमा वसन्त ऋतु की शोभा से करके कवि ने पुष्पों के समान प्रियता और कमनीयता वसन्तसेना की बताई है।
'गुणानुरक्ता' यह पद बहुत महत्त्वपूर्ण है। चारुदत्त यद्यपि अत्यन्त निर्धन हो चुका है तथापि उसमें कुछ अतुलनीय गुण हैं जिनके कारण वसन्तसेना वेश्या होते हुये भी चारुदत्त से प्रेम करने लगती है। इस कथन से वेश्यासामान्य की अर्थ-लोलुपता को छोड़कर गुणप्रियता का प्रतिपादन करना वसन्तसेना के चरित्र की उत्कृष्टता है। वह चारुदत्त के गुणों और यौवन से प्रेम करती है। उसकी निर्धनता प्रेम का बाधक नहीं है।
सार्थो वणिक्समूहे स्यादपि संघातमात्रके । मेदिनी वारस्त्री गणिका वेश्या रूपाजीवाथ सा जनैः । अमरकोश २।६।१६ वैदेहकः सार्थवाहो नैगमो वाणिजो वणिक ॥ अमरकोश २।६ ७८ 'दत्ता सेनान्तनामानि वेश्यानां कल्पयेत् सुधीः ॥
इस वचन के अनुसार वसन्तसेना नाम उचित है।