भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 103
१४मृच्छकटिकम्

अस्याञ्च तत्कृतौ—

अवन्तिपुर्य्यां द्विजसार्थवाहो युवा दरिद्रः किल चारुदत्तः ।
गुणानुरक्ता गणिका च यस्य वसन्तशोभेव वसन्तसेना ॥ ६ ॥


जिस प्रकार चतुर्थ श्लोक में 'शूद्रकोऽग्नि प्रविष्टः यह भूतकालिक' प्रयोग विचारणीय है उसी प्रकार इस श्लोक में भी 'बभूव' पद चिन्तनीय है क्योंकि लेखक अपने लिये लिट् का प्रयोग नहीं कर सकता। अतः पूर्व श्लोक के साथ यहाँ तक का अंश प्रक्षिप्त मान लेना उचित प्रतीत होता है।

इसमें भी मालभारिणी छन्द है। लक्षण--विषमे स-स-जा यदा गुरु चेत् स-भ-रा येन तु मालभारिणीयम् ।

सार्थक विशेषणों का प्रयोग होने से इसमें 'परिकर' अलङ्कार है ॥ ५ ॥

**अन्वयः—**अवन्तिपुर्याम्, द्विजसार्थवाहः, दरिद्रः, युवा, चारुदत्तः, [ आसीत् ] च, यस्य, गुणानुरक्ता, वसन्तशोभा, इव, वसन्तसेना, [ आसीत् ] ॥ ६ ॥

**शब्दार्थ—**अवन्तिपुर्याम्=अवन्तिपुरी उज्जैन नगर में, द्विजसार्थवाहः=ब्राह्मण-समुदाय में श्रेष्ठ, अथवा पालक, अथवा व्यापारसंलग्न ब्राह्मण, दरिद्रः=निर्धन [ पहले धनी किन्तु अति उदार, दानी होने से बाद में दरिद्रता को प्राप्त ], युवा=यौवनसम्पन्न, तरुण, चारुदत्तः=नामक प्रसिद्ध व्यक्ति, [ हुआ था ऐसी ] किल=प्रसिद्धि है। च=और, यस्य=जिस [ चारुदत्त ] के, गुणानुरक्ता=गुणों के कारण अनुराग करने वाली, वसन्तशोभा=वसन्ताख्य ऋतुविशेष की सुन्दरता, इव=के समान, वसन्तसेना=इस नामवाली, गणिका=वेश्या, [ उसी उज्जयिनी में थी ] ॥ ६ ॥

और उस [ शूद्रक ] की [ मृच्छकटिक नामक ] इस कृति में—

**अर्थ—**उज्जैन नगर में ब्राह्मणश्रेष्ठ, अथवा व्यापारी ब्राह्मण [ जो पहले धनी था किन्तु दानी होने के कारण बाद में ] निर्धन, युवक 'चारुदत्त' [ रहा करता था ], और जिसके [ दया, दाक्षिण्य आदि ] गुणों के कारण प्रेम करने वाली, वसन्तऋतु की सुन्दरता के समान [सुन्दरतावाली] वसन्तसेना नामक गणिका [ भी वहीं रहा करती थी ] ॥ ६ ॥

**टीका—**साम्प्रतमेतत्प्रकरणस्य नायकं वर्णयति अवन्तिपुर्याम् अवन्तिपुरी-उज्जयिनीनगरी तस्याम्, द्विजसार्थवाहः=सार्थम्=समूहम्, वहति=नयतीति सार्थवाहः द्विजश्चासौ सार्थवाहश्च=ब्राह्मणश्रेष्ठः, यद्वा व्यापारलग्न-वणिक्-समूह-प्रधानः, यद्वा द्विजानाम्=ब्राह्मणादिद्विजातीनां सार्थम्=समूहम्, वहति=अन्नादि-प्रदानादिना पालयति, एतेन चारुदत्तस्य ब्राह्मणत्वं सिध्यति, युवा=पूर्णयौवनसम्पन्नः तरुणः, दरिद्रः=निर्धनः, पूर्वं यः धनी आसीत् किन्तु अतीवदानि-स्वभावेन सम्प्रति निर्धनतां