भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः १३

अपि च—

समरव्यसनी, प्रमादशून्यः, ककुदो वेदविदां, तपोधनश्च । परवारणबाहुयुद्धलुब्धः क्षितिपालः किल शूद्रको बभूव ॥ ५ ॥

**अन्वयः—**शूद्रकः, समरव्यसनी, प्रमादशून्यः, वेदविदां, ककुदः, तपोधनः, परवारणबाहुयुद्धलुब्धः, च, क्षितिपालः, बभूव, किल ॥ ५ ॥

**शब्दार्थः—**शूद्रकः=[प्रस्तुत प्रकरण के रचयिता] शूद्रक नामक, समरव्यसनी=युद्ध करने के शौकीन=लड़ाकू स्वभाववाले, प्रमादशून्यः=असावधानी से रहित [ सदा सावधान रहने वाले ], वेदविदाम्=वेदों के ज्ञाताओं में, ककुदः=प्रधान=श्रेष्ठ, तपोधनः=तपस्वी, च=और, परवारणबाहुयुद्धलुब्धः=शत्रुओं के हाथियों की सूड़ों से लड़ने के लोभी, क्षितिपालः=पृथ्वी के पालनकर्ता राजा, बभूव=हुये, किल=ऐसी प्रसिद्धि है ॥ ५ ॥

और भी— अर्थ—[ मृच्छकटिक प्रकरण के रचयिता ] 'शूद्रक' युद्ध करने के स्वभाववाले, [ सदैव ] सावधान, वेद जानने वालों में श्रेष्ठ, तपस्यारूपी धनवाले [ महान् तपस्वी], शत्रुओं के हाथियों की सूड़ों के साथ युद्ध करने के लोभी, राजा हुये थे ॥५॥

**टीका—**शूद्रकः=एतन्नामकः प्रस्तुत-प्रकरणस्य रचयिता, समरव्यसनी=समरेषु=युद्धेषु व्यसनी=विशेषाभिरुचिः निरन्तरसमरसंलग्न इत्यर्थः, अनेन युद्धाभिलाषित्त्वं द्योत्यते; प्रमादशून्यः=प्रमादेन=अनवधानतया शून्यः=रहितः, एतेन कार्य-साधने दक्षत्वं प्रतीयते; वेदविदाम् = वैदिकसाहित्याभिज्ञानाम्, ककुदः=श्रेष्ठः; तपोधनः=तप एव धनं यस्य सः—तपोनिष्ठ इत्यर्थः; परवारणबाहुयुद्धलुब्धः=पराः=उत्कृष्टाः वारणाः=गजास्तैः सह बाहुयुद्धे = शुण्डयुद्धे, लुब्धः = अभिलाषी, यद्वा, परेषाम्=शत्रूणाम्, वारणानाम्=गजानाम्, बाहुयुद्धे लुब्धः:=अनुरागीत्यर्थः; यद्वा परेषाम्=शत्रूणाम्, वारणौ=निवारकौ=अवरोधिनौ यौ बाहू=भुजद्वयम्, ताभ्यां सह युद्धलुब्ध इत्यर्थः; क्षितिपालः=पृथ्वीपालको राजा, बभूव = जातः, किल=इति प्रसिद्धिः ॥ ५ ॥

**विमर्श—**इस श्लोक में राजा शूद्रक के स्वभाव, शक्ति, पराक्रम आदि का उल्लेख है। 'समरव्यसनी' इसमें तत्पुरुष समास करना ही उचित है। समरेषु व्यसनं यस्य सः यह बहुव्रीहि करने पर 'समरव्यसनः' यही उचित है क्योंकि बहुव्रीहि करने पर मत्वर्थीय प्रत्यय असाधु होता है। ककुदः—प्राधान्ये राजलिङ्गे च वृषाङ्गे ककुदोऽस्त्रियाम्।” (अमरकोश ३।३।६६।) इसलिये कहीं-कहीं 'ककुदं' यह भी पाठ है।