मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
प्रथमोऽङ्कः १३
अपि च—
समरव्यसनी, प्रमादशून्यः, ककुदो वेदविदां, तपोधनश्च । परवारणबाहुयुद्धलुब्धः क्षितिपालः किल शूद्रको बभूव ॥ ५ ॥
**अन्वयः—**शूद्रकः, समरव्यसनी, प्रमादशून्यः, वेदविदां, ककुदः, तपोधनः, परवारणबाहुयुद्धलुब्धः, च, क्षितिपालः, बभूव, किल ॥ ५ ॥
**शब्दार्थः—**शूद्रकः=[प्रस्तुत प्रकरण के रचयिता] शूद्रक नामक, समरव्यसनी=युद्ध करने के शौकीन=लड़ाकू स्वभाववाले, प्रमादशून्यः=असावधानी से रहित [ सदा सावधान रहने वाले ], वेदविदाम्=वेदों के ज्ञाताओं में, ककुदः=प्रधान=श्रेष्ठ, तपोधनः=तपस्वी, च=और, परवारणबाहुयुद्धलुब्धः=शत्रुओं के हाथियों की सूड़ों से लड़ने के लोभी, क्षितिपालः=पृथ्वी के पालनकर्ता राजा, बभूव=हुये, किल=ऐसी प्रसिद्धि है ॥ ५ ॥
और भी— अर्थ—[ मृच्छकटिक प्रकरण के रचयिता ] 'शूद्रक' युद्ध करने के स्वभाववाले, [ सदैव ] सावधान, वेद जानने वालों में श्रेष्ठ, तपस्यारूपी धनवाले [ महान् तपस्वी], शत्रुओं के हाथियों की सूड़ों के साथ युद्ध करने के लोभी, राजा हुये थे ॥५॥
**टीका—**शूद्रकः=एतन्नामकः प्रस्तुत-प्रकरणस्य रचयिता, समरव्यसनी=समरेषु=युद्धेषु व्यसनी=विशेषाभिरुचिः निरन्तरसमरसंलग्न इत्यर्थः, अनेन युद्धाभिलाषित्त्वं द्योत्यते; प्रमादशून्यः=प्रमादेन=अनवधानतया शून्यः=रहितः, एतेन कार्य-साधने दक्षत्वं प्रतीयते; वेदविदाम् = वैदिकसाहित्याभिज्ञानाम्, ककुदः=श्रेष्ठः; तपोधनः=तप एव धनं यस्य सः—तपोनिष्ठ इत्यर्थः; परवारणबाहुयुद्धलुब्धः=पराः=उत्कृष्टाः वारणाः=गजास्तैः सह बाहुयुद्धे = शुण्डयुद्धे, लुब्धः = अभिलाषी, यद्वा, परेषाम्=शत्रूणाम्, वारणानाम्=गजानाम्, बाहुयुद्धे लुब्धः:=अनुरागीत्यर्थः; यद्वा परेषाम्=शत्रूणाम्, वारणौ=निवारकौ=अवरोधिनौ यौ बाहू=भुजद्वयम्, ताभ्यां सह युद्धलुब्ध इत्यर्थः; क्षितिपालः=पृथ्वीपालको राजा, बभूव = जातः, किल=इति प्रसिद्धिः ॥ ५ ॥
**विमर्श—**इस श्लोक में राजा शूद्रक के स्वभाव, शक्ति, पराक्रम आदि का उल्लेख है। 'समरव्यसनी' इसमें तत्पुरुष समास करना ही उचित है। समरेषु व्यसनं यस्य सः यह बहुव्रीहि करने पर 'समरव्यसनः' यही उचित है क्योंकि बहुव्रीहि करने पर मत्वर्थीय प्रत्यय असाधु होता है। ककुदः—प्राधान्ये राजलिङ्गे च वृषाङ्गे ककुदोऽस्त्रियाम्।” (अमरकोश ३।३।६६।) इसलिये कहीं-कहीं 'ककुदं' यह भी पाठ है।
| १४ | मृच्छकटिकम् |
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अस्याञ्च तत्कृतौ—
अवन्तिपुर्य्यां द्विजसार्थवाहो युवा दरिद्रः किल चारुदत्तः ।
गुणानुरक्ता गणिका च यस्य वसन्तशोभेव वसन्तसेना ॥ ६ ॥
जिस प्रकार चतुर्थ श्लोक में 'शूद्रकोऽग्नि प्रविष्टः यह भूतकालिक' प्रयोग विचारणीय है उसी प्रकार इस श्लोक में भी 'बभूव' पद चिन्तनीय है क्योंकि लेखक अपने लिये लिट् का प्रयोग नहीं कर सकता। अतः पूर्व श्लोक के साथ यहाँ तक का अंश प्रक्षिप्त मान लेना उचित प्रतीत होता है।
इसमें भी मालभारिणी छन्द है। लक्षण--विषमे स-स-जा यदा गुरु चेत् स-भ-रा येन तु मालभारिणीयम् ।
सार्थक विशेषणों का प्रयोग होने से इसमें 'परिकर' अलङ्कार है ॥ ५ ॥
**अन्वयः—**अवन्तिपुर्याम्, द्विजसार्थवाहः, दरिद्रः, युवा, चारुदत्तः, [ आसीत् ] च, यस्य, गुणानुरक्ता, वसन्तशोभा, इव, वसन्तसेना, [ आसीत् ] ॥ ६ ॥
**शब्दार्थ—**अवन्तिपुर्याम्=अवन्तिपुरी उज्जैन नगर में, द्विजसार्थवाहः=ब्राह्मण-समुदाय में श्रेष्ठ, अथवा पालक, अथवा व्यापारसंलग्न ब्राह्मण, दरिद्रः=निर्धन [ पहले धनी किन्तु अति उदार, दानी होने से बाद में दरिद्रता को प्राप्त ], युवा=यौवनसम्पन्न, तरुण, चारुदत्तः=नामक प्रसिद्ध व्यक्ति, [ हुआ था ऐसी ] किल=प्रसिद्धि है। च=और, यस्य=जिस [ चारुदत्त ] के, गुणानुरक्ता=गुणों के कारण अनुराग करने वाली, वसन्तशोभा=वसन्ताख्य ऋतुविशेष की सुन्दरता, इव=के समान, वसन्तसेना=इस नामवाली, गणिका=वेश्या, [ उसी उज्जयिनी में थी ] ॥ ६ ॥
और उस [ शूद्रक ] की [ मृच्छकटिक नामक ] इस कृति में—
**अर्थ—**उज्जैन नगर में ब्राह्मणश्रेष्ठ, अथवा व्यापारी ब्राह्मण [ जो पहले धनी था किन्तु दानी होने के कारण बाद में ] निर्धन, युवक 'चारुदत्त' [ रहा करता था ], और जिसके [ दया, दाक्षिण्य आदि ] गुणों के कारण प्रेम करने वाली, वसन्तऋतु की सुन्दरता के समान [सुन्दरतावाली] वसन्तसेना नामक गणिका [ भी वहीं रहा करती थी ] ॥ ६ ॥
**टीका—**साम्प्रतमेतत्प्रकरणस्य नायकं वर्णयति अवन्तिपुर्याम् अवन्तिपुरी-उज्जयिनीनगरी तस्याम्, द्विजसार्थवाहः=सार्थम्=समूहम्, वहति=नयतीति सार्थवाहः द्विजश्चासौ सार्थवाहश्च=ब्राह्मणश्रेष्ठः, यद्वा व्यापारलग्न-वणिक्-समूह-प्रधानः, यद्वा द्विजानाम्=ब्राह्मणादिद्विजातीनां सार्थम्=समूहम्, वहति=अन्नादि-प्रदानादिना पालयति, एतेन चारुदत्तस्य ब्राह्मणत्वं सिध्यति, युवा=पूर्णयौवनसम्पन्नः तरुणः, दरिद्रः=निर्धनः, पूर्वं यः धनी आसीत् किन्तु अतीवदानि-स्वभावेन सम्प्रति निर्धनतां
प्रथमोऽङ्कः १५
प्राप्तः, चारुदत्तः=एतन्नामा आसीदिति शेषः । यस्य=चारुदत्तस्य, च, गुणानुरक्ता= गुणैः=दयादाक्षिण्यादिभिः अनुरक्ता=अनुरागवती, दत्तचित्ता, वसन्तशोभा=वसन्त- नामकर्त्तु-विशेषस्य शोभा=श्रीः, कान्तिः, इव=तुल्या, वसन्तसेना=एतन्नामिका, गणिका=वेश्या, आसीत्; यद्वा वसन्तशोभेव वसन्तसेना गणिका यस्य चारुदत्तस्य गुणानुरक्ता जाता । तस्य चारुदत्तस्य दरिद्रत्वेऽपि तस्याद्भुतगुणैरनुरक्ता वसन्त- सेनानाम्रिका गणिका तं प्रति अनुरागवती जातेति भावः ॥ ६ ॥
विमर्श—अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका आदि के अन्तर्गत सात पवित्र नगरियों में अवन्ती भी एक थी। इसी का नाम उज्जायिनी था । यह शिप्रा नदी के तट पर स्थित है। इस समय जो उज्जैन नगर है वह प्राचीन अवन्ती नगरी के स्थान से लगभग एक मील दूर है।
द्विजसार्थवाह—शब्द के अर्थ को लेकर विद्वानों में मतभेद है। 'सार्थ' शब्द वणिक्-समुदाय और समुदायमात्र दोनों अर्थों का वाचक है। इस आधार पर इन अर्थों की कल्पना की जाती है—(१) सार्थवाह=व्यापारी, द्विज=ब्राह्मण व्यापारी, द्विजश्चासौ सार्थवाहश्च । (२) द्विजानाम्=ब्राह्मणानां सार्थम्=समूहम् वहति=अन्नदानादिना पालयति इति द्विजसार्थवाहः=ब्राह्मणपालनकर्ता । अनेक व्याख्याकारों ने चारुदत्त को व्यापारी ब्राह्मण माना है। परन्तु प्रस्तुत प्रकरण में उसके चरित्र की उदारता प्रदर्शित की गई है वह व्यापारी चारुदत्त से सम्भव नहीं है। अतः 'द्विजसार्थवाह' का अर्थ ब्राह्मणसमुदाय का नेता=द्विजश्रेष्ठ यही मानना उचित है। यदि द्विज का अर्थ ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—ये तीनों मान लिये जाँय तो इनके समुदाय का पालन अथवा नेतृत्व करने वाला—यह अर्थ भी सम्भव है।
वसन्तसेना की उपमा वसन्त ऋतु की शोभा से करके कवि ने पुष्पों के समान प्रियता और कमनीयता वसन्तसेना की बताई है।
'गुणानुरक्ता' यह पद बहुत महत्त्वपूर्ण है। चारुदत्त यद्यपि अत्यन्त निर्धन हो चुका है तथापि उसमें कुछ अतुलनीय गुण हैं जिनके कारण वसन्तसेना वेश्या होते हुये भी चारुदत्त से प्रेम करने लगती है। इस कथन से वेश्यासामान्य की अर्थ-लोलुपता को छोड़कर गुणप्रियता का प्रतिपादन करना वसन्तसेना के चरित्र की उत्कृष्टता है। वह चारुदत्त के गुणों और यौवन से प्रेम करती है। उसकी निर्धनता प्रेम का बाधक नहीं है।
सार्थो वणिक्समूहे स्यादपि संघातमात्रके । मेदिनी वारस्त्री गणिका वेश्या रूपाजीवाथ सा जनैः । अमरकोश २।६।१६ वैदेहकः सार्थवाहो नैगमो वाणिजो वणिक ॥ अमरकोश २।६ ७८ 'दत्ता सेनान्तनामानि वेश्यानां कल्पयेत् सुधीः ॥
इस वचन के अनुसार वसन्तसेना नाम उचित है।
| १६ | मृच्छकटिकम् |
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तयोरिदं सत्सुरतोत्सवाश्रयं, नयप्रचारं, व्यवहारदुष्टताम्।
खलस्वभावं, भवितव्यतां तथा चकार सर्वं किल शूद्रको नृपः ॥ ७ ॥
इसमें 'इव' शब्द का प्रयोग होने के कारण श्रौती उपमा है। उपेन्द्रवज्रा छन्द है—
'उपेन्द्रवज्रा प्रथमे लघौ सा।
सा=इन्द्रवज्रा। स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ जगौ गः ॥ ६ ॥
**अन्वयः—**तयोः, सत्सुरतोत्सवाश्रयम्, व्यवहारदुष्टताम्, खलस्वभावम्, तथा, भवितव्यताम्, इदम्, सर्वम्, [ अस्यां कृतौ ] शूद्रकः, नृपः, चकार, किल ॥ ७ ॥
**शब्दार्थ—**तयोः=[ वसन्तसेना एवं चारुदत्त ] उन दोनों के, सत्सुरतोत्सवाश्रयम्=उत्कृष्ट कामलीलारूपी उत्सव पर आश्रित [ =आधृत ], नयप्रचारम्=नीति के प्रचार, व्यवहारदुष्टताम्=व्यवहार=मुकदमें के निर्णय की सदोषता, खलस्वभावम्=[ शकार आदि ] दुष्टों के स्वभाव, तथा=और, भवितव्यता=होनी, इदम्=उपर्युक्त यह, सर्वम्=सभी कुछ, शूद्रकः=शूद्रकनामक, नृपः= राजा ने [ अस्यां कृतौ=अपनी इस मृच्छकटिक कृति में ] चकार=किया है, किल=ऐसी प्रसिद्धि है ॥ ७ ॥
**अर्थ—**उन [ वसन्तसेना एवं चारुदत्त ] दोनों की उत्कृष्ट कामलीला पर आश्रित, नीति की गति, मुकदमें के निर्णय की सदोषता, दुष्टों का स्वभाव और होनी [ भावी ] यह उपर्युक्त सभी कुछ [ वर्णन ] राजा शूद्रक ने [ अपनी इस मृच्छकटिक कृति में ] किया है। [ इस श्लोक का दूसरा अर्थ आगे 'विमर्श' में देखें। ] ॥ ७ ॥
**टीका—**वर्णनीयविषयान् संक्षेपेणाह-तयोः=चारुदत्त-वसन्तसेनयोः, तयोः सम्बद्धमित्यर्थः, सत्सुरतोत्सवाश्रयम्=सत्=श्लाघनीयम् सुरतम्=कामलीला एव उत्सवः=महः, स आश्रयः=वर्णनीयतया उद्देश्यः यस्य सः तम् प्रशस्तसम्भोगलीलाविषयिकामित्यर्थः, नयप्रचारम्=नीतेः गतिम् [ अत्रत्यं तत्त्वं विमर्शे द्रष्टव्यम् ] व्यवहारदुष्टताम्=विवादनिर्णयस्य सदोषताम्, वसन्तसेनायाः मृत्युविषयेऽनपराधिनोऽपि चारुदत्तस्य मृत्युदण्डदानात् तस्य दोषयुक्ततामिति भावः, खलस्वभावम्=खलानाम्=शकारादीनां प्रकृतिम्, तथा, भवितव्यताम्=अपरिहार्याया नियतेः प्रभावम्, इदम्=पूर्वोक्तम्, सर्वम्=सकलम्, शूद्रकः=एतन्नामकः, नृपः=राजा, [ अस्यां कृतौ=मृच्छकटिके ] चकार=कृतवान्, वर्णितवानित्यर्थः ॥ ७ ॥
**विमर्श—**इस श्लोक का अर्थ विवादग्रस्त है। इसका अर्थ करते समय पूर्व पंक्ति 'अस्यां च तत्कृतौ' पर ध्यान देना बहुत आवश्यक है। अतः श्लोक ६ और ७ को मिलाकर अर्थ करना उचित है। इस प्रकार—"अस्यां च तत्कृतौ इदं सर्वं चकार" यह निराकाङ्क्ष वाक्यार्थज्ञान होता है।
प्रथमोऽङ्कः १७
इस श्लोक में 'सत्सुरतोत्सवाश्रयम्' बहुव्रीहि समासयुक्त पद है। इसे कुछ व्याख्याकारों ने 'प्रकरण' का विशेषण बनाकर यह अर्थ किया है –
'यह प्रकरण उन दोनों के उत्कृष्ट सुरत रूपी उत्सव को आश्रय मानकर [ बनाया गया ] है।'
यहाँ तक एक वाक्य बनाने के लिये 'अस्ति' का आक्षेप किया गया है। परन्तु यह तर्कसंगत नहीं है। 'सत्सुरतोत्सवाश्रयम्' इसे 'नयप्रचारम्' का विशेषण मानना चाहिये और नयेन=न्यायपूर्वकम् प्रचारः=प्रचरणम्, जीवनयापनम्, यह अर्थ करना चाहिये। चारुदत्त और वसन्तसेना न्याय के साथ जीना चाहते थे परन्तु शकार आदि दुष्टों ने उसमें बाधा पहुँचाने की पूरी पूरी चेष्टा की, इस तथ्य का प्रतिपादन यह मृच्छकटिक करता है न कि राजनीति के किसी प्रमुख विषय का। यहाँ नय का अर्थ आचार-संहिता करना चाहिये। व्यवहार=मुकदमा की दुष्टता=सदोषता का प्रतिपादन इसमें है। चारुदत्त ने वास्तव में हत्या नहीं की है किन्तु न्यायकर्ताओं के सामने मृत्युदण्ड देने के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं था क्योंकि साक्ष्यों से यही सिद्ध हो रहा था।
खलस्वभाव=शकार आदि दुष्ट पात्रों के स्वभाव का भी प्रतिपादन है।
भवितव्यता--होनी, भाग्य। पूरे प्रकरण मे भवितव्यता ने अनेक चमत्कार प्रस्तुत किये हैं। निर्धन चारुदत्त पर वसन्तसेना का अडिग प्रेम होना, शकार द्वारा वसन्तसेना का वध कर दिये जाने पर भी उसकी मृत्यु न होना, निरपराध चारुदत्त को मृत्युदण्ड दिया जाना, गोपालदारक आर्यक के राजा बनने का सिद्धादेश होना और अन्त तक राजा बन जाना, मृत्यु के अन्तिम क्षणों में वसन्तसेना का चारुदत्त के पास आना और उसे बचा लेना, पालक राजा का वध तथा आर्यक का राजा बनना--ये अनेक घटनायें भवितव्यता की प्रमाण हैं।
तृतीय श्लोक के सन्दर्भ-वाक्य--"एतत्कविः किल" से लेकर सातवें श्लोक तक का पाठ प्रक्षिप्त मानना चाहिये, ऐसा कुछ विद्वानों का कथन है। अतः सूत्रधार के पाठ के बाद "परिक्रम्य, अवलोक्य च--" यही मूल पाठ है, ऐसा कहा जा सकता है।
सत्सुरतोत्सवाश्रयम्--सत्=उत्कृष्ट जो सुरतरूपी उत्सव, वह है आश्रय=प्रतिपाद्य विषय जिसका यहाँ बहुव्रीहि समास है। और नयप्रचारम् का विशेषण है नयेन प्रचारम्=आचारसंहितानुसारं जीवनयापनम् यह अर्थ ही उचित है। प्र + √ चर् + घञ् । भवितव्यता = भू + तव्यत् + तल् + टाप् ।
इसमें वंशस्थ छन्द है। लक्षण--वदन्ति वंशस्थविलं जतौ जरौ ॥ ७ ॥
२ मृ०
१८ मृच्छकटिकम्
[ परिक्रम्यावलोक्य च ] अये ! शून्येयमस्मत्सङ्गीतशाला ! क्व नु गताः कुशीलवाः भविष्यन्ति ? [ विचिन्त्य ] आं ज्ञातम् ।
शून्यमपुत्रस्य गृहं, चिरशून्यं नास्ति यस्य सन्मित्रम् ।
मूर्खस्य दिशः शून्याः, सर्वं शून्यं दरिद्रस्य ॥ ८ ॥
शब्दार्थ—परिक्रम्य=[ रंगमंच पर ] घूमकर, च=और, अवलोक्य=देखकर, अये=अरे, [ विषाद का सूचक अव्यय ], इयम्=यह, [ सामने लक्ष्यमाण ], अस्मत्सङ्गीतशाला=हम लोगों की संगीतशाला [ संगीत=नृत्य, गीत, वाद्य का अभ्यास करने का स्थान ] शून्या=खाली [ है ]; कुशीलवाः=अभिनेता=नट लोग, क्व=कहाँ, नु=शङ्कासूचक अव्यय, गताः=गये, भविष्यन्ति=होंगे, विचिन्त्य=सोंचकर, आम्=अच्छा [ किसी बात के स्मरण में प्रयुक्त अव्यय ] ज्ञातम्=समझ गया [ याद आ गया ] ।
अर्थ—[घूमकर और चारों ओर देखकर] अरे ! हमारी संगीतशाला [संगीत-अभ्यासगृह] तो खाली है, नट [ आदि अभिनेता ] लोग [ इस समय ] कहाँ गये होंगे ? [ सोंचकर ] अच्छा, याद आ गया ।
टीका—परिक्रम्य=रङ्गमञ्चे परिक्रमणं कृत्वा, च=तथा, अवलोक्य=परितो विलोक्य, अये=विषादसूचकमव्ययम्, इयम्=सम्मुखे लक्ष्यमाणा, अस्मत्सङ्गीतशाला=‘गीतं नृत्यं च वाद्यञ्च त्रयं सङ्गीतमुच्यते’ इति लक्षणलक्षितस्य संगीतस्य अभ्यासार्थं शाला=गृहम्, शून्या=नटादिरहिता वर्तत इति शेषः; कुशीलवाः=नटादयः, क्व=कुत्र, नु=शङ्कासूचकमव्ययम्, गताः=प्रयाताः, भविष्यन्ति; आम्=स्मरणार्थकमव्ययम्, ज्ञातम्=पूर्वं विस्मृतं साम्प्रतं स्मृतमित्यर्थः ।
विमर्श—‘अये’ यह पद यहाँ विषाद का सूचक है—‘अये क्रोधे विषादे च’ [ मेदिनी कोष ] । ‘नु’=शङ्कासूचक अव्यय है, अथवा पूछने के अर्थ में अव्यय है—‘नु पृच्छायां विकल्पे च’ अमरकोष ३।३।२५७। सूत्रधार दर्शकों से पूछने का अभिनय करता है, इसे ‘नु’ शब्द से सूचित कराया है । आम्=स्मरण अथवा स्वीकृति=निश्चय का सूचक है—‘आं स्मृतौ चावधारणे” विश्वकोष ।
जैसा कि पहले लिखा जा चुका है कि प्रारम्भिक वाक्यों के बाद जो श्लोक हैं वे प्रक्षिप्त प्रतीत होते हैं । यहाँ से ही वास्तविक पाठ प्रारम्भ होता है । क्योंकि सूत्रधार इतनी देर तक स्वयं बोलता रहे और नान्दीपाठ बन्द करने को कहे, यह तर्कसंगत नहीं लगता है ।
अन्वयः—अपुत्रस्य, गृहम्, शून्यम्, यस्य, सन्मित्रम्, न, अस्ति, [ तस्य ], चिरशून्यम्, [ अस्ति ], मूर्खस्य, दिशः, शून्याः, [ सन्ति ], दरिद्रस्य, सर्वम्, शून्यम् [ भवति ] ॥ ८ ॥
प्रथमोऽङ्कः १६
**शब्दार्थ—**अपुत्रस्य = पुत्रहीन [व्यक्ति] का, गृहम् = घर, शून्यम् = सूना [होता है], यस्य = जिस [व्यक्ति] का, सन्मित्रम् = अच्छा मित्र, न = नहीं, अस्ति = होता है, [तस्य = उसका] चिरशून्यम् = चिरकाल अभिमत कार्य से रहित [होता है], मूर्खस्य = मूर्ख, [व्यक्ति] की [समस्त] दिशः = दिशायें [अर्थात् सभी ओर], शून्याः = सूनी [सहारारहित], [हैं], दरिद्रस्य = निर्धन [व्यक्ति] का, सर्वम् = सभी कुछ, शून्यम् = सूना, [होता है] ॥ ८ ॥
**अर्थ—**पुत्रहीन [सन्तानहीन] का घर सूना [होता है]; जिसका [कोई भी] अच्छा मित्र नहीं होता है, उसका चिरकाल शून्य रहता है; मूर्ख की [सभी] दिशायें शून्य रहती हैं [और] दरिद्र का सब [संसार] सूना = खाली होता है ॥ ८ ॥ [चारुदत्त की निर्धनता को सूचित करने के लिये सूत्रधार यहाँ से उपक्रम बाँधता है।]
**टीका—**अपुत्रस्य = अविद्यमानपुत्रस्य, पुत्रहीनस्य, [पुत्रस्य पुत्र्याश्च द्वन्द्वे पुँल्लिङ्गैकशेषे सति पुत्रशब्द एवोभयार्थवाचकः, तेन पुत्ररहितस्य पुत्रीरहितस्य चेत्यर्थ इति केचित् ।] गृहम् = आवासः, भवनम्, शून्यम् = रिक्तम् भवति, पुत्राभावे गृहस्थसर्ववस्तूनां वैयर्थ्यादिति भावः, यस्य = पुरुषस्य, सन्मित्रम् = शोभनं सुहृद्, न = नैव, अस्ति = वर्तते, तस्य = पुरुषस्य, चिरशून्यम् = चिरम् = दीर्घः कालः, शून्यम् = अभिमतकार्यरहितम्, सन्मित्राभावे कदापि कार्यसाधनाभावात् यावज्जीवं सुखं न लभ्यते इति भावः; मूर्खस्य = मूढस्य, बुद्धिरहितस्य, दिशः = सर्वाः ककुभः, शून्याः = सहायकजनरहिताः भवन्तीति शेषः; दरिद्रस्य = निर्धनस्य पुरुषस्य सर्वम् = सकलं जगत्, शून्यम् = रिक्तम्, भवतीति शेषः । निर्धनस्य पुरुषस्य कदापि कुत्रापि कोऽपि सहायको न भवति तेन विपुलसंख्याकजनमपि जगत् तत्कृते अभावमयमेव भवतीति भावः ॥ ८ ॥
**विमर्श—**समस्त वैभव ऐश्वर्य रहने पर भी यदि गृह-प्राङ्गण में शिशुलीला करने वाला पुत्र नहीं है तो वह घर वास्तव में सूना ही होता है। जिस व्यक्ति का कोई भी अच्छा मित्र नहीं होता है, सहायक नहीं होता है अतः सर्वत्र उसके कार्यों में बाधा पड़ती है, कोई भी अभिमत कार्य नहीं हो पाता है। संसार में सबकुछ रहता है परन्तु मूर्ख उसका उपभोग नहीं करपाता है अतः उसके लिये सभी ओर रिक्तता ही रहती है। इन सबकी अपेक्षा निर्धन की स्थिति और दयनीय होती है क्योंकि सारा संसार ही उसके लिये नहीं के समान है। कोई भी उसका साथ नहीं देता है, न बात सुनता है; न करता है, और न कुछ देता है। अतः दरिद्र होना महा अभिशाप है।
यहाँ दरिद्रता की निन्दा करते हुये आगे निरूपित होनेवाली चारुदत्त की की दरिद्रता का संकेत किया गया है।
| २० | मृच्छकटिकम् |
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कृतञ्च सङ्गीतकं मया। अनेन चिरसङ्गीतोपासनेन ग्रीष्मसमये प्रचण्डदिनकरकिरणोच्छुष्कपुष्करबीजमिव प्रचलिततारके क्षुधा ममाक्षिणी खटखटायेते, तत् यावत् गृहिणीमाहूय पृच्छामि-अस्ति किञ्चित् प्रातराशो न वेति। एषोऽस्मि भोः ! कार्य्यवशात् प्रयोगवशाच्च प्राकृतभाषी संवृत्तः-
अपुत्रस्य--अविद्यमान्र: पुत्रो यस्यः सः, बहुव्रीहि है। चिरशून्यम्=चिरंशून्यम्-यह कर्मधारय हैं।
इसमें आर्या छन्द है। लक्षण--
यस्याः पादे प्रथमे द्वादश मात्रास्तथा तृतीयेपि।
अष्टादशद्वितीये चतुर्थके पञ्चदश साऽऽर्या ॥ ८ ॥
शब्दार्थ-मया=मैंने [सूत्रधारने] सङ्गीतकम्=गाना, बजाना और नाचना; कृतम्=सम्पादित कर लिया, अनेन=इस, चिरसङ्गीतोपासनेन=अधिक देर तक सङ्गीत के उपासन-अभ्यास से, ग्रीष्मसमये=गर्मी के दिनों में, प्रचण्ड-दिनकर-किरणोच्छुष्कपुष्कर-बीजम् इव=अत्यधिक तपते हुये सूर्य की किरणों से सूखे हुये कमल के बीज के समान, प्रचलिततारके=चञ्चल पुतलियों वाली, मम=मेरी [सूत्रधार की], अक्षिणी=आंखें, क्षुधा=भूख से, खटखटायेते-खट खट [शब्द] कर रहीं हैं, तत्=इसलिये, यावत्=वाक्यालङ्कार में प्रयुक्त अव्यय, गृहिणीम्=घर की मालकिन नटी को, आहूय=बुलाकर, पृच्छामि=पूछता हूँ; किञ्चित्-प्रातराशः=कुछ भी सबेरे का जलपान, अस्ति=है, न वा=अथवा नहीं। भोः=अरे भाइयो !; एषः=यह, [ अहम्=मैं ], कार्य्यवशात्=प्रयोजनवश, च=और प्रयोगवशात्=नाट्यप्रयोग के कारण, प्राकृतभाषी=प्राकृत भाषा बोलने वाला, संवृत्तः=बन गया, अस्मि=हूँ।
अर्थ-मैंने संगीतक (गीत, नृत्य और वाद्य का) कार्य पूरा कर लिया है। अधिक देर तक इस संगीत का अभ्यास करने के कारण भूख लगने से चंचल पुतलियों वाली मेरी आंखें उसी प्रकार खट खट आवाज कर रहीं हैं जिस प्रकार गर्मी के दिनों में प्रचण्ड सूर्य की किरणों से सूखे हुये कमल के बीज [खट खट] आवाज करते हैं। तो गृहिणी (पत्नी नटी) को बुलाकर पूछता हूँ कि-कुछ जलपान है अथवा नहीं। सज्जनों ! अब मैं प्रयोजनवश और [नाटकीय] प्रयोग-वश प्राकृत भाषा बोलने वाला बन गया हूँ-
टीका-मया=सूत्रधारेण, सङ्गीतकम्=गीतं नृत्यञ्च वाद्यञ्च त्रयं सङ्गीत-मुच्यते-इति लक्षणलक्षितम्, कृतम्=सम्पादितम्, अभ्यस्तं वां। चिरसङ्गीतोपासनेन-चिरम्=दीर्घकालपर्यन्तम्, सङ्गीतस्य=गीतादित्रयस्य, उपासनेन=अभ्यासेन, ग्रीष्म-समये=ग्रीष्मतौ, प्रचण्ड-दिनकर-किरणोच्छुष्क-पुष्कर-बीजम्=प्रचण्डः=प्रतप्तः चासौ.
प्रथमोऽङ्कः २१
दिनकरः=मध्याह्नसूर्यः, तस्य किरणैः=रश्मिभिः, उच्छुष्कम्=सर्वथोपजातशोषम्, पुष्करस्य=कमलस्य, बीजम्=कमलदलमध्ये विद्यमानं बीजम्, इव=तुल्यम्, प्रचलिततारके=चञ्चलतामुपगते तारके=कनीनिके ययोः ते, मम=सूत्रधारस्य, अक्षिणी=नेत्रे, क्षुधा=बुभुक्षया, खटखटायेते=खटत् खटत् इति शब्दं कुरुतः; तत् यावत्=तस्मात् कारणात्, गृहिणीम्=भार्याम्, आहूय=सम्बोध्या, पृच्छामि=पृच्छां करोमि, प्रातराशः=कल्यभोजनम्, प्रातः अश्यते=भुज्यते इति प्रातराशः; कार्यवशात्=कार्यम्=बोधनीयायाः स्त्रियो झटिति ज्ञानम्, तस्य वशात्=कारणात्, स्त्रीत्वेन भार्या प्राकृत-भाषां सरलतया शीघ्रमेव ज्ञास्यतीति भावः; प्रयोगवशात्=नाट्यप्रयोगस्य नियमात्, प्राकृतभाषा-भाषी=प्राकृतभाषा-प्रयोक्ता, संवृत्तः=सञ्जातः, अत्र च “स्त्रीषु ना प्राकृतं वदेत् ।” “पुरुषाः संस्कृतजल्पाः प्राकृतगुम्फोऽपि भवति सुकुमारः ।” “कार्यत-श्चोत्तमादीनां कार्यो भाषाव्यतिक्रमः ।” इत्यादिवचनानुरोधेन स सूत्रधारः नटीं प्रति प्राकृतभाषाप्रयोगमेवोचितं मनुते इति बोध्यम् ।
विमर्श—प्रचलिततारके-जिस प्रकार भीषण ग्रीष्मकाल में कमलपुष्प सूख जाते हैं और उनके भीतर के बीज हिलने पर आवाज करने लगते हैं उसी प्रकार कमलतुल्य नेत्रों में रहने वाली पुतलियाँ भी भूखके कारण चलते रहने से शब्द कर रहीं हैं । खट-खटायेते खटत् इस प्रकार के अव्यक्त शब्दानुकरण के लिये इसका प्रयोग है । खटत् भवति—इस विग्रह में “अव्यक्तानुकरणाद् द्व्यजवरार्धादनितौ डाच्” [पा. सू. ५।४।५७ ] सूत्र से डाच्=आ प्रत्यय होता है और 'डाचि विवक्षिते बहुलं द्वे भवतः' इस नियम से द्वित्व होता है -खटत् + खटत् + आ, इस अवस्था में 'नित्यमाम्रेडिते डाचीति वक्तव्यम्' नियम से तकार और खकार का पररूप होने पर 'खटखटत् + आ बनता है डित् प्रत्यय परे होने से टि=अत् का लोप होने पर 'खटखटा' यह निष्पन्न होता है । “लोहिताडाग्भ्यः क्यष्” [ पा. सू. ३।१।१३ ] इस नियम से क्यष्=य प्रत्यय होने पर – “वा क्यषः” [ पा. सू. १।३।६० ] से वैकल्पिक आत्मनेपद होकर प्रथम पुरुष द्विवचन का रूप सिद्ध होता है । पुतलियों में ऐसी ध्वनि नहीं होती है, अतः यह क्रियापद उचित नहीं है, इसकी अपेक्षा और कोई अनुकरण-वाची शब्द रखना चाहिये था । ‘बीजम् इव अक्षिणी’ इस प्रयोग में उपमान एकवचन और उपमेय द्विवचन का प्रयोग भी अच्छा नहीं है । पृथ्वीधर ने खटखटायेते इस पर यह लिखा है—“संगीतकेन चक्षुषी खटखटायेते इत्यसम्बद्ध-प्रलापेन भाविनः शकारासम्बद्धभाषणस्य सूचनम् ।” अतः इस पद पर विशेष आलोचना अनावश्यक है ।
प्रातराशः-—प्रातः काले अश्यते इति प्रातराशः-कल्यभोजनम् ।
**कार्यवशात्—**यहाँ अपनी भार्या के साथ वार्ता करना कार्य है न कि नाटक का कार्य । क्योंकि ‘स्त्रीषु ना प्राकृतं वदेत्’ पुरुष पात्र को स्त्रियों से प्राकृत भाषा
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अविद अविद भोः ! चिरसंगीदोवासणेण सुक्खपोक्खरणलाई विअ मे बुभुक्खाए मिलाणाई अंगाई, ता जाव गेहं गदुअ आणामि, अत्थि किंपि कुटुंबिणीए उवबादिदं ण वेत्ति । [ परिक्रम्यावलोक्य च ] एदं तं अम्हाणं गेहं, ता पबिसामि । [ प्रविश्यावलोक्य च ] हीमाणहे ! किं णु खु अम्हाणं गेहे अवरं विअ संविहाणं बट्टदि ! आआमितंडुलोदअप्पबाहा रच्छा, लोहकड़ाहपरिवत्तणकसणसारा किदबिसेसआ विअ जुअदी अहिअदरं सोहदि भूमी, सिणिद्धगंधेण उद्दीवती विअ अहिअं बाधदि मं बुभुक्खा; ता किं पुव्वविहिदं णिहाणं उबवण्णं^१ [ उब्बण्णं ] भवे ? आदू अहं ज्जेब बुभुक्खादो ओदणमअं जीअलोअं पेक्खामि ! णत्थि किल पादरासो अम्हाणं गेहे, पाणाच्चअं^२ बाधेदि मं बुभुक्खा, इध सब्वं णवं विअ संविहाणं बट्टदि, एका बण्णअं पीसेदि, अबरा सुमणाई गुंफेदि । [ विचिन्त्य ] किं ण्णेदं ? भोदु, कुटुम्बिणीं सद्दाबिअ परमत्थं जाणिस्सं । [नेपथ्याभिमुखमवलोक्य] अज्जे ! इदो दाव । ( अविद अविद भोः ! चिरसङ्गी-तोपासनेन शुष्कपुष्करनालानीव मे बुभुक्षया म्लानानि अङ्गानि, तत् यावत् गृहं गत्वा जानामि, अस्ति किमपि कुटुम्बिन्या उपपादितं न वेति । ( परिक्रम्यावलोक्य च ) इदं तदस्माकं गृहं, तत् प्रविशामि । ( प्रविश्यावलोक्य च ) आश्चर्यम् ! किं नु
में वार्ता करनी चाहिये, यह नियम है। प्रयोगवशात्—नाटक में जो अभिनय करना है, तदनुसार सूत्रधार प्राकृत भाषाभाषी बन रहा है। यहाँ सूत्रधार को एक निर्धन व्यक्ति का अभिनय करना है अतः सामान्य जन की भाषा प्राकृत के माध्यम से ही बोलना उचित है।
शब्दार्थ—अविद अविद=कष्ट है कष्ट है अथवा आश्चर्य है आश्चर्य है, चिर-संगीतोपासनेन=बहुत देर तक संगीतका अभ्यास करने के कारण, शुष्कपुष्करनालानीव=सूखे हुये कमलदण्ड के समान, मे=मेरे, अङ्गानि=अवयव, बुभुक्षया=भूख के कारण, म्लानानि=मुरझा [कुँभला] गये हैं; कुटुम्बिन्या=घर की मालकिन ने, उपपादितम्=बनाया है, न वेति=अथवा नहीं [बनाया है]; अपरम् इव=दूसरा ही, संविधानकम्=आयोजन, कार्यसम्पादन, आयामि-तण्डुलोदकप्रवाहा=चावलों के [धोने में] बहुत अधिक [प्रयुक्त] जल से व्याप्त; रथ्या=गली; लोहकटाह-परिवर्त्तनकृष्णसारा=लोहे की कड़ाही को [स्वच्छ करने के लिये] घुमाने-रगड़ने से कृष्णवर्णप्रधाना=चितकबरी, भूमिः=पृथ्वी, कृतविशेषका=तिलक लगायी हुयी, युवतिः=यौवन-सम्पन्ना स्त्री, इव=के समान, अधिकतरम्=और अधिक, शोभते=
१. उब्बणं—इति पाठे 'उत्पन्नम्' इति संस्कृतम् । २. प्राणाधिअं—इति पाठे 'प्राणाधिकम्' इति संस्कृतम् ।
प्रथमोऽङ्कः २३
खलु अस्माकं गृहे अपरमिव संविधानकं वर्त्तते ! आयामितण्डुलोदकप्रवाहा रथ्या, लौहकटाहपरिवर्तनकृष्णसारा कृतविशेषका इव युवती अधिकतरं शोभते भूमिः, स्निग्धगन्धेन उद्दीप्यमानेव अधिकं बाधते मां बुभुक्षा; तत् किं पूर्वविहितं निधानम् उपपन्नम् भवेत् ? अथवा, अहमेव बुभुक्षातः ओदनमयं जीवलोकं प्रेक्षे ! नास्ति किल प्रातराशोऽस्माकं गृहे, प्राणात्ययं बाधते मां बुभुक्षा; इह सर्वं नवमिव संविधानकं वर्त्तते; एका वर्णकं पिनष्टि, अपरा सुमनसो गुम्फति । ( विचिन्त्य ) किं नु इदम् ? भवतु, कुटुम्बिनीं शब्दायित्वा परमार्थं ज्ञास्यामि ( नेपथ्याभिमुखमवलोक्य ) आर्ये ! इतस्तावत् । )
अच्छी लग रही है; स्निग्धगन्धेन=[ पकवानों में प्रयुक्त घी की ] मनोहर गन्ध से; उद्दीप्यमाना=उद्दीप्त होती हुई, इव=सी, बुभुक्षा=भूख, बाधते=कष्ट दे रही है; पूर्वविहितम्=पूर्वजों द्वारा गाड़ा हुआ, निधानम्=खजाना, उपपन्नम्=प्राप्त, भवेत् =हो गया [ सम्भावना में लिङ् है ], बुभुक्षातः=भूख के कारण, ओदनमयम्=चावनों से भरा हुआ, प्रेक्षे=देख रहा हूँ; प्राणात्ययम्=प्राणों को लेलेने वाली बुभुक्षा=भूख, बाधते=कष्ट दे रही है, वर्णकम्=सुगन्धयुक्त द्रव्य को, पिनष्टि=पीस रही है, सुमनसः=फूलों को, गुम्फति=गूंथ रही है; शब्दाय्य=बुलाकर, परमार्थम्=वास्तविक स्थिति को, ज्ञास्यामि=जानता हूँ, या जानूंगा; इतस्तावत्=[ कृपया ] इधर आइये ।
**अर्थ—**खेद है, खेद है, बहुत देर तक संगीत का अभ्यास करने के कारण मेरे समस्त अंग सूखे हुये कमलनाल के समान म्लान=मुरझाये हुये हो गये हैं । तो तब तक [ इस कारण ] घर जा कर मालूम करता हूँ कि मेरी पत्नी ने [ खाने के लिये ] कुछ भी बनाया है अथवा नहीं । ( चारो ओर घूमकर और देखकर ) तो यह मेरा घर है; इसलिये [ इसमें ] प्रवेश करता हूँ । ( प्रवेश करके और देखकर ) आश्चर्य [ है ] । यह क्या दूसरा ही आयोजन [ कार्य की तैयारी ] हमारे घर पर हो रहा है । गली चावलों के धोने के पानी से भरी हुई है, लोहे की कढ़ाई [ को धोने ] के [ लिये ] रगड़ने से चितकबरी पृथ्वी, टिकली [ तिलक ] लगायी हुई युवती के समान, अत्यधिक अच्छी लग रही है । [ पकवानों में प्रयुक्त ] घी की खुशबू से प्रदीप्त हुई सी भूख मुझे और अधिक कष्ट दे रही है । तो क्या पूर्वजों का गाड़ा हुआ खजाना निकल आया है [ मिल गया है ] । अथवा मैं ही भूख के कारण सारे संसार को भात से परिपूर्ण देख रहा हूँ । हमारे घर में प्रातः कालीन भोजन [ नाश्ता ] नहीं है । भूख मुझे प्राणहारिणीरूप में [ जान ले लेनी वाली के रूप में ] कष्ट दे रही है । यहाँ [ घर में ] सब नया सा ही आयोजन [ तैयारी ] हो रहा है । एक ( कोई ) स्त्री [ केशर आदि ] सुगन्धित पदार्थ को पीस रही है । दूसरी फूलों को गूंथ रही है । ( सोच कर ) यह क्या ( हो
८४ मृच्छकटिकम्
रहा है ) ? अच्छा, गृहिणी [ घर की मालकिन ] को बुलाकर वास्तविक स्थिति का पता लगाता हूँ। ( नेपथ्य=पर्दे की ओर देखकर ) आर्ये ! इधर तो [ आना ] ।
टीका-अविद अविद=खेदाश्चर्ययोः बोधकमव्ययम्, शुष्कपुष्करनालानीव=शुष्काणि=नीरसानि यानि पुष्कराणि=कमलानि तेषाम्, नालानि इव=दण्डानि इव, म्लानानि=शिथिलानि, मे=मम सूत्रधारस्येत्यर्थः; कुटुम्बिन्या=भार्यया 'भार्या जायाऽथ पुंभूम्नि दाराः स्यात्तु कुटुम्बिनी ।' [ अमरकोषः २।६।६ ] उपपादितम् = विरचितं निर्मितं वा, अपरम् इव-अन्यत् किञ्चित् नवीनम् इव, सविधानकम्=आयोजनम्, आयामि-तण्डुलोदकप्रवाहा=तण्डुलानां प्रक्षालने प्रयुक्तमुदकं तण्डुलोदकम्, तस्य प्रवाहः=प्रसारः, आयामी=अतिविस्तृतः तण्डुलोदकप्रवाहो यस्यां सा तादृशी, रथ्या=गृहसम्मुखवर्ती मार्गः; लोहकटाह-परिवर्तन-कृष्णसारा=लोहकटाहस्य=लोह-निर्मितपात्रविशेषस्य प्रक्षालनार्थं विहितेन परिवर्तनेन=इतस्ततः सञ्चालनपूर्वकं-घर्षणेन, कृतविशेषका=कृतः=धृतः विशेषकः=तिलको यया सा तादृशी, युवती = युवतिः, इव, भूमिः=पृथ्वी, अधिकतरम्=अतीव, शोभते=शोभायमाना दृश्यते । स्निग्धगन्धेन=स्निग्धानाम्=घृतादौ पक्वानां भोज्यपदार्थानां सुगन्धेन, स्निग्धेन गन्धेन इति व्यस्तः पाठो नोचितः, बहुत्र समस्तपाठस्यैवो पलम्भात्, गन्धे स्निग्धताया अनुभवाभावाच्च; उद्दीप्यमाना=वृद्धिमुपगता, उद्दीप्तेति यावत्, इव=तुल्यम्, बुभुक्षा=प्रबला क्षुधा, बाधते=कष्टायते; ( पूर्वार्जितम्=पूर्वजैः अर्जितं भूमौ निहितम् ) पूर्वविहितम्=पूर्वजपुरुषैः भूमौ सङ्गोप्य सुरक्षितम्, निधानम्=निधिः, धनादिकोषः, उपपन्नम्=लब्धम्, उत्पन्नमिति पाठे प्रत्यक्षतामुपगतम्, भवेत्=स्यादिति सम्भावनायाम् । ओदनमयम्=ओदनयुक्तम्, अन्नमयमिति पाठे 'अन्नयुक्तम्' इत्यर्थः, प्रेक्षे=पश्यामि, पश्यामि-इति पाठान्तरम् । प्रातराशः=कल्यभोजनम्, प्राणात्ययम्=प्राणानामत्ययो विनाशो यथा स्यात् तथेति क्रियाविशेषणमिदम् 'प्राणाधिकम्' इति पाठे प्राणेषु अधिकं यथा स्यात् तथेति बोध्यम् । बाधते=दुःखायते, संविधानकम्=आयोजनम्, वर्णकम्=कस्तूर्यादिकं समालम्भनम्, पिनष्टि=चूर्णयति, सुमनसः=पुष्पाणि, गुम्फति=ग्रथ्नाति, तु=आश्चर्ये, कुटुम्बिनीम्=पत्नीम्, शब्दायित्वा=आहूय पृष्ट्वेति भावः, परमार्थम्=सत्यताम्, ज्ञास्यामि=जानामि, वेत्स्यामि वा, वर्तमानसामीप्ये वैकल्पिकौ लट्, इतः=इह आगच्छ, 'तावत्' इदं वाक्यालङ्कारे ।
विमर्श-शुष्कपुष्करनालानीव=जिस प्रकार कमलदण्ड सूखने पर अत्यन्त मलिन हो जाता है, उसी प्रकार भूख के कारण सूत्रधार के शरीरावयव शिथिल हो रहे हैं, उसे कुछ भी करने की इच्छा नहीं हो रही है—'बुभुक्षितं न प्रतिभाति किञ्चित्', ठीक ही कहा गया है ।
आर्ये !-नियमानुसार शिष्टाचार के लिए पुरुषपात्र स्त्री के लिए 'आर्ये' और स्त्रीपात्र पुरुष के लिये 'आर्य' यह सम्बोधन शब्द प्रयुक्त करते हैं 'वाच्यो
प्रथमोऽङ्कः २५
नटी--[ प्रविश्य ] अज्ज ! इमं म्हि ( आर्य ! इयमस्मि । )
सूत्र०--अज्जे ! साअदं दे । ( आर्ये ! स्वागतं ते । )
नटी--आणावेदु अज्जो, को णिओओ अणुचिट्ठीअदु त्ति ? ( आज्ञा-पयतु आर्यः, को नियोगोऽनुष्ठीयतामिति ।
नटीसूत्रधारौ आर्यनाम्ना परस्परम् ।" आयामितण्डुलोदकप्रवाहा--अधिक चावलों को धोने के लिये बहुत पानी उपयुक्त होने के बाद सड़कों पर बह रहा है । अथवा पके चावलों से निकाला गया मांड सड़क पर फैला हुआ यह भी अर्थ सम्भव है । कृतविशेषका युवती इव--जिस प्रकार कोई युवती टिकली लगाने पर सुन्दर लगती है, उसी प्रकार कड़ाही के नीचे का काला रंग पृथ्वी पर बीच बीच में लग गया है और वे चिह्न सुन्दर दिखाई दे रहे हैं । स्निग्धगन्धेन--विभिन्न प्रकार के पकवान बनाने में प्रचुर घी प्रयुक्त हुआ है, उसकी उत्कृष्ट गन्ध के द्वारा । स्निग्ध=स्नेहयुक्त, घृतादि से निर्मित पदार्थ भी स्निग्ध हैं, तेषां गन्धेन यह समस्त पाठ उचित है । स्निग्धेन गन्धेन-इस पाठ में अर्थ की संगति नहीं है ।
पूर्वविहितम्=पूर्वजों द्वारा संचित, पाठान्तर -पूर्वार्जितम्=पूर्वजों द्वारा उपार्जित करके गुप्त रूप से जमीन में गाड़ कर रखा गया, निधानम्=खजाना, उपपन्नम्=मिल गया, उत्पन्नम्=इस पाठ में निकल आया । ओदनमयम्=भात से व्याप्त, अन्नमयम् इस पाठ में अन्न से भरा हुआ । ओदनमय--इस कथन से और 'तण्डुलोदक' आदि कथन से उस समय चावलों का अधिक उपयोग सिद्ध होता है ।
'प्राणात्ययम्'--प्राणानामत्ययो=विनाशः यस्मिन् कर्मणि यथा स्यात् तथा--जिसमें प्राण निकल रहे हों ऐसी बाधा पहुंचाना, प्राणाधिकम् इस पाठ में जिसमें प्राण निकल रहे हों, उस रूप में बाधा पहुँचाना । वर्णक=सुगन्धित लेपन--
( कर्पूरागुरुकस्तूरीकक्कोलै-) र्यक्षकर्दमः ।
गात्रानुलेपनी वर्तिर्वर्णकं स्याद् विलेपनम् ।। अमरकोष २।६।१३३
शब्दायित्वा=शब्द कर के=बुला करके; 'शब्दं करोति'--इस अर्थ में नामधातु रूप में क्यङ् प्रत्यय करके बाद में क्त्वा प्रत्यय करना चाहिये । कुछ संस्करणों में 'शब्दाप्य' अथवा 'शब्दाय्य' यह पाठ भी है; परन्तु उपसर्गादि के साथ समास के अभाव में ल्यप्= य प्रत्ययान्त रूप का प्रयोग मानना उचित नहीं है । 'सद्दाविअ' इस प्राकृत रूप से मिलता जुलता रूप बनाने से उक्त भ्रान्ति हुई है ।
अर्थ--
नटी-- ( प्रवेश करके ) आर्य ! [ मैं ] यह [ उपस्थित ] हूँ ।
सूत्रधार आर्ये ! तुम्हारा स्वागत [ है ] ।
नटी-- आर्य ! आज्ञा दीजिये; [आपकी] किस आज्ञा का पालन किया जाय ।
२६ मृच्छकटिकम्
सूत्र०—अज्जे ! [ चिरसंगीदोवासणेण— इत्यादि पठित्वा ] अत्थि किंपि अम्हाणं गेहे असिदव्वं ण वेत्ति ? (आर्ये ! [ चिरसङ्गीतोपासनेन—इत्यादि पठित्वा ] अस्ति किमपि अस्माकं गेहे अशितव्यं न वेति ?)
नटी—अज्ज । सब्बं अत्थि । ( आर्य ! सर्वमस्ति । )
सूत्र०—किं किं अत्थि ? ( किं किमस्ति ? )
नटी—तं जधा,—गुड़ोदणं, घिअं, दहीं, तंडुलाइं, अज्जेण अत्तव्वं रसाअणं सब्बं अत्थि त्ति; एव्वं दे देवा आसासेन्दु । ( तन् यथा—गुड़ौदनं, घृतं, दधि, तण्डुलाः, आर्येण अत्तव्यं रसायनं सर्वमस्तीति; एवं ते देवा आशासन्ताम् )
सूत्र०—अज्जे ! किं अम्हाणं गेहे सब्बं अत्थि ? आहु परिहससि ? ( आर्ये ! किम् अस्माकं गेहे सर्वमस्ति ? अथवा परिहससि ? )
नटी—[स्वगतम्] परिहसिस्सं दाब । [प्रकाशम्] अज्ज अत्थि आबणे । ( परिहसिष्यामि तावत् । आर्य ! अस्ति आपणे । )
सूत्र—[ सक्रोधम् ] आः अणज्जे ! एव्वं दे आसा च्छिजिस्सदि, अभावं अ गमिस्ससि, अंदाणि अहं बरंडलंबुओ बिअ दूरं उक्खिविअ पाडिदो ।
सूत्रधार—आर्ये ! ( बहुत देर तक संगीत का अभ्यास करने के कारण — इत्यादि पूर्वोक्त वाक्य कह कर) — हमारे घर में खाने योग्य कुछ भी है, अथवा नही ?
नटी—आर्य ! सभी कुछ है ।
सूत्रधार—क्या-क्या है ?
नटी—वह इस प्रकार है—गुड़-भात, घी, दही, भात—आर्य के खाने योग्य सभी [ पूर्वोक्त ] रसमय ( सरस पदार्थ ) हैं । इस प्रकार देवता लोग तुम्हारे लिये आशीर्वाद दें ।
सूत्रधार—आर्ये ! क्या हमारे घर में यह सब कुछ है ? अथवा परिहास कर रही हो ? [ मजाक उड़ा रही है ? ]
नटी—(स्वगत)—तो परिहास करूँगी । (प्रकट रूप में) आर्य ? बाजार में है ।
सूत्रधार—( क्रोधपूर्वक ) अरी दुष्टे ! जैसे मैं इस समय बाँस में बन्धे मिट्टी के ढेले के समान दूर तक ऊपर उठा कर [ नीचे ] गिरा दिया गया उसी प्रकार तुम्हारी भी आशा भंग होगी, और अभाव [ विनाश ] को प्राप्त करोगी ।
टीका—प्रविश्य=रंगमञ्चे आगत्य, इयमस्मि—अहम् उपस्थिता—इति शेषः । स्वागतम्=शोभनम् आगमनम्, नियोगः=आज्ञा, आदेशः, अनुष्ठीयताम्=
प्रथमोऽङ्कः २६
नटी—अहिरुबबदो णाम । ( अभिरूपपतिर्नाम । )
सूत्र०—अज्जे ! इहलोइओ, आदु पारलोइओ ? (आर्ये ! इहलौकिकः, अथवा पारलौकिकः ? )
नटी—अज्ज ! पारलोइओ । ( आर्य ! पारलौकिकः । )
सूत्र०—पेक्खंतु पेक्खंतु अज्जमिस्सा ! मइएण भत्तपरिव्वएण पारलोइओ भत्ता अन्णेसीअदि । ( प्रेक्षन्तां प्रेक्षन्ताम् आर्यमिश्राः ! मदीयेन भक्तपरिव्ययेन पारलौकिको भर्ता अन्विष्यते ! )
नटी—अज्ज ! पसीद पसीद; तुमं ज्जेव मम जम्मंतरेवि भत्ता भविस्ससि त्ति उबबसिदम्हि ( आर्य ! प्रसीद प्रसीद, त्वमेव मम जन्मान्तरेऽपि भर्ता भविष्यसि इत्युपोषिताऽस्मि ।
विमर्श—मृष्यतु—तितिक्षा=सहन करना अर्थवाली दिवादिगणीय √मृष्+ लोट् प्र पु. ए. व. । सम्भ्रम अथवा वीप्सा में द्वित्व है। पिनष्टि—संचूर्णन अर्थवाली रुधादिगणीय √पिष्लृ=पिष्+लट् प्र. पु. ए. व. । सुमनसः=पुष्प—"( स्त्रियः ) सुमनसः पुष्पं प्रसूनं कुसुमं समम् । अमरकोष—२।४।१७ इसके अनुसार स्त्रीलिङ्ग बहुवचन है। पञ्चवर्ण-कुसुमोपहार-शोभिता—पीले, लाल, सफेद, हरे एवं नीले रंग के फूलों को पूजन में प्रयुक्त करने के कारण पृथ्वी शोभायमान लग रही है। पञ्चवर्णानाम् कुसुमानाम् उपहारेण शोभिता—तत्पु० । उपवासः=उप √वस् +घञ् भोजनपरित्याग=व्रत । किंनामधेयः=किस नाम वाला 'भागरूपनामभ्यो धेयः, इस वार्त्तिक से स्वार्थ में 'नाम' शब्द से 'धेय' प्रत्यय हुआ है ।
अर्थ—
नटी— अभिरूपपति नामक व्रत है । [इसे करने से सुन्दर पति प्राप्त होता है]
सूत्रधार—आर्ये ! इस लोक में होने वाला अथवा परलोक में होने वाला ( पति मिलता है ) ?
नटी—आर्य ! परलोक में होने वाला [ पति मिलता है ] ।
सूत्रधार [ क्रोधपूर्वक ] सम्माननीय महानुभावो ! देखिये, देखिये, मेरे भात के व्यय द्वारा परलोक में होने वाला पति ढूंढ़ा जा रहा है ।
नटी—आर्ये ! प्रसन्न हों, प्रसन्न हों । दूसरे जन्म में भी तुम्हीं मेरे पति बनोगे, इसलिये उपवास कर रही हूँ ।
टीका—अभिरूपपतिः=अभिलक्ष्यं रूपमस्य=अभिरूपः=विद्वान् सुन्दरश्च 'अभिरूपो बुधे रम्ये' इति मेदिनी, अभिरूपः पतिर्यस्मात् सः, पञ्चम्यर्थे बहुव्रीहिः, अस्यानुष्ठात् वैदुष्य-सौन्दर्योभययुक्तः पतिर्लभ्यते इत्यर्थः । इहलौकिकः=इह लोके भवः, अत्र "अनुशतिकादीनाञ्च [ पा. सू. ७।३।२० ] इत्यनेन उभयपदवृद्धया ऐहलौकिक
३० मृच्छकटिकम्
सूत्र०—अअं उववासो केण दे उवदिट्ठो ? (अयमुपवासः केन ते उपदिष्टः ?)
नटी—अज्जस्स ज्जेव पिअवअस्सेण चुण्णबुड्ढेण । ( आर्यस्यैव प्रियवयस्येन चूर्णवृद्धेन । )
इति रूपमेव साधु बोध्यम्, न तु इहलौकिक इति। पारलौकिकः=परलोके भवः, उभयत्र 'अध्यात्मादेष्ठञिष्यते' इति वार्त्तिकात् ठञि एकादेशे उभयपदवृद्धौ रूपं सिध्यति। प्रेक्षन्ताम्=अवलोकयन्तु, आर्यमिश्राः=माननीयाः सभायां विराजमानाः, भक्तपरिव्ययेन=भक्तस्य दानादावुपयोगेन, पारलौकिकः=स्वर्गादौ भवः देवादिरूपः, भर्त्ता=पतिः, अन्विष्यते=मृग्यते। प्रसीद, प्रसीद=प्रसन्नो भव, प्रसन्नो भव, जन्मान्तरेऽपि=अन्यत् जन्म=जन्मान्तरम् तत्र, त्वमेव मम पतिः स्याः इत्येतदर्थमयमपवासः क्रियते—
पूर्वजन्मनि या विद्या पूर्वजन्मनि यद्धनम्।
पूर्वजन्मनि या नारी अग्रे धावति धावति ॥
इति वचनमनुसृत्य साम्प्रतं भवतः सौन्दर्यादिवृद्ध्यर्थं कुरूपतापरिहारार्थञ्च मयाऽयमुपवासः गृहीत इति भवता न क्रोद्धव्यम्। उपोषिता=गृहीतोपवासा, अस्मि=भवामि।
विमर्श—अभिरूपपतिः—'अभिरूपो बुधे रम्ये' इस मेदिनीकोष के अनुसार सुन्दर एवं विद्वान् 'अभिरूप' होता है। इसीलिये 'अनुरूप' शब्द की अपेक्षा 'अभिरूप' शब्द का प्रयोग सुन्दर है। अभिरूपः पतिर्यस्मात्=यदनुष्ठानात् स अभिरूपपतिः। जिसके अनुष्ठान से सुन्दर और विद्वान् पति प्राप्त होता है, वैसा व्रत=उपवास है। उपवास - उपोष्यतेऽस्मिन् तत् — इस अधिकरण अर्थ में उप √ + वस् + घञ् है; और व्रत का विशेषण है, उपवासरूप व्रत। इहलौकिकः—यह अशुद्ध है क्योंकि इहलोके भवः—इस अर्थ में 'अध्यात्मादेष्ठञिष्यते' वार्त्तिक से ठञ = इक करने पर 'अनुशतिकादीनाञ्च' [ पा. सू. ] सूत्र से उभयपद की वृद्धि होनी चाहिये। अतः ऐहलौकिकः यही रूप शुद्ध है। आर्यमिश्राः — इसकी व्याख्या प्रारम्भ में सूत्रधार के व्याख्यान के समय की जा चुकी है। भक्तपरिव्ययेन=मेरे भात को खर्च करके परलोक में होने वाले देवता आदि को पतिरूप में प्राप्त करने की इच्छा अनुचित है। त्वमेव जन्मान्तरेऽपि……भविष्यसि। नटी का आशय यह है कि आप को ही अगले जन्म में पतिरूप में चाहती हूँ, इसीलिये यह व्रत कर रही हूँ, दूसरे पति की कामना से नहीं। अतः आपको नाराज नहीं होना चाहिये।
अर्थ—
**सूत्रधार—**यह, उपवास तुम्हें किसने बताया ?
**नटी—**आपके ही प्रिय मित्र जूर्णवृद्ध ने [ यह उपवास मुझे बताया है ] ।
प्रथमोऽङ्कः ३१
सूत्र०---[सकोपम् ।] आः दासीए पुत्ता चुण्णबुड्ढा ! कदा णु क्खु तुमं कुविदेण रण्णा पालएण णवबहूकेसकलावं विअ सुअन्धं कपिज्जन्तं (बज्झन्तं) पेक्खिस्सम् । (आः दास्याः पुत्र चूर्णवृद्ध ! कदा नु खलु त्वां कुपितेन राज्ञा पालकेन नववधूकेशकलापमिव सुगन्धं छेद्यमानं ( वध्यमानं ) प्रेक्षिष्ये ! )
नटी---पसीददु पसीददु अज्जो ? णं अज्जस्स ज्जेव पारलोइओ अअं उववासो अणुचिट्ठीअदि । (प्रसीदतु प्रसीदतु आर्यः। ननु आर्यस्यैव पारलौकिकः अयमुपवासः अनुष्ठीयते ।) [ इति पादयोः पतति । ]
सूत्रधार---[ कोप के साथ ] अरे दासी के बच्चे चूर्णवृद्ध ! क्रुद्ध राजा पालक द्वारा, नववधू के सुगन्धित केशपाश के समान, काटे [ चीरे ] जाते हुये, तुम्हें कब देखूँगा ? [ अर्थात् वह दिन कब आयेगा जब राजा पालक तुम्हें काट रहे होंगे और मैं देख रहा होऊँगा ] ।
नटी---आर्य प्रसन्न हों, प्रसन्न हों, यह पारलौकिक [ परलोक में फल देने वाला ] उपवास आप के लिये ही [ किया जा रहा है, किसी अन्य के लिये नहीं ] । [ इस प्रकार कहकर पैरों पर गिर पड़ती है । ]
टीका---उपदिष्टः=बोधितः, आर्यस्यैव=भवतः एव न ममेत्यर्थः प्रियवयस्येन=प्रियमित्रेण न तु रिपुणेत्यर्थः, चूर्णवृद्धेन=एतन्नामकेन, औषधिचूर्णादीनां विक्रयेण वृद्धिमुपगतेन सार्थकानामकेनेति भावः, सकोपम्=कोपसहितम्, दास्याः पुत्र=दास्याः सुत, गालिदानमिदम्; पालकेन=एतन्नामकेन राज्ञा=नृपेण, नववधूकेशकलापम् इव=नवोढायाः केशसमूहम् इव, छेद्यमानम्=छिन्नं क्रियमाणं कदा=कस्मिन् काले, प्रेक्षिष्ये=अवलोकयिष्ये ? अत्र 'कपिञ्जन्तम्' इत्यस्य 'छेद्यमानम्' वधूपक्षे 'कल्प्यमानम्=संस्कृज्यमानम्, 'वज्जन्तम्' इति पाठे वध्यमानमित्यर्थो बोध्यः । अनेनेदं सूच्यते--शकारेण वसन्तसेनायाः मारणम् तस्याः हत्याया आरोपे चारुदत्तस्य निग्रहः । किञ्च--यथा पालको राजा अतीव निष्ठुरः नववधूकेशकलापानामुच्छेदनेऽपि न किञ्चिद् विचारयति तथैव तव वधेऽपि नैव किञ्चिदपि विचारयिष्यतीति भावः । आर्यस्यैव=भवतः कृते एवायमुपवासः क्रियतेऽतो न क्रोद्धव्यम् ।
विमर्श---आर्यस्यैव प्रियवयस्येन--नटी का आशय यह है कि आप के ही हितचिन्तक मित्र ने मुझे यह 'अभिरूपपति' नामक उपवास बताया है; अतः इसके अनुष्ठान में आप को किसी प्रकार का सन्देह नहीं करना चाहिये । दास्याः पुत्र-- प्राचीन काल में गाली के लिये यह शब्द था । आज कल भी लोकभाषा में ऐसे अनेक शब्द प्रचलित हैं । "पुत्रेऽन्यतरस्याम्" [ पा. सू. ६ । ३ । २२ ] सूत्र से निन्दा अर्थ में षष्ठी का वैकल्पिक अलुक्=लोपाभाव होता है । अतः यहाँ समास है । नव-वधू-केशकलापमिव--केशानां कलापः=समूहः, नवा चासौ वधूश्च--नववधूः
| ३२ | मृच्छकटिकम् |
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**सूत्र०--**अज्जे ! उठ्ठेहि, उठ्ठेहि ! कहेहि, कहेहि एत्थ उपवासे केण कज्जं ? ( आर्ये ! उत्तिष्ठ उत्तिष्ठ, कथय कथय-अत्र उपवासे केन कार्यम् ? )
**नटी--**अम्हारिसजणजोगेण बम्हणेण उवणिमन्तिदेण ( अस्मादृश-जनयोगयेन ब्राह्मणेन उपनिमन्त्रितेन । )
**सूत्र०--**तेण हि गच्छदु अज्जा । अहं पि अम्हारिसजणजोग्गं बम्हणं उपणिमन्तेमि । ( तेन हि गच्छतु आर्या । अहमपि अस्मादृशजनयोग्यं ब्राह्मण-मुपनिमन्त्रयामि । )
**नटी--**जं अज्जो आणवेदि । ( इति निष्क्रान्ता ) । ( यदार्य आज्ञापयति । )
सूत्र०--(परिक्रम्य ।) हीमाणहे ! ता कधं मए एव्वं सुसमिद्धाए उज्जयिणीए अम्हारिसजणजोग्गो बम्हणो अण्णेसितव्वो । ( विलोक्य ) । एसो चारुदत्तस्स मित्तं मित्तेओ इदो ज्जेव आअच्छति । भोदु, पुच्छिस्सं दाव । अज्ज मित्तेअ ! अम्हाणं गेहे असिदं अग्गणी भोदु अज्जो । ( आश्चर्यम् ? तत् कथं मया एवं
तस्याः केशकलापम्—नवीन परिणीता वधू के केशकलाप जिस प्रकार सुगन्धित तैलादि युक्त होते हैं और उनको काटने में राजा पालक की रुचि है, उसी प्रकार जूर्णवृद्ध के सिर को काटने में भी उसे आनन्द ही आयेगा। आर्यमैत्रेय—नटी का अभिप्राय यह है कि यह उपवास आपके सम्बन्ध में ही है; आपको ही भावी जन्म में भी पतिरूप से प्राप्त करने की इच्छा से यह व्रत कर रही हूँ। अतः आपको क्रुद्ध नहीं होना चाहिये।
**अर्थ--सूत्रधार—**आर्ये ! उठो, उठो, बताओ, बताओ—इस उपवास में किस प्रकार की आवश्यकता है ? [ अर्थात् क्या क्या पदार्थ चाहिये । ]
नटी--[ निर्धन ] हमलोगों के योग्य ब्राह्मण को निमन्त्रित करने की आवश्यकता है।
**सूत्रधार—**तो आर्या आप जाइये । मैं भी [ निर्धन ] हमलोगों के योग्य ब्राह्मण को उपनिमन्त्रित करता हूँ । [ भोजन के लिये बुलाता हूँ । ]
**नटी—**श्रीमान् की जैसी आज्ञा । [ ऐसा कह कर चली जाती है । ]
सूत्रधार—( घूमकर ) आश्चर्य ! तो कैसे इस सुसमृद्ध उज्जैन नगरी में मैं [निर्धन] अपने योग्य ब्राह्मण को खोजूँ । ( देख कर ) चारुदत्त का मित्र यह मैत्रेय इधर ही आ रहा है ! अच्छा, तो उससे पूछता हूँ । आर्य मैत्रेय ! श्रीमान् जी ( आज ) मेरे घर भोजन करने के लिये पधारें ।
**टीका--**अत्र=अस्मिन् उपवासे, केन=पदार्थेन, कीदृशेन पुरुषविशेषेण वा, कार्यम्=प्रयोजनम्, साध्यमिति शेषः । अस्मादृशजन-योग्येन=अस्मत्सदृशस्य निर्धनस्य जनस्यानुरूपेण, अस्मन्निमन्त्रणस्वीकारकत्र्रेत्यर्थः, उपनिमन्त्रितेन=भोजन-
प्रथमोऽङ्कः ३३
(नेपथ्ये)
भोः ! अण्णं बम्हणं उवणितन्तेदु भवं । वाबुदो दाणि अहं ।
( भोः ! अन्यं ब्राह्मणमुपनिमन्त्रयतु भवान् । व्यापृत इदानीमहम् । )
करणायाहूतेन कार्यमस्तीति शेषः । सुस्वादुभोज्यप्रिया ब्राह्मणाः निर्धनस्य गृहे किं मिलिष्यतीति विचार्य निमन्त्रणं नैव स्वीकरिष्यन्तीति भावः । तेन=यदि एतावत्-कार्यमस्ति तदा, अहमपि=सूत्रधारोऽपि, अस्मादृग्जनयोग्यम्=निर्धनमिति भावः, उपनिमन्त्रयामि=उपनिमन्त्रितं करोमि, वर्तमानसामीप्ये भविष्यत्काले लट् बोध्यः, सुसमृद्धायाम्=विपुलवैभवपरिपूर्णायाम्, उज्जयिन्याम्=अवन्त्याम्, अन्वेष्टव्यः=अन्वेषणीयः । अत्र नगर्यां निर्धनो निर्धनगृहे भोक्ता च ब्राह्मणः न सारल्येन लभ्यः । चारुदत्तस्य=एतत्प्रकरणनायकस्य, मित्रम् वयस्यः, मैत्रेयः=एतन्नामको विदूषक इत्यर्थः । चारुदत्तः निर्धनतामुपगतः अतस्तदीये गृहे नित्यं भुञ्जानो मैत्रेयः अद्य मम गृहेऽपि भोक्तुमागन्तुं शक्नोतीति भावः । अशितुम्=भोक्तुम्, अग्रणीः=अग्रेसरः, भवतु=स्यात्, प्रार्थनायां लोट् । 'अग्रणीः' इति कथनेन अन्येपि ब्राह्मणाः भोक्ष्यन्ते इति सूच्यते । 'अग्रे नयती' त्यर्थे "सत्सूद्विषद्रुहद्रुहयुज्विद्भिद-च्छिदजिनीराजामुपसर्गेऽपि क्विप्' ( पा० सू० ३।२।६१ ) इत्यनेन क्विपि सर्वा-पहारिलोपे, 'अग्रग्रामाभ्यां नयतेर्णो वाच्यः' इति णत्वे सिद्ध्यति ।
विमर्श--ब्राह्मणेन उपनिमन्त्रितेन—उपवास का पारण करने के पूर्व ब्राह्मणों को भोजन कराना आवश्यक है । नटी अपनी निर्धनता को देख कर यह कहना चाहती है कि ऐसे ब्राह्मण को भोजन के लिये उपनिमन्त्रित करो, जो स्वीकार कर ले, और समय पर आ जाय । सुसमृद्धायामुज्जयिन्याम् यह उज्जैन नगरी अत्यन्त समृद्ध लोगों से परिपूर्ण है । यहाँ कोई भी निर्धन नहीं दिखाई देता है । अतः मुझ जैसे गरीब के घर भोजन करने वाला ब्राह्मण खोज पाना बहुत कठिन कार्य है । चारुदत्तस्य मित्रं मैत्रेयः--चारुदत्त एक सम्पन्न व्यक्ति था इस समय भाग्यवश निर्धन हो गया है । अतः उसके यहाँ सदा भोजन करनेवाला मैत्रेय ब्राह्मण भूखा रहता होगा । वह मेरे घर भोजन कर सकता है । अतः सूत्रधार उसे ही उपनिमन्त्रित करना चाहता है । अग्रणीर्भवतु--प्रधान ब्राह्मण बन जाइये । इससे अन्य ब्राह्मणों का भी भोजन करना सिद्ध होता है । 'अग्रे नयति' इस अर्थ में √ नी + क्विप्, सर्वापहारी लोप और णत्व करने पर 'अग्रणी' शब्द सिद्ध होता है ।
( पर्दे के पीछे )
अर्थ--अरे ! आप किसी दूसरे ब्राह्मण को उपनिमन्त्रित करें। मैं इस समय [ किसी अन्य कार्य में ] लगा हुआ हूँ ।
३ मृ०
३४ मृच्छकटिकम्
सूत्र०—अज्ज ! सम्पष्णं भोअणं णीसवत्तं अ । अवि अ दक्खिणा कावि दे भविस्सदि । (आर्य ! सम्पन्नं भोजनम्, निःसपत्नञ्च । अपि च, दक्षिणा कापि ते भविष्यति ।)
(पुनर्नेपथ्ये)
भोः ! जं दाणि पढमं ज्जेव पच्चादिट्ठोसि, ता को दाणि दे णिब्बन्धो पदे पदे मं अणुबन्धेदूम् । (भोः ! यदिदानीं प्रथममेव प्रत्यादिष्टोऽसि; तत् क इदानीं ते निर्बन्धः पदे पदे मामनुबन्धुम् ।)
सूत्र०—पच्चादिट्ठोम्हि एदिणा । भोदु, अण्णं बम्हणं उवणिमन्तेमि । (प्रत्यादिष्टोऽस्मि एतेन । भवतु, अन्यं ब्राह्मणमुपनिमन्त्रयामि ।) (इतिनिष्क्रान्तः ।)
[ इति आमुखम् । ]
सूत्रधार— श्रीमन् ! अच्छा और प्रतिपक्षी-रहित भोजन है । तथा आपके लिये कुछ दक्षिणा भी होगी ।
**टीका—नेपथ्ये=**अन्तर्जवनिकायाम्, **अहम्=**मैत्रेयः, **इदानीम्=**अस्मिन् काले, **व्यापृतः,=**कार्यान्तरे संलग्नः, **सम्पन्नम्=**उत्कृष्टम्, **निःसपत्नम्=**शत्रुरहितम्, **भोजनम्=**अशनम्, **केचित्तु सम्पन्नमित्यस्य प्रस्तुतमित्यर्थः । दक्षिणा=**भोजनानन्तरं ब्राह्मणेभ्यो देयं द्रव्यम् । एवञ्च सुस्वादु विभाजकरहितं भोजनमेव नैव, अपि तु दक्षिणालाभोऽपि भविष्यति । तस्मादवश्यमेव मम गृहे भोक्तव्यमिति भावः ।
विमर्श— मैत्रेय अपनी व्यस्तता के कारण भोजन नहीं करना चाहता है—इसी लिये कहता है—व्यापृत इदानीम् । सम्पन्नम् और निःसपत्नम् ये दोनों भोजन के विशेषण हैं । उत्कृष्ट कोटि का स्वादिष्ट भोजन है और आप ही प्रधान ब्राह्मण हैं अतः इसमें किसी दूसरे का हिस्सा भी नहीं होगा। साथ ही दक्षिणा भी मिलेगी । अतः भोजन के लिये तैयार हो जांय । हर दृष्टि से लाभ है ।
( पुनः पर्दे के पीछे )
अर्थ— अरे ! अभी पहले ही अस्वीकार कर दिये गये हो, तो इस समय पद पद पर मुझसे अनुरोध करने का तुम्हारा यह हठ कैसा है ।
सूत्रधार— इसने मुझे अस्वीकृति दे दी है । अच्छा, किसी दूसरे ब्राह्मण को उपनिमन्त्रित करता हूँ । ( ऐसा कहकर निकल जाता है ।)
( इस प्रकार प्रस्तावना समाप्त होती है । )
**टीका—प्रथमम्=**पूर्वम्, **एव=**निश्चितरूपेण, **प्रत्यादिष्टः=**निराकृतः, **असि, इव प्रार्थनाऽस्वीकृतेति भावः, तत्=**तस्मात्, **पदे पदे=**प्रतिपदम्, पुनः पुनरिति वा, **माम्=**मैत्रेयम्, **अनुबन्धुम्,=**अनुरोधुम्, निमन्त्रयितुमिति वा, **ते=**सूत्रधारस्य, **कः=**कीदृशः,