भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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२२मृच्छकटिकम्

अविद अविद भोः ! चिरसंगीदोवासणेण सुक्खपोक्खरणलाई विअ मे बुभुक्खाए मिलाणाई अंगाई, ता जाव गेहं गदुअ आणामि, अत्थि किंपि कुटुंबिणीए उवबादिदं ण वेत्ति । [ परिक्रम्यावलोक्य च ] एदं तं अम्हाणं गेहं, ता पबिसामि । [ प्रविश्यावलोक्य च ] हीमाणहे ! किं णु खु अम्हाणं गेहे अवरं विअ संविहाणं बट्टदि ! आआमितंडुलोदअप्पबाहा रच्छा, लोहकड़ाहपरिवत्तणकसणसारा किदबिसेसआ विअ जुअदी अहिअदरं सोहदि भूमी, सिणिद्धगंधेण उद्दीवती विअ अहिअं बाधदि मं बुभुक्खा; ता किं पुव्वविहिदं णिहाणं उबवण्णं^१ [ उब्बण्णं ] भवे ? आदू अहं ज्जेब बुभुक्खादो ओदणमअं जीअलोअं पेक्खामि ! णत्थि किल पादरासो अम्हाणं गेहे, पाणाच्चअं^२ बाधेदि मं बुभुक्खा, इध सब्वं णवं विअ संविहाणं बट्टदि, एका बण्णअं पीसेदि, अबरा सुमणाई गुंफेदि । [ विचिन्त्य ] किं ण्णेदं ? भोदु, कुटुम्बिणीं सद्दाबिअ परमत्थं जाणिस्सं । [नेपथ्याभिमुखमवलोक्य] अज्जे ! इदो दाव । ( अविद अविद भोः ! चिरसङ्गी-तोपासनेन शुष्कपुष्करनालानीव मे बुभुक्षया म्लानानि अङ्गानि, तत् यावत् गृहं गत्वा जानामि, अस्ति किमपि कुटुम्बिन्या उपपादितं न वेति । ( परिक्रम्यावलोक्य च ) इदं तदस्माकं गृहं, तत् प्रविशामि । ( प्रविश्यावलोक्य च ) आश्चर्यम् ! किं नु


में वार्ता करनी चाहिये, यह नियम है। प्रयोगवशात्—नाटक में जो अभिनय करना है, तदनुसार सूत्रधार प्राकृत भाषाभाषी बन रहा है। यहाँ सूत्रधार को एक निर्धन व्यक्ति का अभिनय करना है अतः सामान्य जन की भाषा प्राकृत के माध्यम से ही बोलना उचित है।

शब्दार्थ—अविद अविद=कष्ट है कष्ट है अथवा आश्चर्य है आश्चर्य है, चिर-संगीतोपासनेन=बहुत देर तक संगीतका अभ्यास करने के कारण, शुष्कपुष्करनालानीव=सूखे हुये कमलदण्ड के समान, मे=मेरे, अङ्गानि=अवयव, बुभुक्षया=भूख के कारण, म्लानानि=मुरझा [कुँभला] गये हैं; कुटुम्बिन्या=घर की मालकिन ने, उपपादितम्=बनाया है, न वेति=अथवा नहीं [बनाया है]; अपरम् इव=दूसरा ही, संविधानकम्=आयोजन, कार्यसम्पादन, आयामि-तण्डुलोदकप्रवाहा=चावलों के [धोने में] बहुत अधिक [प्रयुक्त] जल से व्याप्त; रथ्या=गली; लोहकटाह-परिवर्त्तनकृष्णसारा=लोहे की कड़ाही को [स्वच्छ करने के लिये] घुमाने-रगड़ने से कृष्णवर्णप्रधाना=चितकबरी, भूमिः=पृथ्वी, कृतविशेषका=तिलक लगायी हुयी, युवतिः=यौवन-सम्पन्ना स्त्री, इव=के समान, अधिकतरम्=और अधिक, शोभते=


१. उब्बणं—इति पाठे 'उत्पन्नम्' इति संस्कृतम् । २. प्राणाधिअं—इति पाठे 'प्राणाधिकम्' इति संस्कृतम् ।