भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः २१

दिनकरः=मध्याह्नसूर्यः, तस्य किरणैः=रश्मिभिः, उच्छुष्कम्=सर्वथोपजातशोषम्, पुष्करस्य=कमलस्य, बीजम्=कमलदलमध्ये विद्यमानं बीजम्, इव=तुल्यम्, प्रचलिततारके=चञ्चलतामुपगते तारके=कनीनिके ययोः ते, मम=सूत्रधारस्य, अक्षिणी=नेत्रे, क्षुधा=बुभुक्षया, खटखटायेते=खटत् खटत् इति शब्दं कुरुतः; तत् यावत्=तस्मात् कारणात्, गृहिणीम्=भार्याम्, आहूय=सम्बोध्या, पृच्छामि=पृच्छां करोमि, प्रातराशः=कल्यभोजनम्, प्रातः अश्यते=भुज्यते इति प्रातराशः; कार्यवशात्=कार्यम्=बोधनीयायाः स्त्रियो झटिति ज्ञानम्, तस्य वशात्=कारणात्, स्त्रीत्वेन भार्या प्राकृत-भाषां सरलतया शीघ्रमेव ज्ञास्यतीति भावः; प्रयोगवशात्=नाट्यप्रयोगस्य नियमात्, प्राकृतभाषा-भाषी=प्राकृतभाषा-प्रयोक्ता, संवृत्तः=सञ्जातः, अत्र च “स्त्रीषु ना प्राकृतं वदेत् ।” “पुरुषाः संस्कृतजल्पाः प्राकृतगुम्फोऽपि भवति सुकुमारः ।” “कार्यत-श्चोत्तमादीनां कार्यो भाषाव्यतिक्रमः ।” इत्यादिवचनानुरोधेन स सूत्रधारः नटीं प्रति प्राकृतभाषाप्रयोगमेवोचितं मनुते इति बोध्यम् ।

विमर्श—प्रचलिततारके-जिस प्रकार भीषण ग्रीष्मकाल में कमलपुष्प सूख जाते हैं और उनके भीतर के बीज हिलने पर आवाज करने लगते हैं उसी प्रकार कमलतुल्य नेत्रों में रहने वाली पुतलियाँ भी भूखके कारण चलते रहने से शब्द कर रहीं हैं । खट-खटायेते खटत् इस प्रकार के अव्यक्त शब्दानुकरण के लिये इसका प्रयोग है । खटत् भवति—इस विग्रह में “अव्यक्तानुकरणाद् द्व्यजवरार्धादनितौ डाच्” [पा. सू. ५।४।५७ ] सूत्र से डाच्=आ प्रत्यय होता है और 'डाचि विवक्षिते बहुलं द्वे भवतः' इस नियम से द्वित्व होता है -खटत् + खटत् + आ, इस अवस्था में 'नित्यमाम्रेडिते डाचीति वक्तव्यम्' नियम से तकार और खकार का पररूप होने पर 'खटखटत् + आ बनता है डित् प्रत्यय परे होने से टि=अत् का लोप होने पर 'खटखटा' यह निष्पन्न होता है । “लोहिताडाग्भ्यः क्यष्” [ पा. सू. ३।१।१३ ] इस नियम से क्यष्=य प्रत्यय होने पर – “वा क्यषः” [ पा. सू. १।३।६० ] से वैकल्पिक आत्मनेपद होकर प्रथम पुरुष द्विवचन का रूप सिद्ध होता है । पुतलियों में ऐसी ध्वनि नहीं होती है, अतः यह क्रियापद उचित नहीं है, इसकी अपेक्षा और कोई अनुकरण-वाची शब्द रखना चाहिये था । ‘बीजम् इव अक्षिणी’ इस प्रयोग में उपमान एकवचन और उपमेय द्विवचन का प्रयोग भी अच्छा नहीं है । पृथ्वीधर ने खटखटायेते इस पर यह लिखा है—“संगीतकेन चक्षुषी खटखटायेते इत्यसम्बद्ध-प्रलापेन भाविनः शकारासम्बद्धभाषणस्य सूचनम् ।” अतः इस पद पर विशेष आलोचना अनावश्यक है ।

प्रातराशः-—प्रातः काले अश्यते इति प्रातराशः-कल्यभोजनम् ।

**कार्यवशात्—**यहाँ अपनी भार्या के साथ वार्ता करना कार्य है न कि नाटक का कार्य । क्योंकि ‘स्त्रीषु ना प्राकृतं वदेत्’ पुरुष पात्र को स्त्रियों से प्राकृत भाषा