मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २० | मृच्छकटिकम् |
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कृतञ्च सङ्गीतकं मया। अनेन चिरसङ्गीतोपासनेन ग्रीष्मसमये प्रचण्डदिनकरकिरणोच्छुष्कपुष्करबीजमिव प्रचलिततारके क्षुधा ममाक्षिणी खटखटायेते, तत् यावत् गृहिणीमाहूय पृच्छामि-अस्ति किञ्चित् प्रातराशो न वेति। एषोऽस्मि भोः ! कार्य्यवशात् प्रयोगवशाच्च प्राकृतभाषी संवृत्तः-
अपुत्रस्य--अविद्यमान्र: पुत्रो यस्यः सः, बहुव्रीहि है। चिरशून्यम्=चिरंशून्यम्-यह कर्मधारय हैं।
इसमें आर्या छन्द है। लक्षण--
यस्याः पादे प्रथमे द्वादश मात्रास्तथा तृतीयेपि।
अष्टादशद्वितीये चतुर्थके पञ्चदश साऽऽर्या ॥ ८ ॥
शब्दार्थ-मया=मैंने [सूत्रधारने] सङ्गीतकम्=गाना, बजाना और नाचना; कृतम्=सम्पादित कर लिया, अनेन=इस, चिरसङ्गीतोपासनेन=अधिक देर तक सङ्गीत के उपासन-अभ्यास से, ग्रीष्मसमये=गर्मी के दिनों में, प्रचण्ड-दिनकर-किरणोच्छुष्कपुष्कर-बीजम् इव=अत्यधिक तपते हुये सूर्य की किरणों से सूखे हुये कमल के बीज के समान, प्रचलिततारके=चञ्चल पुतलियों वाली, मम=मेरी [सूत्रधार की], अक्षिणी=आंखें, क्षुधा=भूख से, खटखटायेते-खट खट [शब्द] कर रहीं हैं, तत्=इसलिये, यावत्=वाक्यालङ्कार में प्रयुक्त अव्यय, गृहिणीम्=घर की मालकिन नटी को, आहूय=बुलाकर, पृच्छामि=पूछता हूँ; किञ्चित्-प्रातराशः=कुछ भी सबेरे का जलपान, अस्ति=है, न वा=अथवा नहीं। भोः=अरे भाइयो !; एषः=यह, [ अहम्=मैं ], कार्य्यवशात्=प्रयोजनवश, च=और प्रयोगवशात्=नाट्यप्रयोग के कारण, प्राकृतभाषी=प्राकृत भाषा बोलने वाला, संवृत्तः=बन गया, अस्मि=हूँ।
अर्थ-मैंने संगीतक (गीत, नृत्य और वाद्य का) कार्य पूरा कर लिया है। अधिक देर तक इस संगीत का अभ्यास करने के कारण भूख लगने से चंचल पुतलियों वाली मेरी आंखें उसी प्रकार खट खट आवाज कर रहीं हैं जिस प्रकार गर्मी के दिनों में प्रचण्ड सूर्य की किरणों से सूखे हुये कमल के बीज [खट खट] आवाज करते हैं। तो गृहिणी (पत्नी नटी) को बुलाकर पूछता हूँ कि-कुछ जलपान है अथवा नहीं। सज्जनों ! अब मैं प्रयोजनवश और [नाटकीय] प्रयोग-वश प्राकृत भाषा बोलने वाला बन गया हूँ-
टीका-मया=सूत्रधारेण, सङ्गीतकम्=गीतं नृत्यञ्च वाद्यञ्च त्रयं सङ्गीत-मुच्यते-इति लक्षणलक्षितम्, कृतम्=सम्पादितम्, अभ्यस्तं वां। चिरसङ्गीतोपासनेन-चिरम्=दीर्घकालपर्यन्तम्, सङ्गीतस्य=गीतादित्रयस्य, उपासनेन=अभ्यासेन, ग्रीष्म-समये=ग्रीष्मतौ, प्रचण्ड-दिनकर-किरणोच्छुष्क-पुष्कर-बीजम्=प्रचण्डः=प्रतप्तः चासौ.