भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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प्रथमोऽङ्कः १६


**शब्दार्थ—**अपुत्रस्य = पुत्रहीन [व्यक्ति] का, गृहम् = घर, शून्यम् = सूना [होता है], यस्य = जिस [व्यक्ति] का, सन्मित्रम् = अच्छा मित्र, न = नहीं, अस्ति = होता है, [तस्य = उसका] चिरशून्यम् = चिरकाल अभिमत कार्य से रहित [होता है], मूर्खस्य = मूर्ख, [व्यक्ति] की [समस्त] दिशः = दिशायें [अर्थात् सभी ओर], शून्याः = सूनी [सहारारहित], [हैं], दरिद्रस्य = निर्धन [व्यक्ति] का, सर्वम् = सभी कुछ, शून्यम् = सूना, [होता है] ॥ ८ ॥

**अर्थ—**पुत्रहीन [सन्तानहीन] का घर सूना [होता है]; जिसका [कोई भी] अच्छा मित्र नहीं होता है, उसका चिरकाल शून्य रहता है; मूर्ख की [सभी] दिशायें शून्य रहती हैं [और] दरिद्र का सब [संसार] सूना = खाली होता है ॥ ८ ॥ [चारुदत्त की निर्धनता को सूचित करने के लिये सूत्रधार यहाँ से उपक्रम बाँधता है।]

**टीका—**अपुत्रस्य = अविद्यमानपुत्रस्य, पुत्रहीनस्य, [पुत्रस्य पुत्र्याश्च द्वन्द्वे पुँल्लिङ्गैकशेषे सति पुत्रशब्द एवोभयार्थवाचकः, तेन पुत्ररहितस्य पुत्रीरहितस्य चेत्यर्थ इति केचित् ।] गृहम् = आवासः, भवनम्, शून्यम् = रिक्तम् भवति, पुत्राभावे गृहस्थसर्ववस्तूनां वैयर्थ्यादिति भावः, यस्य = पुरुषस्य, सन्मित्रम् = शोभनं सुहृद्, न = नैव, अस्ति = वर्तते, तस्य = पुरुषस्य, चिरशून्यम् = चिरम् = दीर्घः कालः, शून्यम् = अभिमतकार्यरहितम्, सन्मित्राभावे कदापि कार्यसाधनाभावात् यावज्जीवं सुखं न लभ्यते इति भावः; मूर्खस्य = मूढस्य, बुद्धिरहितस्य, दिशः = सर्वाः ककुभः, शून्याः = सहायकजनरहिताः भवन्तीति शेषः; दरिद्रस्य = निर्धनस्य पुरुषस्य सर्वम् = सकलं जगत्, शून्यम् = रिक्तम्, भवतीति शेषः । निर्धनस्य पुरुषस्य कदापि कुत्रापि कोऽपि सहायको न भवति तेन विपुलसंख्याकजनमपि जगत् तत्कृते अभावमयमेव भवतीति भावः ॥ ८ ॥

**विमर्श—**समस्त वैभव ऐश्वर्य रहने पर भी यदि गृह-प्राङ्गण में शिशुलीला करने वाला पुत्र नहीं है तो वह घर वास्तव में सूना ही होता है। जिस व्यक्ति का कोई भी अच्छा मित्र नहीं होता है, सहायक नहीं होता है अतः सर्वत्र उसके कार्यों में बाधा पड़ती है, कोई भी अभिमत कार्य नहीं हो पाता है। संसार में सबकुछ रहता है परन्तु मूर्ख उसका उपभोग नहीं करपाता है अतः उसके लिये सभी ओर रिक्तता ही रहती है। इन सबकी अपेक्षा निर्धन की स्थिति और दयनीय होती है क्योंकि सारा संसार ही उसके लिये नहीं के समान है। कोई भी उसका साथ नहीं देता है, न बात सुनता है; न करता है, और न कुछ देता है। अतः दरिद्र होना महा अभिशाप है।

यहाँ दरिद्रता की निन्दा करते हुये आगे निरूपित होनेवाली चारुदत्त की की दरिद्रता का संकेत किया गया है।