मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽङ्कः २३
खलु अस्माकं गृहे अपरमिव संविधानकं वर्त्तते ! आयामितण्डुलोदकप्रवाहा रथ्या, लौहकटाहपरिवर्तनकृष्णसारा कृतविशेषका इव युवती अधिकतरं शोभते भूमिः, स्निग्धगन्धेन उद्दीप्यमानेव अधिकं बाधते मां बुभुक्षा; तत् किं पूर्वविहितं निधानम् उपपन्नम् भवेत् ? अथवा, अहमेव बुभुक्षातः ओदनमयं जीवलोकं प्रेक्षे ! नास्ति किल प्रातराशोऽस्माकं गृहे, प्राणात्ययं बाधते मां बुभुक्षा; इह सर्वं नवमिव संविधानकं वर्त्तते; एका वर्णकं पिनष्टि, अपरा सुमनसो गुम्फति । ( विचिन्त्य ) किं नु इदम् ? भवतु, कुटुम्बिनीं शब्दायित्वा परमार्थं ज्ञास्यामि ( नेपथ्याभिमुखमवलोक्य ) आर्ये ! इतस्तावत् । )
अच्छी लग रही है; स्निग्धगन्धेन=[ पकवानों में प्रयुक्त घी की ] मनोहर गन्ध से; उद्दीप्यमाना=उद्दीप्त होती हुई, इव=सी, बुभुक्षा=भूख, बाधते=कष्ट दे रही है; पूर्वविहितम्=पूर्वजों द्वारा गाड़ा हुआ, निधानम्=खजाना, उपपन्नम्=प्राप्त, भवेत् =हो गया [ सम्भावना में लिङ् है ], बुभुक्षातः=भूख के कारण, ओदनमयम्=चावनों से भरा हुआ, प्रेक्षे=देख रहा हूँ; प्राणात्ययम्=प्राणों को लेलेने वाली बुभुक्षा=भूख, बाधते=कष्ट दे रही है, वर्णकम्=सुगन्धयुक्त द्रव्य को, पिनष्टि=पीस रही है, सुमनसः=फूलों को, गुम्फति=गूंथ रही है; शब्दाय्य=बुलाकर, परमार्थम्=वास्तविक स्थिति को, ज्ञास्यामि=जानता हूँ, या जानूंगा; इतस्तावत्=[ कृपया ] इधर आइये ।
**अर्थ—**खेद है, खेद है, बहुत देर तक संगीत का अभ्यास करने के कारण मेरे समस्त अंग सूखे हुये कमलनाल के समान म्लान=मुरझाये हुये हो गये हैं । तो तब तक [ इस कारण ] घर जा कर मालूम करता हूँ कि मेरी पत्नी ने [ खाने के लिये ] कुछ भी बनाया है अथवा नहीं । ( चारो ओर घूमकर और देखकर ) तो यह मेरा घर है; इसलिये [ इसमें ] प्रवेश करता हूँ । ( प्रवेश करके और देखकर ) आश्चर्य [ है ] । यह क्या दूसरा ही आयोजन [ कार्य की तैयारी ] हमारे घर पर हो रहा है । गली चावलों के धोने के पानी से भरी हुई है, लोहे की कढ़ाई [ को धोने ] के [ लिये ] रगड़ने से चितकबरी पृथ्वी, टिकली [ तिलक ] लगायी हुई युवती के समान, अत्यधिक अच्छी लग रही है । [ पकवानों में प्रयुक्त ] घी की खुशबू से प्रदीप्त हुई सी भूख मुझे और अधिक कष्ट दे रही है । तो क्या पूर्वजों का गाड़ा हुआ खजाना निकल आया है [ मिल गया है ] । अथवा मैं ही भूख के कारण सारे संसार को भात से परिपूर्ण देख रहा हूँ । हमारे घर में प्रातः कालीन भोजन [ नाश्ता ] नहीं है । भूख मुझे प्राणहारिणीरूप में [ जान ले लेनी वाली के रूप में ] कष्ट दे रही है । यहाँ [ घर में ] सब नया सा ही आयोजन [ तैयारी ] हो रहा है । एक ( कोई ) स्त्री [ केशर आदि ] सुगन्धित पदार्थ को पीस रही है । दूसरी फूलों को गूंथ रही है । ( सोच कर ) यह क्या ( हो